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Sri Dakshinamurthy Ashtakam 3 (Narasimha Bharati Krutam) – श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् – ३ (नृसिंहभारती कृतम्)

Sri Dakshinamurthy Ashtakam 3 (Narasimha Bharati Krutam) – श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् – ३ (नृसिंहभारती कृतम्)
॥ श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् – ३ (नृसिंहभारती कृतम्) ॥ पायय जनमिमममृतं दुर्लभमितरस्य लोकस्य । नतजनपालनदीक्षित मेधाधीदक्षिणामूर्ते ॥ १ ॥ स्तोतुं वा नन्तुं वा जडविषयासक्तहृन्न शक्नोमि । नैसर्गिकीं कुरु कृपां मयि वटतटवास दक्षिणामूर्ते ॥ २ ॥ स्फुरतु मम हृदि तनुस्ते पुस्तकमुद्राक्षमालिकाकुम्भान् । दधती चन्द्रार्धलस- -च्छीर्षा श्रीदक्षिणामूर्ते ॥ ३ ॥ सहमान दक्षिणानन सहमानविहीनमत्कमन्तुततीः । सहमानत्वं त्यज वा युक्तं कुर्वत्र यद्विभाति तव ॥ ४ ॥ मेधाप्रज्ञे जन्ममूकोऽपि लोकः प्राप्नोत्यङ्घ्रिं पूजयन्यस्य लोके । तं पादाम्भोजातनम्रामरालिं मेधाप्रज्ञादक्षिणामूर्तिमीडे ॥ ५ ॥ गङ्गानिर्झरिणी हिमाद्रिकुहराद्यद्वत्सुधांशोः प्रभा निर्गच्छत्यतिवेगतः कमपि च त्यक्त्वा प्रयत्नं मुहुः । तद्वद्यत्पदभक्तवक्त्रकुहराद्वाणी जवान्निःसरेत् तं वन्दे मुनिबृन्दवन्द्यचरणं श्रीदक्षिणास्यं मुदा ॥ ६ ॥ अप्पित्तार्कशशाङ्कनेत्रमगजासंलिङ्गिताङ्गं कृपा- -वाराशिं विधिविष्णुमुख्यदिविजैः संसेविताङ्घ्रिं मुदा । नन्दीशप्रमुखैर्गणैः परिवृतं नागास्यषड्वक्त्रयु- -क्पार्श्वं नीलगलं नमामि वटभूरुण्मूलवासं शिवम् ॥ ७ ॥ शीतांशुप्रतिमानकान्तिवपुषं पीताम्बुराश्यादिभि- -र्मौनीन्द्रैः परिचिन्त्यमानमनिशं मोदाद्धृदम्भोरुहे । शान्तानङ्गकटाक्षिभासिनिटिलं कान्तार्धकायं विभुं वन्दे चित्रचरित्रमिन्दुमुकुटं न्यग्रोधमूलाश्रयम् ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामिभिः विरचितं श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् ॥

परिचय: श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् (नृसिंहभारती कृतम्) — एक आध्यात्मिक विमर्श (Introduction)

श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् (नृसिंहभारती कृतम्) भगवान शिव के गुरु स्वरूप की वंदना का एक अत्यंत प्रभावशाली और श्रद्धास्पद स्रोत है। इसकी रचना शृङ्गेरी शारदा पीठ के ३३वें पीठाधिपति, जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामी जी ने की थी। नृसिंह भारती जी को आदि शंकराचार्य का साक्षात् अवतार माना जाता है और वे स्वयं ज्ञान और करुणा के प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने इस अष्टक की रचना भगवान दक्षिणामूर्ति के उन सूक्ष्म आयामों को उजागर करने के लिए की, जो साधक को बौद्धिक जड़ता (Jadata) से निकालकर प्रज्ञा (Intuition) के प्रकाश में ले जाते हैं।

दक्षिणामूर्ति का अर्थ है— 'वे जिनका मुख दक्षिण की ओर है'। अध्यात्म में दक्षिण दिशा को 'मृत्यु' और 'अज्ञान' का प्रतीक माना गया है। भगवान दक्षिणामूर्ति उस दिशा की ओर मुख करके यह संदेश देते हैं कि वे काल और अज्ञान के स्वामी हैं और जो उनकी शरण में आता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। नृसिंह भारती जी इस अष्टक के प्रथम श्लोक में ही पुकारते हैं— "पायय जनमिमममृतं" (मुझ जैसे जन को उस ज्ञान रूपी अमृत का पान कराएं)। यह याचना उस भक्त की है जो संसार के द्वंद्वों से थककर अब केवल सत्य का साक्षात्कार करना चाहता है।

इस अष्टक की एक विशिष्टता यह है कि इसमें भगवान को 'मेधा दक्षिणामूर्ति' के रूप में अधिक पूजा गया है। 'मेधा' वह बौद्धिक शक्ति है जो सत्य को ग्रहण करने और उसे धारण करने में सक्षम होती है। श्लोक संख्या ५ में आचार्य कहते हैं कि जिनकी कृपा से जन्मजात मूक (गूंगा) व्यक्ति भी वाणी का स्वामी बन जाता है, उन मेधा-प्रज्ञा प्रदाता दक्षिणामूर्ति को मैं भजता हूँ। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और साधकों के लिए सिद्ध मंत्र है जो एकाग्रता की कमी या मानसिक भ्रम का सामना कर रहे हैं।

दार्शनिक शोध की दृष्टि से, यह अष्टक अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को अत्यंत सरल प्रार्थना के रूप में प्रस्तुत करता है। श्लोक ३ में भगवान के स्वरूप का वर्णन है—वे हाथ में पुस्तक, ज्ञानमुद्रा, अक्षमाला (रुद्राक्ष की माला) और अमृत कुम्भ धारण किए हुए हैं। यह चारों वस्तुएं क्रमशः शास्त्र-ज्ञान, अनुभव, निरंतर जप और मोक्ष के फल का प्रतीक हैं। जगद्गुरु नृसिंह भारती जी ने इस पाठ के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि गुरु ही वह सेतु है जो जीव को जड़ जगत से निकालकर सच्चिदानंद सागर तक ले जाता है। Pavitra Granth के इस विशेष संकलन में हम इस अष्टक की उसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गहराई को प्रस्तुत कर रहे हैं।

विशिष्ट महत्व: मेधा और प्रज्ञा का जागरण (Significance)

नृसिंह भारती कृत दक्षिणामूर्त्यष्टकम् का महत्व इसकी 'प्रज्ञा-वर्धक' (Enhancing Wisdom) प्रकृति में निहित है। इसके विशिष्ट पहलुओं को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • सहज कृपा (Naisargiki Kripa): श्लोक २ में आचार्य कहते हैं कि मेरा हृदय जड़ विषयों में आसक्त है, मैं आपकी स्तुति करने में असमर्थ हूँ, अतः आप मुझ पर 'स्वाभाविक कृपा' (Natural Grace) करें। यह भाव पूर्ण शरणागति का प्रतीक है।
  • वाणी की सिद्धि: श्लोक ६ के अनुसार, जैसे हिमालय से गंगा निकलती है, वैसे ही दक्षिणामूर्ति के भक्त के मुख से ज्ञानमयी वाणी स्वतः प्रवाहित होती है।
  • गुरु-शिष्य परंपरा: यह अष्टक शृङ्गेरी परंपरा के गुरु-तत्व को महिमामय करता है, जहाँ गुरु को साक्षात् शिव माना गया है।
  • त्रिताप निवारण: यह पाठ आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों को शांत करने वाला एक दिव्य कवच है।

फलश्रुति: पाठ के दिव्य लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस अष्टक के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • बौद्धिक प्रखरता: विद्यार्थियों के लिए यह अष्टक एकाग्रता बढ़ाने और स्मरण शक्ति को तीव्र करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
  • अज्ञान का नाश: "अन्तर्ध्वान्तस्य कल्यं" — यह मन के भीतर छिपे अज्ञान और संशयों को तत्काल नष्ट कर देता है।
  • मानसिक शांति: विषयों में आसक्त मन को विरक्ति और ईश्वर के प्रति अनुराग प्रदान कर यह गहरी शांति का अनुभव कराता है।
  • आत्म-ज्ञान की प्राप्ति: निरंतर पाठ और अर्थ के मनन से साधक को अद्वैत तत्व का बोध होने लगता है।
  • शम्भुलोक की प्राप्ति: फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति गुरु के सान्निध्य में इसका पाठ करता है, वह समस्त दुखों से मुक्त होकर शिव लोक को प्राप्त होता है।

पाठ विधि और सर्वोत्तम अभ्यास (Ritual Method & Timing)

श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे शास्त्रोक्त विधि से करना श्रेष्ठ माना जाता है:

  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४-६ बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। गुरुवार (गुरु का दिन) और सोमवार इसके लिए विशेष माने जाते हैं।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। सफेद रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है।
  • आसन: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। कुश या ऊनी आसन सर्वोत्तम है।
  • पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म (विभूति) और सफेद चंदन अर्पित करें।
  • ध्यान की मुद्रा: पाठ करते समय भगवान की 'चिन्-मुद्रा' का हृदय में ध्यान करें और वटवृक्ष के नीचे उनके शांत स्वरूप का मानसिक चित्रण करें।

विशेष प्रयोग: यदि एकाग्रता की बहुत कमी हो, तो ९ दिनों तक नित्य ११ बार इस अष्टक का पाठ करने से बुद्धि में अभूतपूर्व स्पष्टता आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री दक्षिणामूर्त्यष्टकम् ३ के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक की रचना शृङ्गेरी शारदा पीठ के ३३वें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामी जी ने की थी।

2. 'मेधा दक्षिणामूर्ति' का क्या अर्थ है?

मेधा का अर्थ है वह बौद्धिक प्रज्ञा जो सूक्ष्म ज्ञान को धारण कर सके। भगवान दक्षिणामूर्ति जब इस शक्ति के प्रदाता बनते हैं, तो उन्हें 'मेधा दक्षिणामूर्ति' कहा जाता है।

3. क्या यह अष्टक विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है?

जी हाँ, यह विद्यार्थियों के लिए सर्वश्रेष्ठ स्तोत्रों में से एक है क्योंकि यह एकाग्रता, बुद्धि की प्रखरता और स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

4. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?

दक्षिण दिशा काल (मृत्यु) की दिशा मानी जाती है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे मृत्यु के भय को मिटाने वाले परम गुरु हैं।

5. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

यद्यपि गुरु दीक्षा श्रेष्ठ है, परंतु श्रद्धा भाव से कोई भी श्रद्धालु भगवान शिव को अपना गुरु मानकर इसे पढ़ सकता है।

6. 'चिन्-मुद्रा' का क्या अर्थ है?

चिन्-मुद्रा में तर्जनी उंगली अंगूठे से मिलती है, जो जीवात्मा और परमात्मा की एकता (अद्वैत) का प्रतीक है।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

सोमवार और गुरुवार (गुरु का दिन) इस अष्टक के पाठ के लिए विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।

8. 'मौन व्याख्यान' क्या होता है?

मौन व्याख्यान का अर्थ है बिना बोले केवल अपनी उपस्थिति और चेतना से शिष्यों के हृदय में ज्ञान को संक्रमित कर देना। यह दक्षिणामूर्ति की विशिष्ट शैली है।

9. क्या केवल सुनने से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, शुद्ध उच्चारण के साथ अष्टक का श्रवण करने से भी चित्त की शुद्धि होती है और प्रज्ञा जागरण होता है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में श्वेत (सफेद) रंग सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह सात्विकता और ज्ञान की शुद्धता का प्रतीक है।