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Sri Gayatri Ashtakam 2 – श्री गायत्री अष्टकम् २

Sri Gayatri Ashtakam 2 – श्री गायत्री अष्टकम् २
॥ श्री गायत्री अष्टकम् २ ॥
(परम सुभगानन्दजननी स्तुतिः)
सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदां शिवामाद्यां वन्द्यां त्रिभुवनमयीं वेदजननीम् । परां शक्तिं स्रष्टुं विविधविधरूपां गुणमयीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ १ ॥ विशुद्धां सत्त्वस्थामखिलदुरवस्थादिहरणीं निराकारां सारां सुविमल तपोमूर्तिमतुलाम् । जगज्ज्येष्ठां श्रेष्ठामसुरसुरपूज्यां श्रुतिनुतां भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ २ ॥ तपोनिष्ठाभीष्टां स्वजनमनसन्तापशमनीं दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैकसुलभाम् । वरेण्यां पुण्यां तां निखिलभवबन्धापहरणीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ३ ॥ सदाराध्यां साध्यां सुमतिमतिविस्तारकरणीं विशोकामालोकां हृदयगतमोहान्धहरणीम् । परां दिव्यां भव्यामगमभवसिन्ध्वेक तरणीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ४ ॥ अजां द्वैतां त्रैतां विविधगुणरूपां सुविमलां तमोहन्त्रीं तन्त्रीं श्रुतिमधुरनादां रसमयीम् । महामान्यां धन्यां सततकरुणाशील विभवां भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ५ ॥ जगद्धात्रीं पात्रीं सकलभवसंहारकरणीं सुवीरां धीरां तां सुविमल तपोराशिसरणीम् । अनेकामेकां वै त्रिजगत्सदधिष्ठानपदवीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ६ ॥ प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनततिजाड्यापहरणीं हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीम् । सुविद्यां निरवद्याममलगुणगाथां भगवतीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ७ ॥ अनन्तां शान्तां यां भजति बुधवृन्दः श्रुतिमयीं सुगेयां ध्येयां यां स्मरति हृदि नित्यं सुरपतिः । सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रीतिवशगां भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभगानन्दजननीम् ॥ ८ ॥
॥ फलश्रुति ॥
शुद्धचित्तः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम् । अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति ॥ ९ ॥
॥ इति श्री गायत्री अष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री अष्टकम् २ - एक तात्विक परिचय

श्री गायत्री अष्टकम् २ (Sri Gayatri Ashtakam 2) माँ गायत्री की वह मधुर और गम्भीर स्तुति है जो उनके 'आनन्दमयी' स्वरूप को साधक के सम्मुख लाती है। सनातन धर्म में गायत्री को केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान-विज्ञान की जननी माना गया है। 'अष्टकम्' का अर्थ होता है आठ श्लोकों का समूह। इस विशिष्ट अष्टक में माँ गायत्री को 'परमसुभगानन्दजननी' के रूप में पूजा गया है—अर्थात् वह शक्ति जो जीवन में सौभाग्य (Prosperity) और अलौकिक आनन्द (Divine Bliss) को एक साथ प्रदान करती है।

इस स्तोत्र की रचना शैली बड़ी ही ललित और मन्त्रमयी है। प्रत्येक श्लोक माँ के एक विशेष गुण की व्याख्या करता है। जहाँ प्रथम श्लोक उन्हें 'वेदजननी' और 'त्रिभुवनमयी' बताकर उनकी ब्रह्माण्डीय सत्ता को स्थापित करता है, वहीं चतुर्थ श्लोक उन्हें 'सुमतिमतिविस्तारकरणीं' कहकर यह सिद्ध करता है कि वे ही हमारी प्रज्ञा और मेधा को विस्तार देने वाली हैं। यह अष्टक साधक को यह बोध कराता है कि जिस 'सविता' (सूर्य) के प्रकाश की हम मन्त्र में कामना करते हैं, वह साक्षात् माँ गायत्री की ही कृपा है।

आध्यात्मिक यात्रा में, यह अष्टक साधक के मन से 'जाड्य' (जड़ता) और 'मोह' के अंधकार को मिटाने वाला है। श्लोक ७ में उन्हें 'स्वजनततिजाड्यापहरणीं' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि माँ अपने भक्तों की बुद्धि की जड़ता और आलस्य को हर लेती हैं। यह पाठ उन लोगों के लिए संजीवनी के समान है जो मानसिक तनाव, भ्रम या निर्णय न ले पाने की स्थिति से गुजर रहे हैं। माँ की कृपा से साधक का चित्त गंगा के समान निर्मल और हिमालय के समान अडिग हो जाता है।

वर्तमान काल में, जब मनुष्य भौतिकता की चकाचौंध में अपनी आत्मिक शान्ति खो रहा है, श्री गायत्री अष्टकम् का पाठ उसे पुनः अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह स्तोत्र हमें याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति और आनन्द बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि उस 'आद्या शक्ति' की शरणागति में है जो 'अनन्ता' और 'शान्ता' (अनंत और शांत) है। जो भी भक्त निष्काम भाव से इसका पाठ करता है, उसे माँ गायत्री साक्षात् ब्रह्म-ज्ञान और सांसारिक अभय प्रदान करती हैं।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक आधार

गायत्री अष्टकम् २ का महत्व इसके तात्विक और मनोवैज्ञानिक गुणों में निहित है:

  • सत्त्व गुण की प्रतिष्ठा: माँ को 'सत्त्वस्थाम' (सत्त्व गुण में स्थित) कहा गया है। इसका पाठ साधक के भीतर रज और तम गुणों के विक्षेप को शांत कर सात्विकता का उदय करता है।

  • बुद्धि का परिशोधन: 'सुमतिमतिविस्तारकरणीं' के रूप में माँ गायत्री साधक की कूप-मण्डूक बुद्धि को विशाल बनाती हैं, जिससे वह सत्य और असत्य का भेद करने में सक्षम होता है।

  • भव-बन्धन से मुक्ति: माँ को 'निखिलभवबन्धापहरणीं' कहा गया है। यह स्तोत्र साधक को उन मानसिक और कर्मजन्य बन्धनों से मुक्त करता है जो उसे आत्म-साक्षात्कार से रोकते हैं।

  • ब्रह्मविद्या का स्वरूप: श्लोक ३ में माँ को साक्षात् 'ब्रह्मविद्या' कहा गया है। इसका अर्थ है कि माँ का पूजन और इस अष्टक का पाठ ही वह परा-विद्या है जिससे ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है।

फलश्रुति लाभ: त्रिविध तापों का शमन

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (९) में इसके पाठ से मिलने वाले अनन्य लाभों का वर्णन है:
१. मानसिक और बौद्धिक उत्कर्ष
माँ गायत्री 'प्रबुद्धां' (परम जाग्रत) हैं। उनके नामों का उच्चारण साधक की मानसिक शक्तियों को केंद्रित करता है, जिससे स्मरण शक्ति, एकाग्रता और तार्किक क्षमता बढ़ती है।
२. सन्ताप और शोक से मुक्ति
'स्वजनमनसन्तापशमनीं'—माँ अपने भक्तों के मन की जलन, ईर्ष्या, क्रोध और दुख रूपी संतापों को शांत कर देती हैं। इससे साधक को गहन आंतरिक शांति मिलती है।
३. सौभाग्य और आनन्द की प्राप्ति
'परमसुभगानन्दजननी' के आशीर्वाद से साधक के जीवन में दरिद्रता का नाश होता है और वह ऐश्वर्य के साथ-साथ ईश्वरीय आनन्द का अनुभव करता है।
४. अभय और सुरक्षा
'असुरसुरपूज्यां' माँ गायत्री साधक की हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं, नजर दोष और शत्रुओं से रक्षा करती हैं। माँ का ध्यान साधक को अभय बनाता है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

गायत्री अष्टकम् का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना कल्याणकारी है:
  • समय (Time): प्रातः काल स्नान के उपरान्त सूर्योदय के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। सन्ध्या काल में भी इसका पाठ हृदय को शान्ति देता है।
  • शुद्धि: पाठ से पूर्व शारीरिक और मानसिक शुद्धि (पवित्रता) आवश्यक है। सफ़ेद या पीले वस्त्र धारण करना गायत्री साधना हेतु शुभ है।
  • आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश या पीले ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • ध्यान: 'भजेऽम्बां गायत्रीं...' पढ़ते समय माँ के स्वर्णमयी और ज्योतिर्मय स्वरूप का हृदय में चिन्तन करें।
  • नियमितता: 'शुद्धचित्तः पठेद्यस्तु'—अर्थात् जो नियमित रूप से शुद्ध चित्त होकर पाठ करता है, माँ उस पर शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
विशेष टिप: यदि आप किसी बड़ी परीक्षा या मानसिक द्वन्द्व में हैं, तो रविवार के दिन इस अष्टक का ११ बार पाठ करना विशेष ऊर्जा प्रदान करता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री अष्टकम् २ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य माँ गायत्री की सगुण स्तुति कर उनकी कृपा से बुद्धि का विकास और जीवन में आनंद प्राप्त करना है। यह मन्त्र साधना को मधुर और सरस बनाता है।

2. 'वेदजननी' का क्या अर्थ है?

वेदजननी का अर्थ है वेदों की माता। माँ गायत्री से ही चारों वेदों का ज्ञान उत्पन्न हुआ है, अतः वे ही समस्त विद्याओं का मूल हैं।

3. क्या इस पाठ के लिए गायत्री मन्त्र की दीक्षा जरूरी है?

भक्ति स्तोत्र के रूप में इस अष्टक का पाठ कोई भी कर सकता है। मन्त्र अनुष्ठान हेतु गुरु मार्गदर्शन उत्तम है, परन्तु यह स्तुति स्वयं में पूर्ण और सुरक्षित है।

4. 'मोहान्धहरणीम्' नाम का आध्यात्मिक संकेत क्या है?

इसका अर्थ है कि माँ उस अज्ञान के अंधकार को नष्ट करती हैं जिसके कारण हम स्वयं को देह मानते हैं और ईश्वर से विमुख रहते हैं। यह आत्म-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है।

5. क्या यह अष्टक बच्चों की पढ़ाई में सहायक है?

हाँ, माँ गायत्री प्रज्ञा की देवी हैं। बच्चों को इसे सिखाने से उनकी एकाग्रता बढ़ती है और वे संस्कारवान बनते हैं।

6. 'परमसुभगानन्दजननी' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है—वह माता जो साधक को सर्वोत्तम सौभाग्य और असीम आनंद प्रदान करती हैं। यह माँ की ममतामयी शक्ति को दर्शाता है।

7. क्या इस स्तोत्र से शत्रुओं का भय दूर होता है?

बिल्कुल, माँ को 'असुरसुरपूज्यां' और 'अखिलदुरवस्थादिहरणीं' कहा गया है। वे हर प्रकार की बुरी स्थिति और नकारात्मक शक्तियों का शमन करती हैं।

8. पाठ के दौरान एकाग्रता कैसे बढ़ाएं?

प्रत्येक श्लोक के अर्थ का मन में चिन्तन करें और माँ के ज्योतिर्मय स्वरूप को अपने हृदय के मध्य में स्थित देखें।

9. क्या भोजन का कोई नियम है?

साधना काल में सात्विक आहार (बिना तामसिक पदार्थों के) मन को शांत रखने और स्तोत्र के फल को शीघ्र प्राप्त करने में सहायक होता है।

10. 'सदा भक्त्या शक्त्या' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि जो भक्त सदैव पूरी भक्ति और अपनी समस्त आत्म-शक्ति लगाकर माँ की शरण में आता है, वह शीघ्र ही उनकी प्रीति (प्रेम) का पात्र बन जाता है।