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विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (शून्यता और प्रकाश) | भाग 4

बाहरी और भीतरी आकाश में ही चेतना का विस्तार छिपा है। विज्ञान भैरव तंत्र के इस चौथे भाग में, भगवान शिव हमें शून्यता (Void) और प्रकाश (Light) के माध्यम से समाधि में उतरने की 5 अद्भुत विधियाँ बताते हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (शून्यता और प्रकाश) | भाग 4
विज्ञान भैरव तंत्र: शून्यता और प्रकाश पर ध्यान

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी गहन यात्रा के पिछले भागों में, हमने श्वास (भाग 1), ऊर्जा केंद्रों (भाग 2), और इंद्रियों तथा भावनाओं (भाग 3) पर आधारित विधियों को समझा।

अब, इस चौथे भाग में, भगवान शिव हमें और भी गहरे तथा निराकार (formless) अनुभवों की ओर ले जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे 'कुछ' पर ध्यान करने से आगे बढ़कर 'कुछ नहीं' पर ध्यान किया जाए। यह विधियाँ शून्यता (Void/Emptiness) और प्रकाश (Light) के रहस्यों पर केंद्रित हैं - वे दो परम तत्व जिनसे यह संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकट होता है।

तंत्र कहता है कि जब मन के पास पकड़ने के लिए कोई वस्तु (विचार, भावना या संवेदना) नहीं होती, तभी वह अपने स्रोत, यानी शुद्ध चेतना, में वापस लौटता है। शून्यता और प्रकाश उसी स्रोत के दो मुख हैं।

इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 16 से 20 की पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे नीले आकाश को देखना, अपनी आंखों के अंधकार में डूबना, या आंतरिक प्रकाश का अनुभव करना भी ध्यान की गहनतम अवस्थाओं के द्वार बन सकते हैं।

विधि 16: बादलों से रहित आकाश में ध्यान

"निर्मले गगने देवि मनः कृत्वा निराश्रयम्। भैरवीशक्तिसंस्पर्शाद् भैरवात्मा भवेद् ध्रुवम्॥"

शिव कहते हैं: "हे देवी! निर्मल (बादलों रहित) आकाश में मन को निराश्रय (बिना किसी सहारे के) करके, भैरवी शक्ति के स्पर्श से साधक निश्चित रूप से भैरव-स्वरूप हो जाता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह एक बहुत ही सुंदर और खुली आंखों से की जाने वाली ध्यान विधि है। शिव कहते हैं कि एक साफ, नीले आकाश को देखो, जहाँ कोई बादल न हो। उसे बस देखते रहो, बिना किसी विचार के, बिना किसी विश्लेषण के।

'मन को निराश्रय करके' का अर्थ है, मन को कोई आलंबन या सहारा मत दो। उसे किसी विचार, किसी मंत्र या किसी छवि पर टिकने मत दो। बस उस अंतहीन नीले विस्तार में अपने मन को खो जाने दो। जैसे-जैसे आप उस शून्यता को देखते हैं, आपका मन भी धीरे-धीरे उसी आकाश की तरह विशाल, शांत और शून्य होने लगता है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. सही समय चुनें: सुबह या शाम का समय जब आकाश साफ और नीला हो, सबसे अच्छा है।
  2. आराम से लेट जाएं: किसी खुली जगह, जैसे पार्क या छत पर, पीठ के बल आराम से लेट जाएं ताकि आपको आकाश को देखने के लिए अपनी गर्दन पर जोर न डालना पड़े।
  3. अपलक देखें: अपनी आंखों को आकाश पर टिका दें। पलकें झपकाएं, लेकिन अपना ध्यान आकाश से न हटाएं। किसी एक बिंदु पर नहीं, बल्कि पूरे विस्तार पर एक साथ ध्यान दें।
  4. मन को आकाश में घोल दें: कल्पना करें कि आपका मन, आपके विचार, आपकी चिंताएं... सब कुछ उस नीले आकाश में घुल रहा है, विलीन हो रहा है। धीरे-धीरे, देखने वाले (आप) और देखे जाने वाले (आकाश) के बीच का अंतर मिटने लगेगा।
  5. शून्यता का अनुभव करें: एक क्षण ऐसा आएगा जब केवल नीला विस्तार ही बचेगा और 'आप' नहीं होंगे। वही शून्यता का अनुभव भैरव-चेतना का स्पर्श है।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

हमारा मन वैसा ही हो जाता है जैसा हम देखते हैं। जब हम भीड़-भाड़ वाली जगह को देखते हैं, तो हमारा मन भी अशांत हो जाता है। जब हम एक शांत, विशाल और खाली आकाश को देखते हैं, तो हमारा मन भी उसकी गुणवत्ता को ग्रहण कर लेता है और शांत तथा विशाल होने लगता है।

'निराश्रय' होना मन के लिए सबसे कठिन काम है, क्योंकि वह हमेशा किसी न किसी सहारे (विचार) की तलाश में रहता है। यह विधि मन को उसके सहारे से वंचित कर देती है। जब मन के पास कोई सहारा नहीं बचता, तो वह गिर जाता है - और मन का गिरना ही ध्यान है। उस क्षण में, 'भैरवी शक्ति' (आपकी चेतना) 'भैरव' (परम अस्तित्व) का स्पर्श करती है।

विधि 17: आंतरिक अंधकार में विलीन होना

"लीनमूर्ध्नि वियुक्तस्य तिमिरे भैरवं वपुः। युगान्तदहनोद्भूतं ध्यात्वा सर्वं लयं व्रजेत्॥"

शिव कहते हैं: "सिर को लीन करके (आँखें बंद करके), युगान्त की अग्नि से उत्पन्न हुए अंधकार में भैरव के स्वरूप का ध्यान करो। ऐसा करने से सब कुछ (उसी अंधकार में) विलीन हो जाता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह एक बहुत ही सरल लेकिन गहन अंतर्मुखी विधि है। शिव कहते हैं कि अपनी आँखें बंद कर लो। जब आप आँखें बंद करते हैं, तो आपको क्या दिखाई देता है? - एक गहरा, मखमली अंधकार। आमतौर पर हम इस अंधकार से डरते हैं या इसे अनदेखा कर देते हैं। लेकिन शिव कहते हैं कि यही अंधकार भैरव का स्वरूप है।

'युगान्त की अग्नि से उत्पन्न अंधकार' का अर्थ है महाप्रलय का अंधकार - वह परम अंधकार जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है और जिससे पुनः सृष्टि का जन्म होता है। यह वही रचनात्मक शून्य (creative void) है। शिव कहते हैं कि उस आंतरिक अंधकार से डरो मत, उसमें डूब जाओ। कल्पना करो कि तुम, तुम्हारा शरीर, तुम्हारे विचार... सब कुछ उसी अंधकार में विलीन हो रहा है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. अंधेरे कमरे में बैठें: किसी शांत और अंधेरे कमरे में आराम से बैठ जाएं। यदि संभव हो तो रात का समय चुनें।
  2. आँखें बंद करें: अपनी आँखें कोमलता से बंद कर लें, उन पर कोई दबाव न डालें।
  3. अंधकार को देखें: अपनी बंद आँखों के सामने फैले हुए अंधकार को देखें। शुरुआत में आपको कुछ रंग या आकृतियाँ दिख सकती हैं। उन्हें बस देखें, बिना कोई निर्णय लिए। धीरे-धीरे वे शांत हो जाएंगी और केवल शुद्ध अंधकार बचेगा।
  4. अंधकार में प्रवेश करें: अब कल्पना करें कि आप उस अंधकार में प्रवेश कर रहे हैं, या वह अंधकार आपके भीतर प्रवेश कर रहा है। महसूस करें कि आपकी सीमाएं मिट रही हैं और आप उस अनंत अंधकार का ही हिस्सा बन रहे हैं।
  5. विलीन हो जाएं: उस अंधकार में पूरी तरह से खो जाएं। देखने वाला और अंधकार एक हो जाएं। जब केवल अंधकार ही बचता है, तो मन भी उसी में खो जाता है। वही शांतिपूर्ण विलीनीकरण भैरव-चेतना है।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

हमारी आँखें लगातार प्रकाश और रूपों को पकड़ने के लिए प्रशिक्षित हैं। जब हम आँखें बंद करते हैं और उन्हें कोई 'वस्तु' देखने को नहीं मिलती, तो मन बेचैन हो जाता है। यह विधि मन को 'अ-वस्तु' (no-thing) या शून्यता में स्थिर होने का प्रशिक्षण देती है।

अंधकार विश्राम का प्रतीक है। दिन भर की भाग-दौड़ के बाद हम रात के अंधेरे में ही सोते हैं। यह विधि हमारी चेतना को गहरा विश्राम देती है। जब चेतना पूरी तरह से विश्राम में होती है, तो वह अपनी ऊर्जा को पुनः प्राप्त करती है और अपने मूल स्रोत से जुड़ जाती है। यह डर से मुक्ति पाने की एक शक्तिशाली तकनीक है, क्योंकि जब आप अंधकार से मित्रता कर लेते हैं, तो दुनिया का कोई भी भय आपको प्रभावित नहीं कर सकता।

विधि 18: युगान्त की अग्नि का ध्यान

"युगान्तार्कहुताशेन कालानलरुचिना पुरा। ध्यात्वा विश्वं च तत्सर्वं देहे तु लयमागतम्॥"

शिव कहते हैं: "पहले युगान्त के सूर्य और कालाग्नि की रुचि (प्रभा) से संपूर्ण विश्व को देखो, और फिर ध्यान करो कि वह सब कुछ तुम्हारे देह में विलीन हो गया है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह एक बहुत ही शक्तिशाली और कल्पना पर आधारित 'विपरीत' ध्यान विधि है। पिछली विधियों में हम स्वयं को शून्य में विलीन कर रहे थे। इस विधि में, शिव हमें पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर विलीन करने के लिए कहते हैं।

शिव कहते हैं कि कल्पना करो कि 'युगान्त' या महाप्रलय का समय आ गया है। 'कालाग्नि' (समय की अग्नि) सब कुछ जला रही है - पहाड़, नदियाँ, सूर्य, तारे, संपूर्ण ब्रह्मांड। अब, ध्यान करो कि यह जलता हुआ पूरा ब्रह्मांड तुम्हारे भीतर समा रहा है, तुम्हारी छोटी सी देह में विलीन हो रहा है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें: आँखें बंद करके शांत भाव से बैठ जाएं।
  2. महाप्रलय की कल्पना करें: कल्पना करें कि प्रलय की अग्नि चारों ओर फैल रही है। आपके आसपास की हर चीज - घर, शहर, देश, पृथ्वी - सब कुछ उस अग्नि में भस्म हो रहा है।
  3. ब्रह्मांड को भस्म होते देखें: अब अपनी कल्पना का विस्तार करें। देखें कि सूर्य, चंद्रमा और तारे भी उसी कालाग्नि में जलकर राख हो रहे हैं। चारों ओर केवल भस्म और ऊर्जा ही शेष है।
  4. सब कुछ को भीतर खींचें: अब कल्पना करें कि यह जलता हुआ, विलीन होता हुआ पूरा ब्रह्मांड आपके शरीर के भीतर समा रहा है। आप एक विशाल 'ब्लैक होल' की तरह हैं जो सब कुछ अपने में खींच रहा है।
  5. 'मैं' के भाव का अनुभव करें: जब सब कुछ आपके भीतर समा गया है, तो क्या शेष बचता है? केवल आपका अस्तित्व, आपकी शुद्ध चेतना - 'मैं हूँ'। उस 'अहं ब्रह्मास्मि' के भाव में ठहर जाएं।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

यह विधि हमारे 'अहं' (Ego) की सीमाओं को तोड़ने के लिए एक 'शॉक थेरेपी' की तरह काम करती है। हमारा अहं हमें यह विश्वास दिलाता है कि 'मैं' इस विशाल दुनिया में एक छोटा सा, कमजोर हिस्सा हूँ। यह विधि इस धारणा को पूरी तरह से उलट देती है।

जब आप कल्पना करते हैं कि पूरा ब्रह्मांड आपके भीतर समा रहा है, तो आप अपने छोटे से 'मैं' से मुक्त हो जाते हैं और अपनी ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव करते हैं। यह वेदांत का वही सिद्धांत है जो कहता है - 'पिण्डे सो ब्रह्माण्डे' (जो इस शरीर में है, वही पूरे ब्रह्मांड में है)। इस अनुभव से, दुनिया की छोटी-छोटी समस्याएं, चिंताएं और भय महत्वहीन हो जाते हैं, क्योंकि आप उनसे बहुत बड़े हो जाते हैं।

विधि 19: शरीर को आकाशमय मानना

"एवमेव स्वकं देहं चिन्तयेद्व्याप्तितो यदि। निराधारं मनः कृत्वा व्योमव्यापी भवेत् तदा॥"

शिव कहते हैं: "इसी प्रकार, यदि अपने देह को व्याप्ति से (सर्वत्र फैला हुआ) चिंतवन करे, और मन को निराधार करके, तब वह (साधक) आकाश-व्यापी हो जाता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि पिछली विधि का ही एक और रूप है, लेकिन यह अधिक सरल और भीतरी है। पिछली विधि में हम पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर ला रहे थे। इस विधि में, शिव कहते हैं कि केवल अपने शरीर पर ध्यान केंद्रित करो और उसे आकाश की तरह शून्य और पारदर्शी मानो।

कल्पना करो कि आपका शरीर मांस, रक्त और हड्डियों का ठोस ढांचा नहीं है, बल्कि यह केवल एक खोखली रूपरेखा है, जिसके भीतर अनंत आकाश भरा हुआ है। आपके भीतर और आपके बाहर एक ही आकाश है, और आपके शरीर की त्वचा केवल एक पतली सी रेखा है जो इन दोनों को अलग करने का भ्रम पैदा कर रही है। 'मन को निराधार करके' का अर्थ है, मन को इस विचार पर टिकाने का कोई प्रयास न करो, बस इस 'आकाशमय' होने के भाव में डूब जाओ।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. शवासन में लेट जाएं: पीठ के बल आराम से लेट जाएं, शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। आँखें बंद कर लें।
  2. शरीर को महसूस करें: पहले अपने पूरे शरीर के भार को पृथ्वी पर महसूस करें। सिर से लेकर पैर तक हर अंग के प्रति सजग हो जाएं।
  3. शरीर को खोखला करें: अब कल्पना करें कि आपका शरीर धीरे-धीरे भीतर से खोखला हो रहा है। आपके पैरों के भीतर, पेट के भीतर, छाती और सिर के भीतर... सब कुछ खाली होता जा रहा है।
  4. आकाश को भरने दें: कल्पना करें कि नीला, शांत आकाश आपके पैरों से प्रवेश कर रहा है और आपके पूरे खोखले शरीर को भर रहा है। अब आपके भीतर और बाहर एक ही आकाश है। आपकी त्वचा केवल एक पारदर्शी झिल्ली मात्र रह गई है।
  5. सीमाओं को मिटा दें: अंत में, कल्पना करें कि आपकी त्वचा की वह सीमा भी घुल गई है। अब आप एक शरीर नहीं, बल्कि अनंत आकाश का ही एक हिस्सा हैं। इस विस्तार और शून्यता के अनुभव में विश्राम करें।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

आधुनिक भौतिकी (Quantum Physics) भी यही कहती है कि हमारा शरीर 99.99% खाली स्थान (empty space) है। अणु और परमाणु के बीच में विशाल दूरी है। यह विधि हमें उसी वैज्ञानिक सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कराती है।

मनोवैज्ञानिक रूप से, हमारी सारी चिंताएं और भय हमारे 'शरीर-भाव' (body-identification) से जुड़े हैं - 'मैं बीमार हो जाऊंगा', 'मैं बूढ़ा हो जाऊंगा', 'मैं मर जाऊंगा'। जब हम ध्यान में यह अनुभव करते हैं कि हम यह ठोस शरीर नहीं, बल्कि असीम आकाश हैं, तो शरीर से जुड़े सभी भय अपने आप महत्वहीन हो जाते हैं। यह 'देह-भाव' से 'आत्म-भाव' की ओर एक यात्रा है।

विधि 20: शरीर के अंगों को शून्य मानना

"स्वदेहे जगतो वापि सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि च। तत्त्वानि यान्ति निलयं ध्यात्वान्ते व्यज्यते परा॥"

शिव कहते हैं: "अपने शरीर में या जगत में, जो सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म तत्व हैं, जब वे अपने निलय (स्रोत) में विलीन हो जाते हैं, ऐसा ध्यान करने पर, अंत में 'परा' (परम चेतना) प्रकट होती है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि पिछली विधि का ही एक और गहरा और विश्लेषणात्मक रूप है। पिछली विधि में हम पूरे शरीर को एक साथ शून्य मान रहे थे। इस विधि में, शिव हमें शरीर के प्रत्येक हिस्से को - मांस, त्वचा, हड्डियां, रक्त - अलग-अलग करके, उन्हें शून्य या आकाशमय मानने के लिए कहते हैं।

यह एक 'विपश्यना' जैसी तकनीक है। आप अपने ध्यान को शरीर के एक-एक अंग पर ले जाते हैं और महसूस करते हैं कि यह ठोस नहीं है, बल्कि केवल ऊर्जा के कंपायमान कणों (vibrating particles) का एक समूह है, जिसके बीच में विशाल खाली स्थान है। जैसे-जैसे आप प्रत्येक अंग को 'शून्य' के रूप में अनुभव करते हैं, अंत में पूरा शरीर ही शून्य हो जाता है। जब शरीर का बोध समाप्त हो जाता है, तो केवल 'परा' - यानी शरीर से परे रहने वाली शुद्ध चेतना - ही शेष रह जाती है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. शवासन में लेट जाएं: पीठ के बल आराम से लेट जाएं और आँखें बंद कर लें।
  2. शरीर का अवलोकन करें: अपना ध्यान अपने दाहिने पैर के अंगूठे पर ले जाएं। उसकी ठोसता को महसूस करें।
  3. अंग को शून्य करें: अब कल्पना करें कि वह अंगूठा धीरे-धीरे पारदर्शी हो रहा है, घुल रहा है, और आकाश में विलीन हो रहा है। महसूस करें कि वहां अब अंगूठे की जगह केवल खाली स्थान है।
  4. क्रमशः आगे बढ़ें: यही प्रक्रिया धीरे-धीरे शरीर के हर अंग के साथ करें - पैर की उंगलियां, पंजा, टखना, पिंडली, घुटना... और इसी तरह सिर तक पूरे शरीर के प्रत्येक हिस्से को शून्य में विलीन करते जाएं।
  5. पूर्ण शून्यता में ठहरें: जब आपका पूरा शरीर काल्पनिक रूप से विलीन हो जाए और केवल खालीपन का एहसास बचे, उस शून्य-बोध में ठहर जाएं। वही साक्षी भाव भैरव-चेतना है।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

यह विधि बौद्ध धर्म की 'अनात्म' (no-self) की अवधारणा के बहुत करीब है। यह हमें अनुभव कराती है कि जिसे हम 'मेरा शरीर' कहते हैं, वह वास्तव में कोई स्थायी, ठोस इकाई नहीं है, बल्कि निरंतर बदल रहे तत्वों का एक संयोजन मात्र है।

मनोवैज्ञानिक रूप से, यह विधि शरीर के साथ हमारी गहरी आसक्ति (attachment) को तोड़ती है। हमारी अधिकांश पीड़ाएं शरीर से जुड़ी हैं - दर्द, बीमारी, उम्र बढ़ना, मृत्यु का भय। जब हम ध्यान में यह अनुभव करते हैं कि हम यह शरीर नहीं हैं, तो हम इन सभी पीड़ाओं से एक मनोवैज्ञानिक दूरी बना लेते हैं। यह हमें शरीर के कष्टों के बीच भी शांत और साक्षी बने रहने की क्षमता प्रदान करता है।

निष्कर्ष: शून्य ही पूर्ण है

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की ये पांच विधियाँ (16-20) हमें एक क्रांतिकारी सत्य की ओर ले जाती हैं: मुक्ति 'कुछ' पाने में नहीं, बल्कि 'सब कुछ' छोड़ने में है। यह विधियाँ हमें बाहरी और भीतरी आकाश, अंधकार, और शून्यता से मित्रता करना सिखाती हैं।

वे हमें दिखाती हैं कि जिसे हम 'खालीपन' समझकर डरते हैं, वही वास्तव में चेतना का गर्भ है, जहाँ से सब कुछ जन्मता है। जब हम अपने मन और शरीर की सीमाओं को इस परम शून्य में विलीन कर देते हैं, तभी हम अपने वास्तविक, असीम स्वरूप का अनुभव करते हैं।

तंत्र का मार्ग हमें पूर्णता की ओर ले जाता है, और उस पूर्णता का द्वार 'शून्यता' से होकर ही गुजरता है। इन विधियों का प्रयोग करें और अपने भीतर के अनंत आकाश को खोजें।

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