वारुनिया विघ्नें देवा रक्षावे दीना॥
दास तुझे आम्ही देवा तुजलाची ध्यातों।
प्रेमें करुनियां देवा गुण तुझे गातों॥१॥
तरी न्यावी सिद्धी देवा हेची वासना।
रक्षूनियां सर्वां द्यावी आम्हासी आज्ञा॥२॥
मागणें तें देवा आतां एकची आहे।
तरुनियां सकळां आम्हां कृपादृष्टी पाहें॥३॥
जेव्हां सर्व आम्ही मिळू ऐशा या ठाया।
प्रेमानंदें लागू तुझी कीर्ती गावया॥४॥
सदा ऐशी भक्ती राहो आमुच्या मनीं।
हेची देवा तुम्हा असे नित्य विनवणी॥५॥
वारुनियां संकटें आतां आमुचीं सारी।
कृपेची साउली देवा दीनावरि करीं॥६॥
निरंतर आमुची चिंता तुम्हां असावी।
सर्वांची लज्जा देवा तुम्ही रक्षावी॥७॥
निरोप घेतों आतां आम्हां आज्ञा असावी।
चुकलें आमुचें कांहीं त्याची क्षमा असावी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Varuniya vighnen deva rakshave dina. ||
Das tujhe aamhi deva tujalachi dhyaton,
Premen karuniyan deva gun tujhe gaaton. ||1||
Tari nyavi siddhi deva hechi vasana,
Rakshuniyan sarvan dyavi aamhasi aadnya. ||2||
Maganen ten deva aatan ekachi aahe,
Taruniyan sakalan aamhan kripadrishti pahen. ||3||
Jevhan sarv aamhi milu aisha ya thaya,
Premananden laagu tujhi kirti gavaya. ||4||
Sada aishi bhakti raho aamuchya manin,
Hechi deva tumha ase nitya vinavani. ||5||
Varuniyan sankaten aatan aamuchin saari,
Kripechi sauli deva dinavari karin. ||6||
Nirantar aamuchi chinta tumhan asavi,
Sarvanchi lajja deva tumhi rakshavi. ||7||
Nirop gheton aatan aamhan aadnya asavi,
Chukalen aamuchen kahin tyachi kshama asavi. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
'निरोप आरती' मराठी भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण और भावपूर्ण अंग है। 'निरोप' का अर्थ है 'विदा लेना' या 'अनुमति मांगना'। यह आरती किसी भजन, कीर्तन या पूजा सत्र के अंत में गाई जाती है, जब भक्त भगवान से विदा लेते हैं। "जाहलें भजन" आरती इसी भावना का एक सुंदर उदाहरण है। इसका महत्व केवल एक समापन गीत होने में नहीं है, बल्कि यह पूजा के दौरान हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगने, भगवान की कृपा के लिए आभार व्यक्त करने और भविष्य में भी अपनी भक्ति बनाए रखने का आशीर्वाद मांगने का एक विनम्र तरीका है। यह आरती भक्त और भगवान के बीच के प्रेमपूर्ण संबंध को दर्शाती है, जहाँ भक्त एक बच्चे की तरह अपने पालक से विदा लेता है, यह विश्वास रखते हुए कि भगवान की कृपा दृष्टि (divine grace) हमेशा उन पर बनी रहेगी।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भक्त की सरल, विनम्र और गहरी भावनाओं को व्यक्त करती है:
- आभार और विदाई (Gratitude and Farewell): "जाहलें भजन आम्ही नमितों चरणा।" - 'हमारा भजन समाप्त हो गया है, हम आपके चरणों में नमन करते हैं।' यह पंक्ति भजन सत्र के सफल समापन के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। "निरोप घेतों आतां आम्हां आज्ञा असावी।" - यह सीधे तौर पर भगवान से विदा लेने की अनुमति मांगना है।
- क्षमा याचना (Asking for Forgiveness): "चुकलें आमुचें कांहीं त्याची क्षमा असावी॥" - 'यदि हमसे कोई भूल हो गई हो, तो उसके लिए हमें क्षमा करें।' यह हिंदू पूजा का एक अनिवार्य हिस्सा है, जो भक्त की विनम्रता और अपनी मानवीय सीमाओं की स्वीकृति को दर्शाता है।
- निरंतर कृपा की प्रार्थना (Prayer for Continued Grace): "निरंतर आमुची चिंता तुम्हां असावी।" और "कृपेची साउली देवा दीनावरि करीं॥" - भक्त प्रार्थना करते हैं कि 'आपको हमारी चिंता हमेशा बनी रहे' और 'आपकी कृपा की छाया हम दीनों पर बनी रहे।' यह दर्शाता है कि भले ही पूजा समाप्त हो गई हो, भक्त भगवान के protection and care से अलग नहीं होना चाहता।
- पुनः सेवा की कामना (Aspiration to Serve Again): "जेव्हां सर्व आम्ही मिळू ऐशा या ठाया। प्रेमानंदें लागू तुझी कीर्ती गावया॥" - यह पंक्ति भविष्य में फिर से इसी तरह एकत्रित होकर प्रेम और आनंद के साथ भगवान की कीर्ति गाने की तीव्र इच्छा को व्यक्त करती है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती किसी भी भजन, कीर्तन, सत्संग या घरेलू पूजा के बिल्कुल अंत में गाई जाती है। यह मुख्य आरती और प्रसाद वितरण के बाद की जाने वाली अंतिम प्रार्थना है।
- इसे गाते समय, भक्तों का भाव विनम्र और शांत होता है। यह एक औपचारिक समापन का प्रतीक है, जो सभी को सम्मानपूर्वक विदा लेने की अनुमति देता है।
- इसके लिए किसी विशेष सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है। इसे हाथ जोड़कर, भगवान के प्रति कृतज्ञता के भाव के साथ गाया जाता है।
- इस आरती का पाठ करने से पूजा या भजन सत्र की ऊर्जा को समेटने में मदद मिलती है और भक्त उस आध्यात्मिक शांति (spiritual peace) और सकारात्मकता को अपने साथ अपने दैनिक जीवन में ले जा पाता है।
