ब्रह्मानन्दस्वरूप मङ्गलमतिपूत जय देव॥ध्रुवपदम्॥
भववारिधिपोतः शङ्करगुरुदेव शङ्करगुरुदेव।
मोहध्वान्तनिवारकचित्सुखसूर्य त्वां नत्वा मुक्त्वा भवतो भूत्वा भूमसुखं दिव्यज्योतिष आरात्रिकां कुर्वे श्रुतिसिद्धाम्॥१॥
विमलानन्दमहाम्बुधिरद्वयसुखबोधो भवरोगामृतरूप निर्मलशान्तविधुश्चिन्तामणिरभयस्त्वाम्।
विषविषयान्तक निरवधिसंसृतियार सज्जनकल्पतरो॥२॥
दैवीसम्पत्पूरितजीवनसुखसार मोक्षानन्दविलास भवभयपरिहारोपनिषदमृतपूरितवाणीमाधुर्यं।
वन्दे शङ्करदेशिक सुन्दरपदकमलम्॥३॥
शास्त्रश्रुत्यागार निजजनपरितोष दुर्मतवनदावानल मतिहितमाराम सत्यंज्ञानमनन्तम्।
शङ्करगुरुदेव स्तुत्वा ब्रह्मैवाहं नित्यानन्दघनम्॥४॥
॥ इति श्रीमत् परमहंसपरिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवान् श्रीधरस्वामीमहाराजविरचिता श्रीशङ्कराचार्यारात्रिका सम्पूर्णा ॥
Brahmanandaswaroop Mangalamatipoot Jai Dev. ||Dhruvpadam||
Bhavavaridhipotah Shankaragurudev Shankaragurudev,
Mohadhvantanivarakachitsukhasurya Tvam Natva Muktva Bhavato Bhootva Bhoomasukham Divyajyotish Aratrikam Kurve Shrutisiddham. ||1||
Vimalanandamahambudhiradvayasukhabodho Bhavarogamritaroopa Nirmalashantavidhushchintamanirabhayastvam,
Vishavishayantaka Niravadhisansritiyara Sajjanakalpataro. ||2||
Daivisampatpuritajivanasukhasara Mokshanandavilasa Bhavabhayapariharopanishadamritapuritavanimadhuryam,
Vande Shankaradeshika Sundarapadakamalam. ||3||
Shastrashrutyagara Nijajanaparitosha Durmatavanadavanal Matihitamaram Satyamjnanamanantam,
Shankaragurudev Stutva Brahmaivaham Nityanandaghanam. ||4||
॥ Iti Shrimat Paramahansaparivrajakacharya Sadguru Bhagavan Shridharaswamimaharajavirachita Shrishankaracharyaratrika Sampurna ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
यह 'आरात्रिका' (आरती) महान दार्शनिक और धर्म-सुधारक आदि शंकराचार्य को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। इस आरती की रचना 20वीं सदी के एक महान संत, श्रीधर स्वामी महाराज ने की थी, जो इसे एक प्रामाणिक और श्रद्धेय स्तुति बनाती है। यह आरती किसी सामान्य देवता की नहीं, बल्कि 'सद्गुरु' की है, जो ज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसमें आदि शंकराचार्य को ब्रह्मानंद का स्वरूप, मोह के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य और भवसागर से पार ले जाने वाला जहाज बताया गया है। इस आरती का पाठ करना गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति सर्वोच्च सम्मान व्यक्त करना है और अद्वैत वेदांत के ज्ञान के लिए सद्गुरु की कृपा (grace of the Guru) की प्रार्थना करना है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती सद्गुरु और आदि शंकराचार्य के गुणों का गहन दार्शनिक वर्णन करती है:
- सद्गुरु - भवसागर के पोत (The True Guru - Boat Across the Ocean of Existence): "भववारिधिपोतः शङ्करगुरुदेव" - यह पंक्ति गुरु को उस जहाज (पोत) के समान बताती है जो शिष्य को जन्म-मृत्यु के इस संसार रूपी सागर (भववारिधि) से पार ले जाता है।
- अज्ञान के अंधकार का नाशक (Dispeller of the Darkness of Ignorance): "मोहध्वान्तनिवारकचित्सुखसूर्य" - यहाँ गुरु को उस सूर्य के समान बताया गया है जो मोह (अज्ञान) रूपी अंधकार (ध्वान्त) को दूर करता है और चेतना के आनंद (चित्-सुख) को प्रकट करता है।
- अद्वैत सुख का बोध (The Realization of Non-dual Bliss): "विमलानन्दमहाम्बुधिरद्वयसुखबोधो" - आरती सद्गुरु को निर्मल आनंद का महासागर और अद्वैत (non-dual) सुख के ज्ञान का स्रोत कहती है, जो अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है।
- 'ब्रह्मैवाहं' की अनुभूति (The Experience of 'I am Brahman'): "शङ्करगुरुदेव स्तुत्वा ब्रह्मैवाहं नित्यानन्दघनम्" - आरती का समापन इस परम अनुभूति के साथ होता है कि शंकरगुरुदेव की स्तुति करके, साधक स्वयं को 'मैं ही ब्रह्म हूँ' (ब्रह्मैवाहं) के रूप में अनुभव करता है, जो नित्य आनंद का घन स्वरूप है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा और शंकराचार्य जयंती (वैशाख शुक्ल पंचमी) के दिन श्रद्धापूर्वक गाई जाती है।
- यह आरती उन सभी मठों और आश्रमों में नित्य पूजा का अंग है जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित दशनामी संप्रदाय की परंपरा का पालन करते हैं।
- इस आरती को करते समय, आदि शंकराचार्य के चित्र या उनकी पादुकाओं (चरण-चिह्न) के समक्ष दीपक जलाकर, उनके द्वारा दिए गए ज्ञान और परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। * इसका पाठ करने का मुख्य लाभ कोई भौतिक प्राप्ति नहीं, बल्कि बुद्धि की शुद्धि, वैराग्य की भावना और आत्म-ज्ञान (self-realization) के मार्ग में प्रगति है।
