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ऋण मोचक मंगल स्तोत्र (Rin Mochana Mangal Stotram) - अर्थ, लाभ और विधि

Rin Mochana Angaraka Mangal Stotram

ऋण मोचक मंगल स्तोत्र (Rin Mochana Mangal Stotram) - अर्थ, लाभ और विधि
स्कन्द उवाच । ऋणग्रस्तनराणां तु ऋणमुक्तिः कथं भवेत् ।
हिन्दी भावार्थ: स्कन्द (कार्तिकेय) जी ने पूछा - हे पितामह! जो मनुष्य कर्ज (ऋण) से ग्रस्त हैं, उनकी ऋण से मुक्ति कैसे हो सकती है?
ब्रह्मोवाच । वक्ष्येऽहं सर्वलोकानां हितार्थं हितकामदम् ॥
हिन्दी भावार्थ: ब्रह्मा जी ने कहा - मैं समस्त लोकों के हित के लिए और कल्याण की कामना पूर्ण करने वाले (इस उपाय को) बताता हूँ।
अस्य श्री अङ्गारक स्तोत्र महामन्त्रस्य गौतम ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, अङ्गारको देवता मम ऋण विमोचनार्थे जपे विनियोगः ।
(विनियोग: हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि मैं अपने ऋण मुक्ति के लिए इस स्तोत्र का पाठ कर रहा/रही हूँ।)
ध्यानम् – रक्तमाल्याम्बरधरः शूलशक्तिगदाधरः । चतुर्भुजो मेषगतो वरदश्च धरासुतः ॥ १ ॥
हिन्दी भावार्थ: जिन्होंने लाल माला और लाल वस्त्र धारण किए हैं, जो हाथों में शूल, शक्ति और गदा धारण करते हैं, जो चार भुजाओं वाले हैं, मेष (भेड़) की सवारी करते हैं और वरदान देने की मुद्रा में हैं, उन धरासुत (पृथ्वी पुत्र मंगल) का मैं ध्यान करता हूँ।
अथ स्तोत्रम् – मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः । स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावबोधकः ॥ २ ॥
हिन्दी भावार्थ: मंगल, भूमिपुत्र (पृथ्वी के पुत्र), ऋणहर्ता (कर्ज हरने वाले), धनप्रद (धन देने वाले), स्थिरासन (स्थिर आसन वाले), महाकाय (विशाल शरीर वाले) और सर्वकर्मावबोधक (सभी कर्मों को जानने/जगाने वाले) देवता हैं।
लोहितो लोहिताङ्गश्च सामगायी कृपाकरः । धर्मराजः कुजो भौमो भूमिजो भूमिनन्दनः ॥ ३ ॥
हिन्दी भावार्थ: वे लोहित (लाल रंग वाले), लोहितांग (लाल अंगों वाले), सामगायी (सामवेद का गान करने वाले), कृपाकर (कृपा करने वाले), धर्मराज, कुज, भौम, भूमिज और भूमिनन्दन हैं।
अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः । सृष्टिकर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः ॥ ४ ॥
हिन्दी भावार्थ: वे अंगारक, यम (मृत्यु के देवता समान निष्पक्ष/शक्तिशाली), सभी रोगों का नाश करने वाले, सृष्टि के रचयिता, संहारक और सभी कामनाओं (इच्छाओं) का फल देने वाले हैं।
भूतिदो ग्रहपूज्यश्च वक्त्रो रक्तवपुः प्रभुः । एतानि कुजनामानि यो नित्यं प्रयतः पठेत् । ऋणं न जायते तस्य धनं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ५ ॥
हिन्दी भावार्थ: वे ऐश्वर्य देने वाले (भूतिद), ग्रहों में पूजनीय, वक्ता, लाल शरीर वाले प्रभु हैं। जो व्यक्ति पवित्र होकर मंगल (कुज) के इन नामों का नित्य पाठ करता है, उस पर कभी ऋण नहीं चढ़ता और वह निःसंदेह धन प्राप्त करता है।
रक्तपुष्पैश्च गन्धैश्च दीपधूपादिभिस्तथा । मङ्गलं पूजयित्वा तु मङ्गलेऽहनि सर्वदा ॥ ६ ॥
हिन्दी भावार्थ: सदैव मंगलवार के दिन (मङ्गलेऽहनि) लाल फूल, गंध (चंदन), दीप और धूप आदि से भगवान मंगल की पूजा करनी चाहिए।
ऋणरेखाः प्रकर्तव्याः दग्धाङ्गारैस्तदग्रतः । सप्तविंशतिनामानि पठित्वा तु तदन्तिके ॥ ७ ॥ ताश्च प्रमार्जयेत्पश्चाद्वामपादेन संस्पृशन् । एवं कृत्वा न सन्देहो ऋणहीनो धनी भवेत् ॥ ८ ॥
हिन्दी भावार्थ: [विशेष प्रयोग]: पूजा के बाद मंगल देव के सामने जले हुए कोयले (दग्धाङ्गार) से (जमीन पर) ऋण रेखाएं (Lines suggesting debt) खींचनी चाहिए। फिर मंगल के नामों (या इस स्तोत्र) का पाठ करके उन रेखाओं को बाएं पैर (Left foot) से स्पर्श करते हुए मिटा देना चाहिए। ऐसा करने से, इसमें कोई संदेह नहीं कि, वह व्यक्ति ऋण मुक्त और धनी हो जाता है।
भूमिजस्य प्रसादेन ग्रहपीडा विनश्यति । येनार्जिता जगत्कीर्तिर्भूमिपुत्रेण शाश्वती ॥ ९ ॥
हिन्दी भावार्थ: भूमिपुत्र (मंगल) की कृपा से ग्रह पीड़ा नष्ट हो जाती है और व्यक्ति जगत में शाश्वत कीर्ति अर्जित करता है।
शत्रवश्च हता येन भौमेन महितात्मना । स प्रीयतां तु भौमोऽद्य तुष्टो भूयात् सदा मम ॥ १० ॥
हिन्दी भावार्थ: महान आत्मा वाले जिन भौम (मंगल) ने शत्रुओं का नाश किया है, वे आज मुझ पर प्रसन्न हों और सदा संतुष्ट रहें।
मूलमन्त्रः – अङ्गारक महीपुत्र भगवन् भक्तवत्सल । नमोऽस्तु ते ममाशेष ऋणमाशु विमोचय ॥ ११ ॥
हिन्दी भावार्थ: (प्रार्थना/मूलमंत्र): हे अंगारक! हे पृथ्वीपुत्र! हे भगवन! हे भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। मेरे सम्पूर्ण (अशेष) ऋण को शीघ्र (आशु) दूर कर दीजिये (विमोचय)।
अर्घ्यम् – भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भव पिनाकिनः । ऋणार्तस्त्वां प्रपन्नोऽस्मि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥
हिन्दी भावार्थ: (अर्घ्य मंत्र): हे भूमिपुत्र! हे महातेजस्वी! हे भगवान शिव (पिनाकिन) के पसीने से उत्पन्न होने वाले! मैं ऋण से पीड़ित होकर आपकी शरण में हूँ। मेरा अर्घ्य स्वीकार कीजिये, आपको नमस्कार है।
॥ इति श्री स्कन्दपुराणे ऋण विमोचक अङ्गारक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: ऋण मोचक मंगल स्तोत्र

ऋण मोचक मंगल स्तोत्र का वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है। जब मनुष्य अत्यधिक ऋण (कर्ज) और दरिद्रता से घिर जाता है और उसे कोई रास्ता नहीं सूझता, तब इस स्तोत्र का पाठ आशा की किरण बनकर आता है। यह स्तोत्र मंगल ग्रह (जिन्हें अंगारक भी कहा जाता है) को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को 'भूमिपुत्र' और 'धन का कारक' माना गया है, विशेषकर अचल संपत्ति (Real Estate) और ऋण मुक्ति के लिए।

स्तोत्र के लाभ (Benefits)

  • शीघ्र कर्ज मुक्ति: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह स्तोत्र कर्ज उतारने में अत्यंत प्रभावशाली है। 'ऋणहर्ता' नाम का जाप साधक को ऋण मुक्त बनाता है।

  • धन और संपत्ति: पाठ करने से धन की आवक बढ़ती है और भूमि/भवन (Property) से जुड़े लाभ होते हैं।

  • मंगल दोष निवारण: कुंडली में मांगलिक दोष या मंगल की अशुभता के कारण विवाह या जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।

  • रोग और शत्रु नाश: 'सर्वरोगापहारकः' और 'शत्रवश्च हता' - यह स्वास्थ्य प्रदान करता है और शत्रुओं पर विजय दिलाता है।

सरल पाठ विधि

  • मंगलवार को स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें।

  • हनुमान जी और मंगल देव का ध्यान करें।

  • शुद्ध घी का दीपक जलाएं और लाल फूल (जैसे गुड़हल) अर्पित करें।

  • ऋण मोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें। यदि संभव हो तो 108 दिन तक नित्य पाठ करें, या कम से कम हर मंगलवार को।

  • विशेष उपाय: बहुत अधिक कर्ज होने पर, मंगलवार को पाठ करते समय काले कोयले से जमीन पर लकीरें खींचें और पाठ के बाद उन्हें बाएं पैर से मिटा दें। यह कर्ज के मिटने का प्रतीक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. ऋण मोचक मंगल स्तोत्र का पाठ क्यों किया जाता है?

इसका मुख्य उद्देश्य 'ऋण' (कर्ज) से मुक्ति पाना है। यह स्तोत्र मंगल देव (जिन्हें भूमिपुत्र और धनप्रद भी कहा जाता है) को प्रसन्न कर आर्थिक समस्याओं को दूर करने और धन समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

यह स्तोत्र 'स्कन्द पुराण' में वर्णित है। यह भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) द्वारा पूछे जाने पर स्वयं जगतपिता ब्रह्मा जी द्वारा बताया गया है।

3. ऋण मोचक मंगल स्तोत्र पाठ करने की विशेष विधि क्या है?

श्लोक 6-8 के अनुसार, मंगलवार को पूजा के बाद जले हुए कोयले (अंगारे) से जमीन पर लकीरें (ऋण रेखाएं) खींचकर, पाठ करते हुए उन्हें बाएं पैर से मिटाने की विधि बताई गई है, जो कर्ज मिटाने का प्रतीक है।

4. मंगल देव के अन्य नाम क्या हैं जो इस स्तोत्र में आए हैं?

इस स्तोत्र में मंगल देव को अङ्गारक, भूमिपुत्र, ऋणहर्ता, धनप्रद, लोहित, लोहितांग, सामगायी, कृपाकर, धर्मराज, कुज, भौम, और भूमिनन्दन आदि नामों से पुकारा गया है।

5. इसका पाठ कब करना चाहिए?

इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से 'मंगलवार' (Tuesday) को करना चाहिए। प्रतिदिन पाठ करना भी बहुत शुभ है।