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विठ्ठलाची आरती (युगे अठ्ठावीस)

Vithoba Aarti (Marathi)

विठ्ठलाची आरती (युगे अठ्ठावीस)
युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा ।
वामांगी रखुमाई दिसे दिव्य शोभा ॥
पुंडलिकाचे भेटी परब्रह्म आले गा ।
चरणी वाहे भीमा उद्धरी जगा ॥१॥

जय देव जय देव जय पांडुरंगा ।
रखुमाईवल्लभा, राईच्या वल्लभा पावे जिवलगा ॥
जय देव जय देव...॥

तुळसी-माळा गळां कर ठेवुनि कटीं ।
कांसे पीतांबर कस्तुरी लल्लाटीं ॥
देव सुरवर नित्य येती भेटी ।
गरुड हनुमंत पुढे उभे राहती ॥
जय देव जय देव...॥

धन्य वेणुनाद अनुक्षेत्रपाळा ।
सुवर्णाची कमळे वनमाळा गळां ॥
राही रखुमाबाई राणीया सकळा ।
ओवाळिती राजा विठोबा सांवळा ॥
जय देव जय देव...॥

ओवाळूं आरत्या कुर्वंड्या येती ।
चंद्रभागेमाजीं सोडुनि देती ॥
दिंड्या पताका वैष्णव नाचती ।
पंढरीचा महिमा वर्णावा किती ॥
जय देव जय देव...॥

आषाढी कार्तिकी भक्तजन येती ।
चंद्रभागेमध्यें स्नानें जे करिती ॥
दर्शनहेळामात्रें तयां होय मुक्ती ।
केशवासी नामदेव मागे कृपामूर्ती ॥
जय देव जय देव जय पांडुरंगा ॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा" (Yuge Atthavis Vitevari Ubha) महाराष्ट्र के आराध्य देवता भगवान विठ्ठल (Lord Vithoba) की सबसे प्रसिद्ध और प्रमुख आरती है। इसकी रचना महान संत कवि संत नामदेव (Sant Namdev) ने की थी, जो वारकरी संप्रदाय के प्रमुख संतों में से एक हैं। यह आरती पंढरपुर (Pandharpur) क्षेत्र की महिमा और भगवान विठ्ठल (पांडुरंग) के उस अद्भुत स्वरूप का वर्णन करती है, जो अपने परम भक्त पुंडलिक की प्रतीक्षा में 28 युगों से ईंट (वीट) पर खड़े हैं। महाराष्ट्र में हर घर और मंदिर में, विशेषकर आषाढी और कार्तिकी एकादशी (Ashadhi and Kartiki Ekadashi) के दौरान, इस आरती का गायन अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान विठ्ठल के सगुण रूप और उनकी भक्त-वत्सलता का सुंदर चित्रण करती है:

  • युगों से प्रतीक्षा (Waiting for Eons): "युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा" - भगवान 28 युगों से ईंट पर खड़े हैं। यह पंक्ति भक्त पुंडलिक की भक्ति और भगवान के धैर्य का प्रतीक है।
  • दिव्य स्वरूप (Divine Form): "कटीं कर" (हाथ कमर पर) और "कंठी तुळसी-माळा" (गले में तुलसी की माला) - यह विठ्ठल भगवान की विशिष्ट मुद्रा का वर्णन है, जो भक्तों के लिए सुलभ और समदृष्टि होने का संकेत है।
  • चंद्रभागा नदी (Chandrabhaga River): आरती में भीमा नदी (Bhima River), जिसे पंढरपुर में चंद्रभागा कहा जाता है, की पवित्रता का उल्लेख है, जिसमें स्नान करने से भक्तों के पाप धुल जाते हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति (Attainment of Salvation): "दर्शनहेळामात्रें तयां होय मुक्ती" - भगवान पांडुरंग के दर्शन मात्र से जीव को मोक्ष (Salvation) की प्राप्ति होती है और संसार के दुखों से मुक्ति मिलती है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • नित्य उपासना (Daily Worship): वारकरी संप्रदाय के लोग और विठ्ठल भक्त प्रतिदिन सुबह (काकड आरती) और शाम (शेज आरती) के समय इस आरती का गायन करते हैं।
  • एकादशी व्रत (Ekadashi Fast): यह आरती आषाढी एकादशी (Ashadhi Ekadashi) और कार्तिकी एकादशी (Kartiki Ekadashi) के महान पर्वों पर विशेष रूप से गाई जाती है, जब लाखों वारकरी पंढरपुर की यात्रा (वारी) करते हैं।
  • वाद्य यंत्र (Instruments): आरती गाते समय टाळ (Cymbals) और मृदंग (Mridangam) का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है, जो भक्तिमय वातावरण (devotional atmosphere) को और भी दिव्य बना देता है।
  • प्रार्थना (Prayer): आरती के अंत में भक्त भगवान से दया और कृपा की भीख मांगते हैं ("केशवासी नामदेव मागे कृपामूर्ती"), जिससे उन्हें आध्यात्मिक शांति (spiritual peace) मिलती है।
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