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विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (साक्षी भाव और अद्वैत) | भाग 6

द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाने वाली चेतना की विधियाँ। विज्ञान भैरव तंत्र के इस छठे भाग में, भगवान शिव हमें साक्षी भाव (Witnessing) और अद्वैत (Non-duality) की 5 गहन विधियाँ सिखाते हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (साक्षी भाव और अद्वैत) | भाग 6
विज्ञान भैरव तंत्र: साक्षी भाव और अद्वैत

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी इस अद्भुत यात्रा में, हमने अब तक श्वास, ऊर्जा, इंद्रियों, शून्यता और मन की शक्तियों पर आधारित 25 विधियों को समझा। अब, इस छठे भाग में, भगवान शिव हमें साधना के उस स्तर पर ले जा रहे हैं जहाँ 'करने' (Doing) से अधिक महत्वपूर्ण 'देखना' (Seeing) हो जाता है।

ये विधियाँ साक्षी भाव (Witnessing Consciousness) और अद्वैत (Non-duality) के सिद्धांत पर आधारित हैं। हम अक्सर दुनिया को 'मैं' और 'वह' (I and That) के द्वैत में देखते हैं। लेकिन ये विधियाँ हमें उस केंद्र पर खड़ा करती हैं जहाँ देखने वाला और देखा जाने वाला एक हो जाते हैं। यहाँ शिव हमें हृदय के केंद्र में उतरने और दुनिया को एक नए नजरिए से देखने की कला सिखाते हैं।

जब आप केवल एक 'साक्षी' बन जाते हैं, तो सुख और दुःख, अच्छा और बुरा, मित्र और शत्रु - ये सभी भेद मिट जाते हैं। जो शेष रहता है, वह केवल शुद्ध अस्तित्व या भैरव-चेतना है।

इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 26 से 30 की गहन पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे अपने हृदय में उतरना है, कैसे वस्तुओं के सार को देखना है, और कैसे द्वैत के भ्रम को तोड़ना है।

विधि 26: हृदय-कमल में चित्त की स्थिरता

"किंचिदङ्गं विभीद्यैवं तीक्ष्णबुद्ध्या सुशूखया। तत्रैव चेतो निक्षिप्य भैरवाय प्रचक्षते॥"

शिव कहते हैं: "अपने हृदय-स्थान में (या किसी अंग में) तीक्ष्ण बुद्धि (एकाग्रता) से, जैसे सुई से भेदा जाता है, वैसे ही वहां चित्त को निक्षिप्त (स्थिर) करने से, भैरव-रूप प्रकट होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह एक बहुत ही शक्तिशाली धारणा (Dharana) है जो एकाग्रता की तीव्रता पर निर्भर करती है। शिव कहते हैं कि अपने हृदय को चेतना का केंद्र मान लो। अब कल्पना करो कि आपकी बुद्धि या ध्यान एक बहुत ही तीक्ष्ण सुई (needle) की तरह है।

जैसे एक सुई किसी कपड़े को भेदकर उसके आर-पार निकल जाती है, ठीक वैसे ही अपने ध्यान को पूरी तीव्रता के साथ हृदय के केंद्र में 'गाड़' दो। वहां कोई भी विचार नहीं, कोई भावना नहीं, बस एक तीक्ष्ण, चुभती हुई एकाग्रता। जब आप अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा को एक ही बिंदु (हृदय) पर इस तरह केंद्रित कर देते हैं, तो मन का विस्तार रुक जाता है और आप अपने केंद्र में स्थित हो जाते हैं।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें: किसी शांत स्थान पर सीधे बैठ जाएं और अपनी आँखें बंद कर लें।
  2. हृदय को महसूस करें: अपना ध्यान अपनी छाती के बीचों-बीच, अनाहत चक्र या भौतिक हृदय के स्थान पर ले जाएं।
  3. ध्यान को सुई बनाएं: कल्पना करें कि आपका ध्यान एक लेज़र बीम या एक तीक्ष्ण सुई की तरह बन गया है।
  4. भेदने की क्रिया: अब, उस तीक्ष्ण ध्यान से अपने हृदय के केंद्र को भेदने का प्रयास करें। कल्पना करें कि आप उस बिंदु के भीतर गहरे और गहरे उतर रहे हैं।
  5. स्थिर हो जाएं: जैसे ही आप उस केंद्र बिंदु पर पहुंचते हैं, वहां अपनी चेतना को पूरी तरह से स्थिर कर दें। बाकी दुनिया को भूल जाएं, बस उस एक बिंदु पर बने रहें।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

हमारा मन हमेशा 'सतह' (surface) पर रहता है, परिधि पर घूमता रहता है। यह विधि मन को परिधि से केंद्र (center) की ओर ले जाने का एक तीव्र उपाय है।

हृदय को भावनाओं और आत्मा का सीट माना जाता है। जब हम 'तीक्ष्ण बुद्धि' का प्रयोग करते हैं, तो हम अपनी मानसिक ऊर्जा को बिखराव से रोककर उसे एक लेज़र की तरह शक्तिशाली बना देते हैं। यह 'एकाग्रता' (Concentration) से 'ध्यान' (Meditation) की ओर जाने का मार्ग है। एकाग्रता एक प्रयास है, जबकि उस बिंदु पर स्थिर हो जाना ध्यान है।

विधि 27: कुंभक और शांति

"कुम्भिता रेचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत्। तदन्ते शान्तनामासौ शक्त्या शान्तः प्रकाशते॥"

शिव कहते हैं: "जब (श्वास) कुंभित (अंदर या बाहर रुकी हुई), रेचित (बाहर निकली हुई) या पूरित (भरी हुई) होती है, तो उसके अंत में जो शांत अवस्था है, उस शक्ति के द्वारा शांत प्रकाश प्रकट होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि हमने भाग 1 (विधि 4) में भी संक्षेप में देखी थी, लेकिन यहाँ शिव एक अलग पहलू पर जोर दे रहे हैं - 'शांति' (Peace)। प्राणायाम में श्वास की तीन अवस्थाएं होती हैं: लेना (पूरक), छोड़ना (रेचक) और रोकना (कुंभक)।

शिव कहते हैं कि आप चाहे श्वास को अंदर रोकें, बाहर रोकें, या पूरी तरह से भरकर रोकें - महत्वपूर्ण वह 'रुकना' नहीं है, बल्कि उस रुकने के बाद जो एक 'शांति' या सन्नाटा (Silence) पैदा होता है, वह महत्वपूर्ण है। जब श्वास नहीं चल रही होती, तो शरीर के भीतर एक अजीब सी निस्तब्धता छा जाती है। उस शांति पर ध्यान दें। वह शांति ही आपका स्वभाव है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आसन ग्रहण करें: सुखासन या सिद्धासन में सीधे बैठें।
  2. गहरी श्वास लें: धीरे-धीरे और गहरी श्वास अंदर लें (पूरक)।
  3. श्वास को रोकें (कुंभक): जितनी देर सुखपूर्वक हो सके, श्वास को अंदर ही रोककर रखें। कोई जोर-जबरदस्ती न करें।
  4. शांति को सुनें: जब श्वास रुकी हुई है, तब अपने भीतर उस 'रुकावट' को महसूस न करें, बल्कि उस 'शांति' को महसूस करें जो उस रुकावट के कारण पैदा हुई है। मन के मौन को देखें।
  5. श्वास छोड़ें और दोहराएं: धीरे-धीरे श्वास छोड़ें। आप चाहें तो श्वास को बाहर रोककर (बाह्य कुंभक) भी यही प्रयोग कर सकते हैं।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

श्वास और विचार (thought) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब श्वास चलती है, तो विचार चलते हैं। जब श्वास रुकती है, तो विचारों का प्रवाह भी खंडित हो जाता है।

इस विधि में हम श्वास को रोकने का उपयोग एक 'ब्रेक' के रूप में करते हैं। जैसे ही हम ब्रेक लगाते हैं, मन की गति शून्य हो जाती है। उस शून्य गति के क्षण में जो अनुभव होता है, वह न तो शरीर है और न ही मन - वह शुद्ध 'शांति' या आत्मा है। यह विधि तनाव (stress) को तत्काल कम करने के लिए भी अत्यंत प्रभावी है।

विधि 28: सब कुछ प्रकाशमय देखना (साक्षी भाव)

"एवमेव दुःसाध्यासु स्वकीयसुखदासु च। चिन्तासु च प्रसादं च भावयेद् भैरवोदयः॥"

शिव कहते हैं: "इसी प्रकार, जो (परिस्थितियां) दुःसाध्य (कष्टकर) हैं, या जो अपना सुख देने वाली हैं - उन चिंताओं के बीच में प्रसाद (प्रसन्नता या समभाव) की भावना करने से भैरव का उदय होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह एक विशुद्ध मनोवैज्ञानिक विधि है। जीवन द्वंद्वों (duality) से भरा है - सुख और दुःख, अच्छा और बुरा, मित्र और शत्रु। हम आमतौर पर सुख को पकड़ते हैं और दुःख को धकेलते हैं। शिव कहते हैं कि दोनों स्थितियों में समान रहो।

चाहे कोई परिस्थिति आपको बहुत कष्ट दे रही हो (दुःसाध्या), या कोई बात आपको बहुत सुख दे रही हो (सुखदासु) - उन दोनों के बीच में, उन चिंताओं या विचारों के मध्य में, एक 'प्रसाद' भाव लाओ। 'प्रसाद' का अर्थ है - प्रसन्नता, शांति, निर्मलता और समभाव। न तो दुःख से दुखी हो, न सुख से बहुत उत्तेजित। बस देखो। उस देखने वाले (साक्षी) में ही भैरव हैं।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. जागरूक बनें: जब भी आपके जीवन में कोई बहुत अच्छी या बहुत बुरी घटना घटे, तो तुरंत प्रतिक्रिया न करें। रुकें।
  2. भावना को देखें: अगर गुस्सा आ रहा है, तो देखें 'गुस्सा आ रहा है'। अगर खुशी हो रही है, तो देखें 'खुशी हो रही है'।
  3. पहचान तोड़ें: यह मत कहें "मैं दुखी हूँ"। कहें "दुःख है"। अपने आप को उस भावना से अलग कर लें।
  4. मध्य में ठहरें: सुख और दुःख के बीच में जो एक शांत स्थान है, जहाँ आप केवल एक दर्शक हैं, उस स्थान को खोजें और वहीं ठहर जाएं।
  5. स्वीकार करें: जो भी हो रहा है, उसे ईश्वर का 'प्रसाद' मानकर स्वीकार करें। इस स्वीकृति में ही मुक्ति है।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

यह विधि भगवद गीता के 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाला) और बौद्ध धर्म के 'उपेक्षा' (Equanimity) के सिद्धांत के समान है। मनोविज्ञान कहता है कि हम घटनाओं से दुखी नहीं होते, बल्कि घटनाओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया (reaction) से दुखी होते हैं।

जब हम 'साक्षी' बन जाते हैं, तो हम प्रतिक्रिया करना बंद कर देते हैं। हम घटनाओं को वैसे ही देखते हैं जैसे एक दर्पण अपने सामने आने वाली चीजों को देखता है - बिना जुड़े, बिना प्रभावित हुए। यह तटस्थता हमें भावनाओं के बवंडर से बचाकर शांति के केंद्र में रखती है।

विधि 29: सब कुछ त्याग देने का भाव

"सर्वं देहं चिन्मयम् हि जगद्वा परिभावयेत्। युगपन्नर्विकलपेन मनसा परमोदयः॥"

शिव कहते हैं: "सब कुछ त्याग कर (शरीर, जगत् आदि के भेद को छोड़कर), यह भावना करे कि यह संपूर्ण जगत् और देह चिन्मय (चेतना से भरा हुआ) है। इस प्रकार युगपत (एक साथ) निर्विकल्प मन से परम (भैरव) का उदय होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह अद्वैत (Non-duality) की सर्वोच्च विधि है। सामान्यतः हम दुनिया को 'जड़' (matter) और 'चेतन' (consciousness) में बांटते हैं। हम मानते हैं कि शरीर और पत्थर जड़ हैं, और आत्मा चेतन है। शिव कहते हैं, इस भेद को त्याग दो।

यह मत सोचो कि भगवान कहीं और है और दुनिया कहीं और। यह महसूस करो कि सब कुछ - यह कुर्सी, यह दीवार, तुम्हारा शरीर, तुम्हारे विचार - सब कुछ उसी एक 'चेतना' (Chaitanya) या 'प्रकाश' से बना है। सब कुछ चिन्मय है। जब तुम हर चीज में उसी एक ऊर्जा को देखने लगते हो, तो मन के पास भेद करने के लिए कुछ नहीं बचता और वह निर्विकल्प (विचार-शून्य) हो जाता है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें और देखें: अपनी आँखें खुली रखें और अपने आसपास की चीजों को देखें।
  2. धारणा बदलें: मेज को देखें, लेकिन उसे 'लकड़ी' न समझें। उसे 'सघन चेतना' या जमी हुई ऊर्जा के रूप में देखें।
  3. शरीर को देखें: अपने हाथ को देखें। इसे मांस और हड्डी न समझें। इसे भी उसी चेतना का एक रूप मानें।
  4. एकता का अनुभव करें: महसूस करें कि देखने वाला (आप) और देखा जाने वाला (वस्तु), दोनों एक ही सामग्री से बने हैं। जैसे समुद्र में बर्फ का टुकड़ा तैर रहा हो - दोनों ही जल हैं।
  5. भेद मिटा दें: जब 'मैं' और 'वह' का भेद मिट जाए, और केवल 'एक' ही बचे, उस अद्वैत अनुभव में डूब जाएं।
विधि के पीछे का विज्ञान और दर्शन

आधुनिक विज्ञान (Quantum Physics) भी यही कहता है कि पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) अलग नहीं हैं। सब कुछ ऊर्जा ही है, जो अलग-अलग रूपों में कम्पन कर रही है। यह विधि उसी वैज्ञानिक सत्य का आध्यात्मिक अनुभव है।

जब हम सब कुछ 'चेतना' के रूप में देखते हैं, तो हमारा संघर्ष खत्म हो जाता है। हम किसी से नफरत नहीं कर सकते, किसी से डर नहीं सकते, क्योंकि सब कुछ 'वही' तो है। यह दृष्टि हमें परम प्रेम और एकता की अवस्था में ले जाती है।

विधि 30: प्राण-शक्ति का एकीकरण

"वायुद्वयस्य संघट्टात् अन्तर्वा बहिरन्ततः। योगी समरसत्वं च भजते भैरवात्मनः॥"

शिव कहते हैं: "दो वायुओं (प्राण और अपान) के संघट्ट (टकराव या मिलन) से, चाहे वह अंत में अंदर हो या बाहर, योगी भैरव-स्वरूप समरसता (समता) को प्राप्त होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि हठ योग और तंत्र का संगम है। हमारे शरीर में दो मुख्य प्राण-धाराएं हैं:

  • प्राण (ऊपर जाने वाली वायु) और
  • अपान (नीचे जाने वाली वायु)। सामान्यतः ये एक-दूसरे से विपरीत दिशा में बहती हैं।

शिव कहते हैं कि ध्यान के माध्यम से इन दोनों विरोधी धाराओं को मिला दो। जब प्राण और अपान आपस में मिलते हैं (संघट्ट), तो एक जबरदस्त ऊर्जा उत्पन्न होती है, ठीक वैसे ही जैसे दो पत्थरों को टकराने से चिंगारी निकलती है या धन और ऋण (positive and negative) तारों के मिलने से बिजली पैदा होती है। यह मिलन शरीर के भीतर एक संतुलन (समरसता) पैदा करता है, जहाँ योगी को द्वैत से मुक्ति मिलती है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. सीधे बैठें: रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखकर बैठें।
  2. प्राण को महसूस करें: श्वास लेते समय महसूस करें कि ऊर्जा ऊपर की ओर उठ रही है (प्राण)।
  3. अपान को महसूस करें: श्वास छोड़ते समय या निचले अंगों पर ध्यान देते समय नीचे जाने वाली ऊर्जा (अपान) को महसूस करें।
  4. मिलन की कल्पना करें: अब नाभि केंद्र (Manipura Chakra) पर ध्यान केंद्रित करें। कल्पना करें कि ऊपर की ऊर्जा नीचे आ रही है और नीचे की ऊर्जा ऊपर जा रही है, और दोनों नाभि पर आकर मिल रही हैं।
  5. टकराव को महसूस करें: जैसे ही ये दोनों ऊर्जाएं मानसिक रूप से मिलती हैं, वहां एक विस्फोट या गर्मी को महसूस करें। उस ऊर्जा के केंद्र में स्थिर हो जाएं।
विधि के पीछे का विज्ञान और दर्शन

यह विधि 'विपरीत' को मिलाने का विज्ञान है। जीवन विरोधाभासों से बना है - दिन-रात, जीवन-मृत्यु, पुरुष-स्त्री। जब तक ये अलग हैं, संघर्ष है। जब ये मिल जाते हैं, तो एक तीसरी, उच्चतर शक्ति का जन्म होता है।

प्राण और अपान का मिलन कुंडलिनी जागरण की कुंजी है। जब ये दोनों धाराएं मिलती हैं, तो वे सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है। यह 'समरसता' की अवस्था है, जहाँ सभी विरोध समाप्त हो जाते हैं।

निष्कर्ष: द्वैत से अद्वैत की ओर

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की ये पांच विधियाँ (26-30) हमें साधना के एक बहुत ही परिपक्व स्तर पर ले जाती हैं। यहाँ शिव हमें सिखाते हैं कि सच्चा ध्यान आँख बंद करके दुनिया से भागना नहीं है, बल्कि दुनिया को एक नई दृष्टि से देखना है।

चाहे वह हृदय में एकाग्रता हो, श्वास का कुंभक हो, सुख-दुःख में समभाव हो, या सब कुछ को चेतना मानना हो - ये सभी विधियाँ हमें 'द्वैत' (Duality) के भ्रम से निकालकर 'अद्वैत' (Non-duality) के सत्य में स्थापित करती हैं।

जब देखने वाला और दृश्य एक हो जाते हैं, जब सुख और दुःख एक समान लगते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में 'योगी' बनते हैं। अपनी साधना जारी रखें, क्योंकि अगला कदम और भी गहरे रहस्यों की ओर है।

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