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Durga Prasada Ashtakam (Durga Prasad Dvivedi) – दुर्गाप्रसादाष्टकम्

Durga Prasada Ashtakam (Durga Prasad Dvivedi) – दुर्गाप्रसादाष्टकम्
॥ दुर्गाप्रसादाष्टकम् ॥ वन्दे निर्बाधकरुणामरूणां शरणावनीम् । कामपूर्णजकाराद्यश्रीपीठान्तर्निवासिनीम् ॥ १॥ प्रसिद्धां परमेशानीं नानातनुषु जाग्रतीम् । अद्वयानन्दसन्दोहमालिनीं श्रेयसे श्रये ॥ २॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादौ प्रतिव्यक्ति विलक्षणाम् । सेवे सैरिभसम्मर्दरक्षणेषु कृतक्षणाम् ॥ ३॥ तत्तत्कालसमुद्भूतरामकृष्णादिसेविताम् । एकधा दशधा क्वापि बहुधा शक्तिमाश्रये ॥ ४॥ स्तवीमि परमेशानीं महेश्वरकुटुम्बिनीम् । सुदक्षिणामन्नपूर्णां लम्बोदरपयस्विनीम् ॥ ५॥ मेधा-साम्राज्यदीक्षादिवीक्षारोहस्वरूपिकाम् । तामालम्बे शिवालम्बां प्रसादरूपिकाम् ॥ ६॥ अवामा वामभागेषु दक्षिणेष्वपि दक्षिणा । अद्वयापि द्वयाकारा हृदयाम्भोजगावतात् ॥ ७॥ मन्त्र भावनया दीप्तामवर्णां वर्णरूपिणीम् । परां कन्दलिकां ध्यायन् प्रसादमधिगच्छति ॥ ८॥ ॥ इति श्रीदुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचितं दुर्गाप्रसादाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

दुर्गाप्रसादाष्टकम् — परिचय एवं दार्शनिक महत्व

श्रीदुर्गाप्रसादाष्टकम् एक अत्यंत सारगर्भित और गहन दार्शनिक स्तुति है, जिसकी रचना श्री दुर्गाप्रसाद द्विवेदी जी ने की है। यह अष्टक केवल माँ दुर्गा की शक्तियों का गान नहीं करता, बल्कि उनके 'प्रसाद' (कृपा) स्वरूप को साधक के हृदय में उतारने का एक आध्यात्मिक मार्ग है।

अद्वैत का दर्शन: यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों पर आधारित है। श्लोक 2 में देवी को "अद्वयानन्दसन्दोहमालिनीं" (अद्वैत आनंद के समूह की माला पहनने वाली) कहा गया है। श्लोक 7 में कवि कहते हैं, "अद्वयापि द्वयाकारा", अर्थात् यद्यपि आप एक (अद्वैत) हैं, फिर भी संसार में दो (शिव-शक्ति, स्त्री-पुरुष) रूपों में प्रकट होती हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि का सारा द्वंद्व उसी एक परमशक्ति से उत्पन्न हुआ है।

चेतना की साक्षी: श्लोक 3 में माँ को जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं की साक्षी कहा गया है। वे ही वह चेतना हैं जो व्यक्ति के भीतर इन तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करती हैं, फिर भी स्वयं उनसे परे रहती हैं।

सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिपादन: यह अष्टक सिद्ध करता है कि दुर्गा ही परम शक्ति हैं। वे ही महिषासुर का मर्दन (सैरिभसम्मर्द) करती हैं, वे ही राम और कृष्ण जैसे अवतारों द्वारा पूजी जाती हैं (श्लोक 4), और वे ही अन्नपूर्णा बनकर भगवान गणेश का पोषण करती हैं (श्लोक 5)।

स्तोत्र के सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

इस अष्टक के नियमित पाठ से साधक को माँ दुर्गा का 'प्रसाद' प्राप्त होता है, जिससे जीवन में निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • निर्बाध करुणा और सुरक्षा: "निर्बाधकरुणामरूणां शरणावनीम्" (श्लोक 1) — यह पाठ साधक पर माँ की अखंड कृपा की वर्षा करता है और उसे हर संकट में शरण प्रदान करता है।
  • बुद्धि और साम्राज्य (ज्ञान और सत्ता): श्लोक 6 में "मेधा-साम्राज्यदीक्षा" का उल्लेख है। यह विद्यार्थियों को प्रखर बुद्धि (मेधा) और शासकों/प्रबंधकों को साम्राज्य (उच्च पद/अधिकार) चलाने की दीक्षा प्रदान करता है।
  • त्रि-अवस्थाओं पर विजय: जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी चेतना जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे हो जाती है। उसे बुरे स्वप्न और मानसिक अशांति से मुक्ति मिलती है।
  • पारिवारिक सुख: श्लोक 5 में माँ को "महेश्वरकुटुम्बिनीम्" और "लम्बोदरपयस्विनीम्" कहा गया है। यह पारिवारिक सौहार्द, घर में अन्न की पूर्णता और संतान सुख का आशीर्वाद देता है।
  • इच्छाओं की पूर्ति: श्लोक 1 में देवी को "कामपूर्ण" कहा गया है। यह साधक की सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. दुर्गाप्रसादाष्टकम् की रचना किसने की है?

इस अद्भुत और दार्शनिक अष्टक की रचना 'श्री दुर्गाप्रसाद द्विवेदी' ने की है, जैसा कि स्तोत्र के अंत में उल्लेखित है। उन्होंने अपने नाम को ही स्तोत्र का शीर्षक बनाकर माँ को समर्पित कर दिया।

2. 'प्रसाद' का इस स्तोत्र में क्या अर्थ है?

यहाँ 'प्रसाद' का अर्थ केवल भोग नहीं, बल्कि माँ की 'अकारण कृपा' (Unconditional Grace) है। यह अष्टक उस कृपा को प्राप्त करने का साधन है जो साधक को अद्वैत आनंद से भर देती है।

3. श्लोक 2 में 'अद्वयानन्दसन्दोहमालिनीं' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है 'अद्वैत आनंद (Non-dual Bliss) के समूह की माला धारण करने वाली'। यह दर्शाता है कि देवी सांसारिक सुख-दुःख से परे, परमानंद के सागर में स्थित हैं और भक्तों को वही आनंद प्रदान करती हैं।

4. क्या यह स्तोत्र बुद्धि और विद्या के लिए है?

हाँ, श्लोक 6 में माँ को 'मेधा-साम्राज्यदीक्षा' (बुद्धि के साम्राज्य में दीक्षित करने वाली) कहा गया है। यह विद्यार्थियों और ज्ञान के उपासकों के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है।

5. श्लोक 3 में 'सैरिभसम्मर्द' का क्या अर्थ है?

'सैरिभ' का अर्थ है 'भैंसा' या 'महिष'। 'सैरिभसम्मर्द' का अर्थ है महिषासुर का मर्दन (वध)। यह माँ दुर्गा के महिषासुरमर्दिनी स्वरूप का संकेत है जो भक्तों के संकटों को कुचल देती हैं।

6. क्या यह पाठ गृहस्थों के लिए भी है?

बिल्कुल, श्लोक 5 में माँ को 'महेश्वरकुटुम्बिनीम्' (शिव की गृहस्थी संभालने वाली), 'अन्नपूर्णा' और 'लम्बोदरपयस्विनीम्' (गणेश को दूध पिलाने वाली) कहा गया है। यह पारिवारिक सुख और पोषण का आशीर्वाद देता है।

7. श्लोक 7 में 'अद्वयापि द्वयाकारा' का क्या रहस्य है?

यह एक गहरा अद्वैत दर्शन है। इसका अर्थ है, 'यद्यपि आप अद्वैत (एक) हैं, फिर भी द्वैत (दो रूपों - जैसे शिव-शक्ति, प्रकृति-पुरुष) में प्रकट होती हैं'। यह दर्शाता है कि सृष्टि का सारा द्वंद्व उसी एक शक्ति से निकला है।

8. श्लोक 8 में 'अवर्णां वर्णरूपिणीम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'जो स्वयं वर्णों (अक्षरों) से परे हैं, लेकिन सभी वर्णों (रूपों) में वही व्याप्त हैं'। माँ दुर्गा परब्रह्म हैं जो हर नाम और रूप में प्रकट होती हैं।

9. इस अष्टक का पाठ कब करना चाहिए?

प्रातःकाल की ब्रह्म-बेला या संध्याकाल में इस दार्शनिक अष्टक का पाठ करने से मन शांत होता है। नवरात्रि और अष्टमी तिथि इसके लिए विशेष रूप से शुभ हैं।

10. इस स्तोत्र का मुख्य फल क्या है?

इसका मुख्य फल है माँ दुर्गा की 'निर्बाध करुणा' (Uninterrupted Grace) की प्राप्ति, जिससे साधक के जीवन में ऐश्वर्य, आयु, आरोग्य और अभीष्ट सिद्धि सहज ही प्राप्त हो जाती है।