आरती सप्रेम जय जय विठ्ठल परब्रह्म।
भक्तसंकटीं नाना स्वरूपीं स्थापिसी स्वधर्म॥
अंबऋषीकारणें गर्भवास सोशीसी।
वेद नेले चोरूनी ब्रह्मा आणुनियां देसी॥
मत्स्यरूपी नारायण सप्तही सागर धुंडीसी।
हस्त लागतां शंखासुरा तुझा वर देसी॥१॥
रसातळाशीं जातां पृथ्वी पाठीवर घेसी।
परोपकारासाठीं देवा कांसव झालासी॥
दाढें धरूनी पृथ्वी नेतां वराहरूप होसी।
प्रल्हादाकारणें स्तंभीं नरहरि गुरगुरसी॥२॥
पांचवे अवतारीं बळिच्या द्वाराला जासी।
भिक्षे स्थळ मागुनी बळिला पाताळीं नेसी॥
सर्व समर्पण केलें म्हणउनि प्रसन्न त्या होसी।
वामनरूप धरूनी बळिच्याद्वारीं तिष्ठसी॥३॥
सहस्रार्जुन मातला जमदग्नीचा वध केला।
कष्टीं ते रेणुका म्हणुनी सहस्रार्जुन वधिला॥
निःक्षत्री पृथ्वी दान दिधली विप्राला।
सहावा अवतार परशुराम प्रगटला॥४॥
मातला रावण सर्वां उपद्रव केला।
तेहतीस कोटी देव बंदीं हरलें सीतेला॥
पितृवचनालागीं रामें वनवास केला।
मिळोनी वानर सहित राजाराम प्रगटला॥५॥
देवकीवसुदेव बंदीमोचन त्वां केलें।
नंदाघरीं जाउन निजसुख गोकुळा दिधलें॥
गोरसचोरी करीतां नवलक्ष गोपाळ मिळविले।
गोपिकांचें प्रेम देखुनि श्रीकृष्ण भुलले॥६॥
बौद्ध कलंकी कलियुगिं झाला अधर्म हा अवघा।
सांडुनि नित्यधर्म सोडुनि नंदाची सेवा॥
म्लेंच्छमर्दन करिसी म्हणुनि कलंकी केशवा।
बहिरवि जान्हवि द्यावि निजसुखानंदसेवा॥७॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
भक्तसंकटीं नाना स्वरूपीं स्थापिसी स्वधर्म॥
अंबऋषीकारणें गर्भवास सोशीसी।
वेद नेले चोरूनी ब्रह्मा आणुनियां देसी॥
मत्स्यरूपी नारायण सप्तही सागर धुंडीसी।
हस्त लागतां शंखासुरा तुझा वर देसी॥१॥
रसातळाशीं जातां पृथ्वी पाठीवर घेसी।
परोपकारासाठीं देवा कांसव झालासी॥
दाढें धरूनी पृथ्वी नेतां वराहरूप होसी।
प्रल्हादाकारणें स्तंभीं नरहरि गुरगुरसी॥२॥
पांचवे अवतारीं बळिच्या द्वाराला जासी।
भिक्षे स्थळ मागुनी बळिला पाताळीं नेसी॥
सर्व समर्पण केलें म्हणउनि प्रसन्न त्या होसी।
वामनरूप धरूनी बळिच्याद्वारीं तिष्ठसी॥३॥
सहस्रार्जुन मातला जमदग्नीचा वध केला।
कष्टीं ते रेणुका म्हणुनी सहस्रार्जुन वधिला॥
निःक्षत्री पृथ्वी दान दिधली विप्राला।
सहावा अवतार परशुराम प्रगटला॥४॥
मातला रावण सर्वां उपद्रव केला।
तेहतीस कोटी देव बंदीं हरलें सीतेला॥
पितृवचनालागीं रामें वनवास केला।
मिळोनी वानर सहित राजाराम प्रगटला॥५॥
देवकीवसुदेव बंदीमोचन त्वां केलें।
नंदाघरीं जाउन निजसुख गोकुळा दिधलें॥
गोरसचोरी करीतां नवलक्ष गोपाळ मिळविले।
गोपिकांचें प्रेम देखुनि श्रीकृष्ण भुलले॥६॥
बौद्ध कलंकी कलियुगिं झाला अधर्म हा अवघा।
सांडुनि नित्यधर्म सोडुनि नंदाची सेवा॥
म्लेंच्छमर्दन करिसी म्हणुनि कलंकी केशवा।
बहिरवि जान्हवि द्यावि निजसुखानंदसेवा॥७॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Aarti saprem jai jai Vitthal parabrahma,
Bhaktasankatin nana swaroopin sthapisi swadharma. ||
Ambarushikaranen garbhavas soshisi,
Ved nele choruni Brahma aanuniyan desi. ||
Matsyarupi Narayan saptahi sagar dhundisi,
Hasta lagatan shankhasura tujha var desi. ||1||
Rasatalashin jatan prithvi pathivar ghesi,
Paropakarasathin deva kansav jhalasi. ||
Dadhen dharuni prithvi netan varaharup hosi,
Pralhadakaranen stambhin narahari gurugurasi. ||2||
Panchave avatarin balichya dwarala jasi,
Bhikshe sthal maguni balila patalin nesi. ||
Sarva samarpan kelen mhanuni prasanna tya hosi,
Vamanrup dharuni balichyadwarin tishthasi. ||3||
Sahasrarjun matala Jamadagnicha vadh kela,
Kashtin te Renuka mhanuni sahasrarjun vadhila. ||
Nihkshatri prithvi daan didhali viprala,
Sahava avatar Parashuram pragatala. ||4||
Matala Ravan sarvan upadrav kela,
Tehatis koti dev bandin haralen Sitela. ||
Pitrivachanalagin ramen vanavas kela,
Miloni vanar sahit Rajaram pragatala. ||5||
Devakivasudev bandimochan tvan kelen,
Nandagharin jaun nijasukh gokula didhalen. ||
Gorasachori karitan navalaksh gopal milavile,
Gopikanchen prem dekhuni Shri Krishna bhulale. ||6||
Bauddha kalanki kaliyugin jhala adharma ha avagha,
Sanduni nityadharma soduni nandachi seva. ||
Mlechhamardan karisi mhanuni kalanki keshava,
Bahiravi janhavi dyavi nijasukh-anandaseva. ||7||
॥ Iti Sampurnam ॥
Bhaktasankatin nana swaroopin sthapisi swadharma. ||
Ambarushikaranen garbhavas soshisi,
Ved nele choruni Brahma aanuniyan desi. ||
Matsyarupi Narayan saptahi sagar dhundisi,
Hasta lagatan shankhasura tujha var desi. ||1||
Rasatalashin jatan prithvi pathivar ghesi,
Paropakarasathin deva kansav jhalasi. ||
Dadhen dharuni prithvi netan varaharup hosi,
Pralhadakaranen stambhin narahari gurugurasi. ||2||
Panchave avatarin balichya dwarala jasi,
Bhikshe sthal maguni balila patalin nesi. ||
Sarva samarpan kelen mhanuni prasanna tya hosi,
Vamanrup dharuni balichyadwarin tishthasi. ||3||
Sahasrarjun matala Jamadagnicha vadh kela,
Kashtin te Renuka mhanuni sahasrarjun vadhila. ||
Nihkshatri prithvi daan didhali viprala,
Sahava avatar Parashuram pragatala. ||4||
Matala Ravan sarvan upadrav kela,
Tehatis koti dev bandin haralen Sitela. ||
Pitrivachanalagin ramen vanavas kela,
Miloni vanar sahit Rajaram pragatala. ||5||
Devakivasudev bandimochan tvan kelen,
Nandagharin jaun nijasukh gokula didhalen. ||
Gorasachori karitan navalaksh gopal milavile,
Gopikanchen prem dekhuni Shri Krishna bhulale. ||6||
Bauddha kalanki kaliyugin jhala adharma ha avagha,
Sanduni nityadharma soduni nandachi seva. ||
Mlechhamardan karisi mhanuni kalanki keshava,
Bahiravi janhavi dyavi nijasukh-anandaseva. ||7||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"आरती सप्रेम जय जय विठ्ठल परब्रह्म" यह एक प्रसिद्ध मराठी आरती है जो भगवान विष्णु के दशावतार (Dashavatar), अर्थात दस प्रमुख अवतारों की स्तुति करती है। यद्यपि इसका आरंभ भगवान विट्ठल के जयघोष से होता है, जो महाराष्ट्र में विष्णु के प्रमुख स्वरूप हैं, यह आरती क्रमबद्ध रूप से उनके सभी दस अवतारों - मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि - की लीलाओं का संक्षिप्त और सारगर्भित वर्णन करती है। यह आरती इस सिद्धांत को दर्शाती है कि भगवान भक्तों के संकटों को दूर करने और धर्म की स्थापना (to establish Dharma) के लिए विभिन्न युगों में नाना प्रकार के स्वरूप धारण करते हैं।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती प्रत्येक अवतार की मुख्य लीला का स्मरण कराती है:
- धर्म की स्थापना (Establishment of Dharma): "भक्तसंकटीं नाना स्वरूपीं स्थापिसी स्वधर्म।" आरती की पहली पंक्ति ही अवतारों का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट करती है - भक्तों के संकटों में आकर धर्म की स्थापना करना।
- प्रारंभिक अवतार (Early Avatars): मत्स्य अवतार में वेदों को बचाना, कूर्म अवतार में मंदराचल पर्वत को धारण करना, वराह अवतार में पृथ्वी का उद्धार करना, और नरसिंह अवतार में प्रह्लाद की रक्षा करना - ये सभी परोपकार और भक्त-रक्षा के कार्य हैं।
- मानव रूपी अवतार (Human-like Avatars): वामन अवतार में राजा बलि का अहंकार हरना, परशुराम के रूप में अधर्मी क्षत्रियों का नाश करना, और राम अवतार में रावण का वध करके धर्म की पताका फहराना।
- पूर्ण अवतार और भविष्य (The Complete Avatar and the Future): कृष्ण अवतार में उनकी विभिन्न लीलाओं का वर्णन है, और अंत में बुद्ध और कल्कि अवतार का उल्लेख है, जो कलियुग में अधर्म के नाश के लिए होगा।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से एकादशी (Ekadashi) और गुरुवार (Thursday) के दिन भगवान विष्णु या विट्ठल की पूजा के अंत में गाई जाती है।
- दशावतार से संबंधित पर्वों, जैसे राम नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, नरसिंह जयंती आदि पर भी इसका पाठ करना अत्यंत शुभ होता है।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर और उन्हें तुलसी दल व पीले पुष्प अर्पित कर इस आरती का गायन करें।
- इस आरती का पाठ करने से भगवान विष्णु के सभी दस अवतारों की एक साथ कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं।