नवार्ण मन्त्र (Navarna Mantra) दुर्गा सप्तशती का "प्राण मन्त्र" है। "नवार्ण" का अर्थ है नौ अक्षरों वाला — "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"। यह मन्त्र त्रिदेवी (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) की समष्टि शक्ति का प्रतीक है। सप्तशती के पूरे अनुष्ठान में इस मन्त्र का केंद्रीय स्थान है — पाठ से पूर्व इसका जप किया जाता है, प्रत्येक अध्याय के बाद इसका जप होता है, और अंत में भी इसी से पाठ का उपसंहार होता है।
इस विधि में पाँच मुख्य चरण हैं: विनियोग (Dedication), ऋष्यादिन्यास (Rishi Nyasa), करन्यास और हृदयादिन्यास (Hand & Body Nyasa), दिङ्न्यास (Directional Nyasa), और ध्यान (Meditation)। न्यास का अर्थ है मन्त्रों को शरीर के विभिन्न अंगों में "स्थापित" करना ताकि साधक स्वयं मन्त्रमय हो जाए और देवी शक्ति उसके रोम-रोम में व्याप्त हो।
ध्यान श्लोकों में त्रिदेवी के अलग-अलग रूपों का वर्णन है — दश भुजा वाली नीलवर्ण महाकालिका, अठारह भुजा वाली प्रसन्नानन महालक्ष्मी, और आठ भुजा वाली गौरवर्ण महासरस्वती। इन तीनों का ध्यान करके १०८ बार मूल मन्त्र का जप करना सप्तशती साधना का सबसे शक्तिशाली अंग है।
नवार्ण मन्त्र का विशिष्ट महत्व (Significance)
त्रिदेवी शक्ति: 'ऐं' महासरस्वती (ज्ञान), 'ह्रीं' महालक्ष्मी (शक्ति), और 'क्लीं' महाकाली (संहार शक्ति) का बीज है।
शरीर शुद्धि: न्यास प्रक्रिया साधक के शरीर की नाड़ियों को शुद्ध करती है और उसे मन्त्र की उच्च ऊर्जा ग्रहण करने योग्य बनाती है।
दिशा रक्षा: दिङ्न्यास से साधक दसों दिशाओं में सुरक्षित हो जाता है।
सम्पुट शक्ति: यह मन्त्र सप्तशती के सभी ७०० श्लोकों की शक्ति को एकत्रित करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नवार्ण मन्त्र क्या है?
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" — यह नौ अक्षरों वाला मन्त्र दुर्गा सप्तशती का मूल मन्त्र है।
2. न्यास क्यों करते हैं?
न्यास से शरीर के प्रत्येक अंग में मन्त्र शक्ति स्थापित होती है। इससे साधक कवच के समान सुरक्षित हो जाता है।
3. क्या बिना दीक्षा के नवार्ण मन्त्र का जप कर सकते हैं?
सप्तशती पाठ के अंश के रूप में इसे कोई भी श्रद्धालु जप सकता है। परंतु गहन तांत्रिक साधना के लिए गुरु दीक्षा लाभकारी होती है।
4. जप कितनी बार करना चाहिए?
विधान के अनुसार सप्तशती पाठ से पूर्व १०८ बार जप करें। नित्य साधना में भी १ माला (१०८) जप करना शुभ है।
5. 'ऐं', 'ह्रीं' और 'क्लीं' बीजों का क्या अर्थ है?
'ऐं' सरस्वती बीज (ज्ञान), 'ह्रीं' माया बीज (शक्ति/ऐश्वर्य), और 'क्लीं' काम बीज (आकर्षण/इच्छा पूर्ति) है।
6. माला पूजा क्यों करते हैं?
माला को 'सर्वशक्तिस्वरूपिणी' माना गया है। जप से पहले माला की पूजा करने से जप की सिद्धि शीघ्र होती है।
7. ध्यान में तीन रूपों का वर्णन क्यों है?
सप्तशती के तीन चरित्रों की अधिष्ठात्री देवियाँ — महाकाली (प्रथम), महालक्ष्मी (मध्यम), और महासरस्वती (उत्तम) — इन तीनों का ध्यान करना आवश्यक है।
8. जप के बाद क्या करें?
"गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं..." श्लोक पढ़कर देवी के वामहस्त में जप निवेदन करें। इसके बाद सप्तशती का मुख्य पाठ आरम्भ करें।