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श्री मनोबोधाची आरती (वेदांचें जें गुह्य)

Manobodha Aarti Marathi

श्री मनोबोधाची आरती (वेदांचें जें गुह्य)
वेदांचें जें गुह्य शास्त्रांचें जें सार।
प्राकृत शब्दांमाजी केला विस्तार॥
कर्म उपासना ज्ञान गंभीर।
ज्याच्या मननमात्रे आत्मा गोचर॥

जय देव जय देव जय मनोबोधा।
पंचप्राणें आरति तुज स्वात्मशुद्धा॥

दोन शतें पांच श्लोक हे जाण।
श्रवणें अर्थे साधक पावति हे खूण॥
परमार्थासी सुलभ मार्ग हा पूर्ण।
यशवंत सद्गुरु दासाचा प्राण॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

यह आरती किसी देवता को नहीं, बल्कि समर्थ रामदास स्वामी की महान कृति 'श्री मनोबोध' (जिसे 'मनाचे श्लोक' भी कहा जाता है) को समर्पित है। 'मनोबोध' का अर्थ है 'मन को उपदेश'। यह 205 श्लोकों का एक अद्भुत ग्रंथ है जिसमें समर्थ रामदास अपने ही मन से संवाद करते हैं, उसे नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। यह आरती उस ग्रंथ की महिमा का गुणगान करती है, उसे वेदों और शास्त्रों का सार मानती है। इस आरती का पाठ करना 'मनोबोध' के ज्ञान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना है और उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरणा प्राप्त करना है। यह साधक को आत्म-सुधार (self-improvement) और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रोत्साहित करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती 'मनोबोध' ग्रंथ के सार और उसके लाभों को दर्शाती है:

  • वेदों और शास्त्रों का सार (Essence of the Vedas and Shastras): "वेदांचें जें गुह्य शास्त्रांचें जें सार। प्राकृत शब्दांमाजी केला विस्तार॥" - आरती की शुरुआत में ही 'मनोबोध' को वेदों का रहस्य और सभी शास्त्रों का सार बताया गया है, जिसे समर्थ रामदास ने साधारण मराठी भाषा में सभी के लिए सुलभ बना दिया है।
  • ज्ञान का सुलभ मार्ग (The Accessible Path to Knowledge): "कर्म उपासना ज्ञान गंभीर। ज्याच्या मननमात्रे आत्मा गोचर॥" - यह ग्रंथ कर्म, उपासना और ज्ञान जैसे गंभीर विषयों पर प्रकाश डालता है, और इसके श्लोकों पर केवल मनन (contemplation) करने मात्र से ही आत्म-साक्षात्कार का मार्ग खुल जाता है।
  • २०५ श्लोकों का महत्व (Significance of the 205 Verses): "दोन शतें पांच श्लोक हे जाण। श्रवणें अर्थे साधक पावति हे खूण॥" - आरती स्पष्ट रूप से बताती है कि इस ग्रंथ में 205 श्लोक हैं, और इनके अर्थ को सुनने और समझने से साधक को परम सत्य का संकेत (spiritual insight) मिलता है।
  • परमार्थ का प्राण (The Life-force of the Spiritual Path): "परमार्थासी सुलभ मार्ग हा पूर्ण। यशवंत सद्गुरु दासाचा प्राण॥" - आरती का समापन इस घोषणा के साथ होता है कि यह ग्रंथ परमार्थ के लिए एक पूर्ण और सुलभ मार्ग है, और यह एक शिष्य (दास) के लिए उसके सद्गुरु के प्राणों के समान प्रिय और आवश्यक है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती 'मनाचे श्लोक' का पाठ शुरू करने से पहले या उसके समापन के बाद करने की परंपरा है। यह ग्रंथ के प्रति आदर और भक्ति भाव को दर्शाता है।
  • राम नवमी, हनुमान जयंती और विशेष रूप से दास नवमी (माघ कृष्ण नवमी, समर्थ रामदास की पुण्यतिथि) के दिन इस आरती और 'मनोबोध' का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • इस आरती को करने के लिए, 'मनोबोध' या 'दासबोध' ग्रंथ को एक स्वच्छ आसन पर रखें, उसके समक्ष एक दीपक जलाएं और फिर श्रद्धापूर्वक आरती करें।
  • इस आरती का नियमित गायन मन को स्थिर करने में मदद करता है और 'मनाचे श्लोक' में दिए गए उपदेशों को जीवन में अपनाने के लिए एक मजबूत foundation बनाता है।
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