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Shri Durga Saptashati Nyasa Vidhi – श्री दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण न्यास विधि

Shri Durga Saptashati Nyasa Vidhi – श्री दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण न्यास विधि
॥ अथ श्री दुर्गा सप्तशती न्यास विधि ॥ ॥ विनियोगः ॥ ओं अस्य श्रीदुर्गासप्तशती-माला-मन्त्रस्य, नारायण ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गा-प्रीत्यर्थे सप्तशती-पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥ (दाहिने हाथ में जल लेकर भूमि पर छोड़ें) ॥ करन्यास ॥ ओं खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा। शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डी-परिघायुधा॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ओं शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥ तर्जनीभ्यां नमः। ओं प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥ मध्यमाभ्यां नमः। ओं सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते। यानि चात्यर्थ-घोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥ अनामिकाभ्यां नमः। ओं खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ओं सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति-समन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। ॥ अङ्गन्यास ॥ ओं खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा... हृदयाय नमः। ओं शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके... शिरसे स्वाहा। ओं प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे... शिखायै वषट्। ओं सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते... कवचाय हुम्। ओं खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके... नेत्रत्रयाय वौषट्। ओं सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति-समन्विते... अस्त्राय फट्। ॥ ध्यानम् ॥ विद्युद्दाम-समप्रभां मृगपति-स्कन्ध-स्थितां भीषणां, कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्धस्ताभि-रासेविताम्। हस्तैश्चक्र-गदासिखेट-विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं, बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥ ॥ इति न्यासः ॥

सप्तशती न्यास विधि: देह को देवालय बनाने का विज्ञान (Introduction)

श्री दुर्गा सप्तशती न्यास विधि (Shri Durga Saptashati Nyasa Vidhi) केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि उच्च कोटि की तांत्रिक मनोविज्ञान और ऊर्जा प्रबंधन की तकनीक है। 'न्यास' शब्द का अर्थ होता है—"निक्षेप" या "स्थापित करना"। सनातन धर्म के आगम और निगम शास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब तक साधक का शरीर शुद्ध और चैतन्य नहीं होता, तब तक वह मन्त्रों की प्रचंड ऊर्जा को सहन करने में सक्षम नहीं हो पाता। न्यास के माध्यम से साधक अपने स्थूल शरीर (Physical Body) के विभिन्न अंगों को मन्त्रों के प्रभाव से "सील" कर देता है और उनमें भगवती की शस्त्र-शक्तियों का आह्वान करता है।

दुर्गा सप्तशती के मन्त्र ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली ऊर्जाओं में से एक हैं। इन मन्त्रों का पाठ करने से पूर्व विनियोग, करन्यास और अंगन्यास की प्रक्रिया पूर्ण करना अनिवार्य है। विनियोग हमें यह बताता है कि इस साधना के ऋषि कौन हैं (नारायण ऋषि), छन्द क्या है (अनुष्टुप्) और इसके अधिष्ठातृ देवता कौन हैं (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती)। इसके बिना साधना का लक्ष्य निर्धारित नहीं होता। विनियोग के उपरांत किया जाने वाला करन्यास साधक की दसों उंगलियों और हथेलियों को मन्त्रमयी बनाता है। उंगलियां हमारे शरीर की ऊर्जा के मुख्य निकास और प्रवेश द्वार हैं; न्यास द्वारा इन्हें पवित्र कर साधक मन्त्रों की शक्ति को अपने हाथों में केंद्रित करता है।

अंगन्यास की प्रक्रिया अधिक सूक्ष्म है। इसमें हृदय, सिर, शिखा, कवच और नेत्रों पर मन्त्रों का स्पर्श किया जाता है। उदाहरण के लिए, जब हम कहते हैं "हृदयाय नमः", तो हम अपनी चेतना को हृदय केंद्र पर स्थिर करते हैं। "नेत्रत्रयाय वौषट्" कहते समय हम अपनी दृष्टि और अंतर्दृष्टि (Third Eye) को दिव्य ज्योति से जोड़ते हैं। अंत में "अस्त्राय फट्" की ध्वनि के साथ हम अपने चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र (Aura Shield) निर्मित करते हैं, जिससे कोई भी नकारात्मक शक्ति पाठ के दौरान विघ्न न डाल सके।

अकादमिक शोधकर्ताओं और सिद्ध संतों का मत है कि न्यास विधि साधक के 'मनोमय' और 'प्राणमय' कोशों को जागृत करती है। यह शरीर की ७२,००० नाड़ियों को मन्त्र पाठ के लिए तैयार करने की एक तैयारी है। यदि न्यास के बिना पाठ किया जाए, तो मन्त्रों से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा (Tapas) साधक के नर्वस सिस्टम पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। अतः, न्यास साधक के लिए एक "इंसुलेटर" और "ट्रांसफार्मर" दोनों का कार्य करता है। सप्तशती पाठ की यह वैज्ञानिक विधि हमें सिखाती है कि भक्ति केवल भावनाओं का खेल नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अनुशासन है जो आत्मा को परमात्मा के स्वरूप में ढाल देता है।

न्यास विधि का विशिष्ट तांत्रिक महत्व (Significance)

न्यास का महत्व चण्डी पाठ की सफलता के लिए सर्वोपरि है। इसके बिना अनुष्ठान "अंगहीन" माना जाता है:

  • दैवीकरण (Divinization): न्यास साधक के पंचभौतिक शरीर को "चिन्मय" बनाता है, जिससे वह भगवती की पूजा के योग्य होता है।
  • आत्म-सुरक्षा: न्यास के दौरान प्रयोग किए जाने वाले मन्त्र (जैसे 'शूलेन् पाहि नो देवि') साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं।
  • एकाग्रता का केंद्रण: न्यास की प्रक्रिया साधक को बाहरी जगत से काटकर अपने भीतर की शक्तियों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करती है।
  • अस्त्र-शस्त्र की स्थापना: सप्तशती के न्यास में खड्ग, शूल, गदा और चक्र जैसे अस्त्रों का ध्यान किया जाता है, जो साधक के भीतर के काम-क्रोध रूपी असुरों का संहार करते हैं।

न्यास पाठ के आध्यात्मिक लाभ (Benefits)

न्यास विधि के नियमित अभ्यास से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • तेज की वृद्धि: न्यास करने वाले साधक के चेहरे और आंखों में एक विशेष प्रकार का आध्यात्मिक तेज (Aura) विकसित होता है।
  • मानसिक स्थिरता: यह विचलित मन को शांत करता है और अवसाद या भय जैसी स्थितियों से मुक्ति दिलाता है।
  • मन्त्र सिद्धि: न्यास के साथ किया गया चण्डी पाठ शीघ्र सिद्ध होता है और कामनाओं की पूर्ति करता है।
  • ग्रह दोष शांति: शरीर के विभिन्न केंद्रों पर न्यास करने से नवग्रहों की प्रतिकूलता समाप्त होती है।
  • शत्रु विजय: 'अस्त्राय फट्' के प्रयोग से साधक के अदृश्य शत्रु और नकारात्मक ऊर्जाएं परास्त होती हैं।

न्यास की सही विधि और क्रिया (Ritual Method)

न्यास करते समय कुछ विशेष शारीरिक मुद्राओं का पालन करना आवश्यक है:

१.

करन्यास क्रिया: इसमें अंगूठे से लेकर कनिष्ठिका तक की उंगलियों को एक-दूसरे से स्पर्श किया जाता है। अंत में 'करतलकरपृष्ठाभ्यां' कहते हुए दोनों हथेलियों को आगे-पीछे से रगड़ा जाता है।

२.

हृदयादि न्यास: दाहिने हाथ की चार उंगलियों से हृदय, सिर, शिखा (चोटी का स्थान), कंधे (कवच) और नेत्रों का स्पर्श करें। "अस्त्राय फट्" कहते हुए दाहिने हाथ को सिर के चारों ओर घुमाकर ताली बजाएं।

३.

ध्यान की स्थिति: न्यास के बाद "विद्युद्दाम-समप्रभां..." श्लोक के साथ माँ दुर्गा की दिव्य छवि का हृदय में ध्यान करें। अनुभव करें कि वे साक्षात् आपके सम्मुख सिंह पर सवार होकर विराजमान हैं।

४.

आसन और दिशा: न्यास हमेशा पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर, एक शुद्ध लाल आसन पर बैठकर ही करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. न्यास का शाब्दिक अर्थ क्या है?

न्यास का अर्थ है 'रखना' या 'स्थापित करना'। यह मन्त्रों की शक्ति को अपने शरीर के अंगों में स्थापित करने की एक विधि है।

2. क्या बिना न्यास के सप्तशती पाठ कर सकते हैं?

न्यास के बिना पाठ करने से साधक को मन्त्रों की ऊर्जा को संभालने में कठिनाई हो सकती है और पाठ का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

3. करन्यास और अंगन्यास में क्या अंतर है?

करन्यास उंगलियों और हथेलियों की शुद्धि के लिए है, जबकि अंगन्यास हृदय, मस्तिष्क और नेत्रों जैसे मुख्य केंद्रों की सुरक्षा के लिए है।

4. 'अस्त्राय फट्' कहते समय क्या क्रिया की जाती है?

इसमें दाहिने हाथ को सिर के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा में घुमाकर बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाई जाती है, जो दसों दिशाओं को सुरक्षित करने का प्रतीक है।

5. न्यास के ऋषि कौन हैं?

सप्तशती न्यास के ऋषि नारायण हैं।

6. क्या स्त्रियाँ न्यास विधि कर सकती हैं?

हाँ, भगवती की साधना में कोई लिंग भेद नहीं है। स्त्रियाँ पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ न्यास कर सकती हैं।

7. क्या न्यास के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य भक्ति मार्ग के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन तांत्रिक प्रयोगों और सम्पुट पाठ के लिए गुरु का मार्गदर्शन लेना श्रेष्ठ है।

8. 'नेत्रत्रयाय वौषट्' का क्या महत्व है?

यह क्रिया साधक की दोनों भौतिक आँखों और आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) को माँ की दिव्य दृष्टि से आलोकित करती है।

9. क्या न्यास के मन्त्र याद करना जरूरी है?

शुरुआत में आप देखकर पढ़ सकते हैं, लेकिन याद होने पर ध्यान और एकाग्रता अधिक गहरी होती है।

10. क्या हर अध्याय से पहले न्यास करना चाहिए?

पूरी सप्तशती के अनुष्ठान से पहले एक बार न्यास करना पर्याप्त है। यदि आप केवल एक अध्याय पढ़ रहे हैं, तो भी न्यास करना उत्तम है।