विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (मन और कल्पना) | भाग 5

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी यात्रा के पिछले भागों में, हमने श्वास (भाग 1), ऊर्जा केंद्रों (भाग 2), इंद्रियों-भावनाओं (भाग 3) और शून्यता-प्रकाश (भाग 4) पर आधारित विधियों को समझा।
अब, इस पांचवें भाग में, भगवान शिव हमें चेतना के सबसे बड़े रहस्य, सबसे बड़े बंधन और सबसे बड़े द्वार की ओर ले जाते हैं - हमारा अपना मन (Mind)। योग और आध्यात्म में, मन को ही बंधन और मोक्ष का कारण माना गया है। यदि मन विचारों और इच्छाओं में उलझा है, तो वह बंधन है। और यदि वही मन शांत, साक्षी और अपने स्रोत में स्थित हो जाए, तो वह मोक्ष का द्वार बन जाता है।
तंत्र मन से लड़ने या उसे दबाने को नहीं कहता। इसके विपरीत, वह मन की ही शक्तियों - जैसे कल्पना (Imagination) और विचार (Thought) - का उपयोग करके मन को ही पार करने की अनूठी विधियाँ बताता है।
इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 21 से 25 की पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे अपने मन को ही आकाश की तरह शून्य मानकर, या कल्पना की शक्ति का उपयोग करके हम चेतना की उन गहराइयों को छू सकते हैं जहाँ कोई विचार नहीं, केवल शुद्ध अस्तित्व है।
विधि 21: कल्पना करें कि सब कुछ जल रहा है
"विश्वमेतन्महादेवि शून्यभूतं विचिन्तयेत्। तत्रैव च मनो लीनं ततस्तल्लयभाजनम्॥"
शिव कहते हैं: "हे महादेवी! इस संपूर्ण विश्व को शून्य-भूत (अस्तित्वहीन) चिंतवन करो। जब मन उसी में लीन हो जाता है, तब वह (साधक) उस लय (शून्यता) का पात्र बन जाता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि पिछली कुछ विधियों का एक और शक्तिशाली रूप है, जो कल्पना की शक्ति का उपयोग करती है। 'शून्य-भूत' का एक गहरा अर्थ है 'भस्म हो गया' या 'जलकर राख हो गया'। शिव कहते हैं कि कल्पना करो कि यह पूरा विश्व, जिसे तुम इतना ठोस और वास्तविक मानते हो, जल रहा है।
कल्पना करो कि तुम्हारे आसपास की हर चीज - तुम्हारा घर, तुम्हारा शहर, पहाड़, नदियां, और अंत में पूरी पृथ्वी - सब कुछ धू-धू कर के जल रहा है और राख में बदल रहा है। इस महा-विनाश की कल्पना में तुम्हारे अपने विचार, तुम्हारी चिंताएं, तुम्हारी पहचान... सब कुछ जल जाएगा।
जब सब कुछ जलकर राख हो जाता है, तो पीछे क्या बचता है? केवल शून्य, केवल राख, केवल खालीपन। शिव कहते हैं कि जब तुम्हारा मन उस शून्य में लीन हो जाता है, तो तुम स्वयं उस शून्यता के अनुभव के पात्र बन जाते हो, जो भैरव-चेतना है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आराम से बैठें: किसी शांत स्थान पर आँखें बंद करके बैठ जाएं।
- आग की कल्पना करें: कल्पना करें कि आपके पैरों के नीचे से आग की लपटें उठ रही हैं।
- आसपास की वस्तुओं को जलाएं: देखें कि यह आग आपके कमरे की हर चीज को जला रही है - कुर्सी, मेज, दीवारें... सब कुछ राख बन रहा है।
- कल्पना का विस्तार करें: अब इस आग को पूरे शहर, पूरे देश और पूरी पृथ्वी को जलाते हुए देखें। समुद्रों को भाप बनते हुए, पहाड़ों को पिघलते हुए देखें।
- स्वयं को भी जलने दें: अंत में, महसूस करें कि यह आग आपके अपने शरीर को भी जला रही है। आपका शरीर भी राख का ढेर बन गया है। अब कोई शरीर नहीं, कोई मन नहीं, कोई पहचान नहीं।
- शून्यता में ठहरें: इस महा-विनाश के बाद जो परम शांति और शून्यता बची है, बस उसी में ठहर जाएं। वही आपका वास्तविक स्वरूप है।
यह विधि बौद्ध धर्म की 'श्मशान साधना' और हिंदू धर्म की 'शिव की प्रलय' की अवधारणा पर आधारित है। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह 'विरेचन' (Catharsis) की एक शक्तिशाली तकनीक है। जब हम कल्पना में सब कुछ नष्ट कर देते हैं, तो हम अपनी सभी आसक्तियों (attachments) और चिंताओं को भी मानसिक रूप से जला देते हैं।
यह हमें अस्तित्व के सबसे बड़े सत्य - 'नश्वरता' (Impermanence) - का बोध कराती है। जब हमें यह गहराई से अनुभव होता है कि सब कुछ क्षणभंगुर है, तो हमारी छोटी-छोटी चिंताएं और अहंकार अपने आप ही महत्वहीन हो जाते हैं। इस 'महा-मृत्यु' के अनुभव के बाद ही 'अमरता' का वास्तविक बोध होता है।
विधि 22: तत्वों का अपने स्रोत में विलीनीकरण
"स्वदेहे जगतो वापि सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि च। तत्त्वानि यान्ति निलयं ध्यात्वान्ते व्यज्यते परा॥"
शिव कहते हैं: "अपने शरीर में या जगत में, जो सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म तत्व हैं, जब वे अपने निलय (स्रोत) में विलीन हो जाते हैं, ऐसा ध्यान करने पर, अंत में 'परा' (परम चेतना) प्रकट होती है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह एक बहुत ही गहरी और वैज्ञानिक ध्यान विधि है, जो सांख्य दर्शन और तंत्र के 'तत्व' सिद्धांत पर आधारित है। पिछली विधि में हम स्थूल जगत को भस्म कर रहे थे। इस विधि में, शिव हमें सूक्ष्म जगत को उसके मूल स्रोत में विलीन करने के लिए कह रहे हैं।
तंत्र के अनुसार, यह पूरा ब्रह्मांड (और हमारा शरीर भी) सूक्ष्म तत्वों से बना है। प्रक्रिया इस प्रकार है: स्थूल तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) सूक्ष्म तन्मात्राओं (गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द) में विलीन होते हैं, तन्मात्राएं अहंकार में, अहंकार बुद्धि में, बुद्धि प्रकृति में, और अंततः प्रकृति परम चेतना (पुरुष या शिव) में विलीन हो जाती है। शिव कहते हैं कि इस 'उल्टी प्रक्रिया' (Process of Involution) का ध्यान करो।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आराम से बैठें: आँखें बंद करके शांत भाव से बैठ जाएं।
- पृथ्वी तत्व का विलीनीकरण: कल्पना करें कि आपका शरीर, जो पृथ्वी तत्व (ठोसता) से बना है, जल तत्व (तरलता) में घुल रहा है। अब केवल जल ही शेष है।
- जल का विलीनीकरण: अब कल्पना करें कि यह जल अग्नि तत्व (गर्मी) में भाप बनकर उड़ रहा है। अब केवल अग्नि ही शेष है।
- अग्नि का विलीनीकरण: कल्पना करें कि यह अग्नि वायु तत्व (गति) में विलीन हो रही है। अब केवल वायु ही शेष है।
- वायु का विलीनीकरण: कल्पना करें कि यह वायु आकाश तत्व (शून्य) में खो रही है। अब केवल अनंत आकाश ही शेष है।
- आकाश का विलीनीकरण: अंत में, कल्पना करें कि यह आकाश भी चेतना के एक बिंदु में विलीन हो रहा है, और फिर वह बिंदु भी मिट जाता है। जो शेष बचता है, वह 'परा' या शुद्ध चेतना है। उस अनुभव में ठहर जाएं।
यह विधि सृष्टि की रचना (evolution) की प्रक्रिया को उलटने (involution) का एक मानसिक अभ्यास है। यह हमें सिखाती है कि हम केवल यह स्थूल शरीर नहीं हैं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जाओं और तत्वों का एक जटिल संयोजन हैं।
मनोवैज्ञानिक रूप से, यह विधि 'विश्लेषण' (analysis) की प्रक्रिया का उपयोग करती है। जब हम किसी वस्तु को उसके मूल घटकों में तोड़कर देखते हैं, तो वस्तु का मोह समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक सुंदर फूल को जब आप पंखुड़ियों, पराग, आदि में तोड़ देते हैं, तो उसका आकर्षण कम हो जाता है। इसी तरह, जब हम शरीर और जगत को उसके मूल तत्वों में विलीन होते हुए देखते हैं, तो हमारी आसक्ति और पहचान टूट जाती है। जब सभी पहचानें टूट जाती हैं, तो केवल 'पहचान-रहित चेतना' ही शेष रहती है।
विधि 23: शक्ति का उर्ध्व-गमन और हृदय में विलय
"या शक्तिः संकोचेन विकासमाप्नोति पुनः। हृदि तां भावयेद्योगी लयं कृत्वाथ भावनाम्॥"
शिव कहते हैं: "जो शक्ति संकोच से पुनः विकास को प्राप्त होती है, योगी उसे हृदय में भावित करे, और फिर (उसी में) भावना का लय कर दे।"
विधि की सरल व्याख्या
यह एक और गूढ़ विधि है जो कुंडलिनी शक्ति (Kundalini Shakti) के प्रवाह पर केंद्रित है। शिव यहाँ ऊर्जा के दो प्राकृतिक प्रवाहों की बात कर रहे हैं:
- संकोच (Contraction): ऊर्जा का नीचे की ओर जाना या सिकुड़ना, जैसा कि भय या दुःख में होता है।
- विकास (Expansion): ऊर्जा का ऊपर की ओर उठना या फैलना, जैसा कि प्रेम या आनंद में होता है।
'संकोच से पुनः विकास को प्राप्त होती है' का अर्थ है, उस ऊर्जा को जो सामान्यतः नीचे की ओर (सांसारिक विषयों में) बहती है, उसे ऊपर की ओर, हृदय की ओर मोड़ना। शिव कहते हैं कि उस ऊपर उठती हुई ऊर्जा (विकास) को अपने हृदय केंद्र (अनाहत चक्र) में अनुभव करो। जब आप उस ऊर्जा को हृदय में महसूस करते हैं, तो फिर उस 'भावना' को भी छोड़ दो और केवल ऊर्जा में ही विलीन हो जाओ।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- शांत होकर बैठें: रीढ़ सीधी रखकर आराम से बैठ जाएं और आँखें बंद कर लें।
- ऊर्जा के प्रवाह को महसूस करें: अपनी चेतना को अपनी रीढ़ के आधार (मूलाधार) पर ले जाएं। कल्पना करें कि आपकी जीवन-शक्ति वहां स्थित है।
- ऊर्जा को हृदय तक लाएं: अब कल्पना करें कि एक सुनहरी ऊर्जा की धारा आपकी रीढ़ से होकर ऊपर उठ रही है और आपके हृदय केंद्र (छाती के बीच) में आकर रुक गई है।
- हृदय में विकास का अनुभव करें: महसूस करें कि आपका हृदय उस ऊर्जा से भर रहा है, और प्रेम, आनंद और करुणा के भाव से फैल रहा है (विकास)। इस फैलते हुए आनंद को कुछ क्षणों के लिए अनुभव करें।
- भावना को भी छोड़ दें: अब, आनंद की इस 'भावना' को भी देखना शुरू करें। आनंद को 'अनुभव' करने वाले से अलग हो जाएं। बस एक साक्षी बनें। अंत में, अनुभव करने वाला और अनुभव दोनों विलीन हो जाएंगे और केवल शुद्ध ऊर्जा ही शेष रहेगी।
यह विधि 'ऊर्ध्वरेता' होने के तांत्रिक सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है अपनी ऊर्जा को नीचे के चक्रों (काम, क्रोध, भय) से ऊपर के चक्रों (प्रेम, ज्ञान, चेतना) की ओर रूपांतरित करना।
मनोवैज्ञानिक रूप से, यह विधि हमें सिखाती है कि हम अपनी भावनाओं के स्वामी कैसे बनें। जब हम हृदय में ऊर्जा के 'विकास' का अनुभव करते हैं, तो हम सकारात्मक भावनाओं को उत्पन्न करना सीखते हैं। और जब हम उस 'भावना का भी लय कर देते हैं', तो हम भावनाओं से अपनी पहचान तोड़ना सीखते हैं। यह हमें एक ऐसी अवस्था में ले जाता है जहाँ हम सुख और दुःख, दोनों में सम और शांत रह सकते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हम इन भावनाओं से परे, एक शुद्ध साक्षी हैं।
विधि 24: बाहरी और भीतरी आकाश का एकीकरण
"सर्वतः स्वदेहस्य द्वादशान्ते নিরীक्षणाৎ। दृढेन मनसा दृष्ट्वा दृष्टेर्दाढ्यं प्रशाम्यति॥"
शिव कहते हैं: "अपने शरीर के सब ओर से, द्वादशांत में निरीक्षण करने पर, और दृढ़ मन से देखने पर, दृष्टि की दृढ़ता शांत हो जाती है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि पिछली कुछ शून्यता की विधियों का एक व्यावहारिक संश्लेषण है। शिव कहते हैं कि दो स्थानों को एक साथ देखो:
- बाहरी आकाश: अपने शरीर के चारों ओर फैले हुए अनंत आकाश को देखो।
- भीतरी आकाश: अपने 'द्वादशांत' (सिर के शीर्ष से बारह अंगुल ऊपर) में स्थित आंतरिक आकाश या चेतना के केंद्र को देखो।
'दृढ़ मन से' देखो कि ये दोनों आकाश अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही हैं। तुम्हारे भीतर जो चेतना का आकाश है, वही आकाश बाहर भी फैला हुआ है। शरीर केवल एक अस्थायी बादल है जो इन दोनों आकाशों के बीच में आ गया है। जब तुम इस एकता को दृढ़ता से देखते हो, तो 'दृष्टि की दृढ़ता' शांत हो जाती है। 'दृष्टि की दृढ़ता' का अर्थ है 'देखने वाले' (कर्ता या ego) का भाव। जब देखने वाला और देखा जाने वाला (बाहरी और भीतरी आकाश) एक हो जाते हैं, तो 'मैं' का भाव विलीन हो जाता है और केवल अद्वैत चेतना ही शेष रहती है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- खुले आकाश के नीचे बैठें: किसी शांत स्थान पर, अधिमानतः खुले आकाश के नीचे, आराम से बैठ जाएं। आँखें बंद कर लें।
- भीतरी आकाश को महसूस करें: अपना ध्यान अपने सिर के शीर्ष पर या उससे थोड़ा ऊपर (द्वादशांत) ले जाएं। वहां एक शांत और खाली स्थान, एक आंतरिक आकाश को महसूस करें।
- बाहरी आकाश को महसूस करें: अब, अपनी बंद आँखों से ही, अपने चारों ओर फैले हुए अनंत बाहरी आकाश को महसूस करें।
- दोनों को एक होता हुआ देखें: अब कल्पना करें कि आपके शरीर की सीमाएं घुल रही हैं। आपके भीतर का आकाश और बाहर का आकाश एक-दूसरे में मिल रहे हैं। देखें कि दोनों के बीच कोई विभाजन नहीं है, वे एक ही हैं।
- एकता में ठहरें: इस 'एक-आकाश' की भावना में ठहर जाएं। जब केवल एक ही अनंत विस्तार है, तो 'मैं' कहाँ है? 'देखने वाला' कौन है? इस प्रश्न के साथ गहरे मौन में उतर जाएं।
यह विधि 'लघु' और 'विभु' (छोटे और विशाल) के द्वैत को तोड़ने पर आधारित है। हमारा अहं हमें यह महसूस कराता है कि 'मैं' इस शरीर के अंदर एक छोटी सी इकाई हूँ और 'ब्रह्मांड' मुझसे बाहर एक विशाल इकाई है। यह विधि इस भ्रम को तोड़ती है।
उपनिषदों का महावाक्य है - 'तत् त्वम् असि' (That Thou Art), अर्थात 'वह (ब्रह्मांडीय चेतना) तुम ही हो'। यह विधि उसी महावाक्य का एक व्यावहारिक प्रयोग है। जब हम अनुभव करते हैं कि हमारे भीतर की चेतना और ब्रह्मांड की चेतना एक ही है, तो हमारा छोटा 'मैं' (अहं) बड़े 'मैं' (आत्मा/ब्रह्म) में विलीन हो जाता है। इस विलीनीकरण के साथ ही सभी भय, चिंताएं और असुरक्षाएं भी समाप्त हो जाती हैं।
विधि 25: किसी भी दिशा में खो जाना
"क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्दृष्टिं निवर्तयेत्। तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत्॥"
शिव कहते हैं: "हे देवी! किसी वस्तु पर दृष्टि को टिकाकर, फिर धीरे-धीरे उसे वहां से हटा लो। तब वह ज्ञान, चित्त सहित, शून्य के आलय (घर) में स्थित हो जाता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह 'त्राटक' (Trataka) का एक बहुत ही अनूठा और उन्नत रूप है। सामान्य त्राटक में हम किसी वस्तु पर लगातार देखते रहते हैं। लेकिन शिव यहाँ एक कदम आगे जाते हैं। वे कहते हैं:
- पहले किसी वस्तु पर (जैसे एक फूल, एक दीये की लौ, या दीवार पर एक बिंदु) पर अपनी दृष्टि को पूरी तरह से केंद्रित करो।
- कुछ देर देखने के बाद, धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कर लो, लेकिन अपना ध्यान उसी स्थान पर बनाए रखो जहाँ वह वस्तु थी।
- अब, धीरे-धीरे उस 'आंतरिक छवि' से भी अपना ध्यान हटा लो।
जब आप वस्तु से और फिर उसकी छवि से भी ध्यान हटा लेते हैं, तो पीछे क्या बचता है? केवल एक खालीपन, एक शून्य। शिव कहते हैं कि उस क्षण में, वस्तु का 'ज्ञान' और आपका 'चित्त' (मन), दोनों ही उस शून्य में विलीन हो जाते हैं। वही शून्यता का घर भैरव है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- एक वस्तु चुनें: अपने सामने लगभग 3-4 फीट की दूरी पर एक छोटी सी वस्तु रखें। एक काला बिंदु या एक दीये की लौ सबसे अच्छी है।
- अपलक देखें: बिना पलक झपकाए उस वस्तु को तब तक देखें जब तक आपकी आँखों में हल्का सा पानी न आने लगे।
- आँखें बंद करें: अब धीरे से अपनी आँखें बंद कर लें। आपको अपनी बंद आँखों के सामने उस वस्तु की एक 'आंतरिक छवि' (after-image) दिखाई देगी।
- आंतरिक छवि को देखें: अब अपना पूरा ध्यान उस आंतरिक छवि पर केंद्रित करें। उसे तब तक देखते रहें जब तक वह धीरे-धीरे घुल न जाए और पूरी तरह से गायब न हो जाए।
- शून्य में ठहरें: जैसे ही वह छवि गायब हो, आपके सामने केवल एक अंधकारपूर्ण शून्य बचेगा। उस शून्य में, उस खालीपन में ठहर जाएं। कोई प्रयास न करें, बस उस शून्य के साथ एक हो जाएं।
यह विधि 'विषय' (object) से 'विषयी' (subject) की ओर, और फिर विषयी से भी परे जाने की एक क्रमिक प्रक्रिया है।
जब हम बाहरी वस्तु को देखते हैं, तो हमारा मन 'बहिर्मुखी' होता है। जब हम आँखें बंद करके उसकी आंतरिक छवि को देखते हैं, तो हमारा मन 'अंतर्मुखी' हो जाता है। और जब वह आंतरिक छवि भी विलीन हो जाती है, तो मन के पास कोई 'विषय' (object) नहीं बचता। बिना विषय के मन टिक नहीं सकता, इसलिए वह अपने स्रोत, यानी शून्य या शुद्ध चेतना, में गिर जाता है। यह मन को धीरे-धीरे खाली करने की एक बहुत ही वैज्ञानिक और प्रभावी तकनीक है।
निष्कर्ष: मन ही है प्रयोगशाला
विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की ये पांच विधियाँ (21-25) हमें एक गहरा सत्य सिखाती हैं: ध्यान के लिए हमें किसी बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं है, हमारा मन ही हमारी सबसे बड़ी प्रयोगशाला है और हमारी कल्पना ही सबसे शक्तिशाली उपकरण है।
चाहे हम कल्पना में ब्रह्मांड को भस्म करें, या शरीर को आकाशमय अनुभव करें, या फिर किसी वस्तु को देखकर शून्य में उतर जाएं - ये सभी विधियाँ हमें एक ही लक्ष्य की ओर ले जाती हैं: मन की सीमाओं को तोड़ना और उस परम चेतना का अनुभव करना जो हम वास्तव में हैं।
तंत्र का मार्ग हमें याद दिलाता है कि जो शक्ति ब्रह्मांड की रचना कर सकती है, वही शक्ति हमें मुक्ति भी दिला सकती है। उस शक्ति का नाम है - कल्पना। होशपूर्वक की गई कल्पना ही ध्यान बन जाती है।