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शिव आरती (लवथवती विक्राळा)

Lavthavati Vikrala Shiv Aarti

शिव आरती (लवथवती विक्राळा)
लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा ।
वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा ॥
लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा ।
तेथुनियां जल निर्मळ वाहे झुळझुळां ॥ १ ॥

जय देव जय देव जय श्रीशंकरा ।
आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा ॥ ध्रु० ॥

कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा ।
अर्धांगीं पार्वती सुमनांच्या माळा ॥
विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा ।
ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा ॥
जय देव जय देव० ॥ २ ॥

देवीं दैत्य सागरमंथन पै केलें ।
त्यामाजीं जें अवचित हळाहळ उठिलें ॥
तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें ।
नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झालें ॥
जय देव जय देव० ॥ ३ ॥

व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी ।
पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी ॥
शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी ।
रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं ॥
जय देव जय देव० ॥ ४ ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

समर्थ रामदास स्वामी द्वारा रचित "लवथवती विक्राळा" भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत ऊर्जावान और प्रसिद्ध मराठी आरती है। यह आरती भगवान शिव के रौद्र और सुंदर, दोनों स्वरूपों का एक साथ अद्भुत वर्णन करती है। 'लवथवती विक्राळा' का अर्थ है 'तेजी से फैलने वाली या कंपन करने वाली भयंकर ऊर्जा', और 'ब्रह्मांडी माळा' का अर्थ है 'ब्रह्मांड की माला'। यह पंक्तियाँ शिव को उस आदि-शक्ति के रूप में दर्शाती हैं जिसकी ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि शिव के विराट, लौकिक और कल्याणकारी स्वरूप का एक शक्तिशाली ध्यान है, जो भक्त के मन में साहस और भक्ति का संचार करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान शिव के विभिन्न गुणों और लीलाओं का सुंदर वर्णन करती है:

  • लौकिक और भयंकर रूप (Cosmic and Fierce Form): "लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा, वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा" - यह पंक्तियाँ उनके ब्रह्मांड-व्यापी, विष से काले कंठ वाले और तीसरे नेत्र में ज्वाला धारण करने वाले भयंकर रूप का वर्णन करती हैं, जो सृष्टि के संहार और regeneration की शक्ति का प्रतीक है।
  • नीलकंठ का रहस्य (The Secret of the Blue Throat): "देवीं दैत्य सागरमंथन पै केलें... तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें" - आरती में समुद्र मंथन की कथा का उल्लेख है, जहाँ शिव ने दुनिया को बचाने के लिए हलाहल विष पी लिया। यह उनके अपार करुणा (immense compassion) और परोपकार को दर्शाता है।
  • सौम्य और सुंदर रूप (Gentle and Beautiful Form): "कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा, अर्धांगीं पार्वती सुमनांच्या माळा" - एक ओर जहाँ वे भयंकर हैं, वहीं दूसरी ओर वे कपूर के समान गोरे, भोले, बड़ी आँखों वाले और अपने अर्धांग में पार्वती को धारण करने वाले 'उमावेल्हाळा' (उमा के प्रिय) हैं। यह उनके विरोधाभासी लेकिन संपूर्ण स्वरूप को दर्शाता है।
  • वैराग्य और नियंत्रण के प्रतीक (Symbol of Detachment and Control): "व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी" - वे बाघ की खाल पहनते हैं (प्रकृति पर विजय), सर्पों को धारण करते हैं (समय और ऊर्जा पर नियंत्रण), और कामदेव के शत्रु (इंद्रियों पर पूर्ण विजय) हैं। यह एक योगी के सर्वोच्च गुणों (highest qualities of a yogi) का प्रतीक है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के पर्व पर और श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार (Monday) को की जाती है।
  • किसी भी ज्योतिर्लिंग या शिव मंदिर में इस आरती का पाठ करना अत्यंत ऊर्जावान अनुभव होता है।
  • घर पर शिवलिंग का दूध, जल और बिल्वपत्र से अभिषेक करने के बाद इस आरती को पूरे भक्ति-भाव से गाना चाहिए।
  • इस आरती का ऊँचे स्वर में गायन करने से मन से भय दूर होता है और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) का नाश होता है, जिससे आत्मबल और साहस में वृद्धि होती है।
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