Logoपवित्र ग्रंथ

षट्तिला एकादशी व्रत कथा

माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी - तिल के 6 प्रयोग

षट्तिला एकादशी का महत्व

माघ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली इस एकादशी को षट्तिला एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी के आराध्य देव भगवान विष्णु हैं।

इस व्रत की विशेषता:

  • तिल (sesame) के 6 प्रयोग - इसी कारण नाम षट्तिला
  • समस्त पापों का नाश
  • नरक यातना से मुक्ति
  • जन्म-जन्म की आरोग्यता
  • धन-धान्य से घर भरपूर
  • दरिद्रता और कष्ट दूर
  • जितने तिल दान = उतने हजार वर्ष स्वर्ग
  • मोक्ष की प्राप्ति

विशेष: पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर कंडे बनाकर 108 बार हवन करना चाहिए।

[!IMPORTANT] इस एकादशी में तिल (sesame seeds) का विशेष महत्व है। तिल के 6 प्रयोग - तिल स्नान, तिल उबटन, तिल हवन, तिल तर्पण, तिल भोजन, तिल दान - अवश्य करने चाहिए। यह इन्द्र आदि देवताओं को भी अज्ञात गुप्त तत्व है।

एकादशी व्रत विधि

पूजा सामग्री

  • तिल (sesame seeds) - अत्यंत आवश्यक और प्रमुख
  • गोबर, कपास - कंडे बनाने के लिए
  • फूल और माला - सफेद और पीले फूल
  • धूप-दीप - अगरबत्ती, घी का दीपक
  • नैवेद्य - खिचड़ी, फल, मिष्ठान
  • अर्घ्य सामग्री - पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी
  • चंदन - लाल चंदन, केसर
  • कलश - जल से भरा कलश
  • पंचामृत - दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • अक्षत - चावल के दाने
  • वस्त्र - भगवान को अर्पित करने के लिए
  • गौ - यदि संभव हो तो गौ दान
  • दक्षिणा - ब्राह्मणों के लिए तिल पात्र

षट्तिला व्रत की विधि - तिल के 6 प्रयोग

पुष्य नक्षत्र में (व्रत से पहले):

  • गोबर, कपास और तिल मिलाकर कंडे (उपले) बनाएं
  • इन कंडों से 108 बार हवन करें
  • काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार का त्याग करें
  • इंद्रियों को वश में करें

एकादशी के दिन (मूल नक्षत्र + एकादशी तिथि):

1. तिल स्नान:

  • स्नान के जल में तिल मिलाएं
  • तिल युक्त जल से स्नान करें

2. तिल उबटन:

  • शरीर पर तिल का उबटन लगाएं
  • इससे शरीर शुद्ध होता है

3. तिलोदक (तिल तर्पण):

  • तिल मिश्रित जल से तर्पण करें
  • पितरों को तृप्ति मिलती है

4. तिल हवन:

  • हवन में तिल की आहुति दें
  • पुष्य नक्षत्र के कंडों से हवन करें

5. तिल भोजन:

  • भोजन में तिल का उपयोग करें
  • तिल युक्त व्यंजन बनाएं

6. तिल दान:

  • ब्राह्मणों को तिल पात्र दान करें
  • यदि संभव हो तो गौ के साथ तिल दान करें

भगवान विष्णु का पूजन:

  • स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • देवों के देव श्री विष्णु की पूजा करें
  • धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें
  • खिचड़ी का भोग लगाएं
  • पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी का अर्घ्य दें
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
  • पूर्ण उपवास रखें

अर्घ्य के समय स्तुति:

"हे भगवन्! आप निराश्रितों को शरण देने वाले हैं। आप संसार में डूबे हुओं का उद्धार करने वाले हैं। हे पुन्डरीकाक्ष! हे कमलनेत्रधारी! हे विश्व विधाता! हे सुब्रह्मण्य! आप लक्ष्मी जी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।"


रात्रि जागरण:

  • रात्रि में जागरण करना अत्यंत फलदायी है
  • भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें
  • हरि नाम का जाप करें
  • व्रत कथा का श्रवण-पठन करें

द्वादशी पारण और दान:

  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं
  • जल से भरा कुंभ (घड़ा) दान करें
  • तिल पात्र दान करें
  • यदि संभव हो तो श्यामा गौ दान करें
  • विशेष रूप से दक्षिणा दें
  • त्रयोदशी से पूर्व पारण करें

विशेष: जितने तिल दान करेंगे, उतने ही हजार वर्ष स्वर्ग में निवास करेंगे।

षट्तिला एकादशी व्रत कथा

माघ कृष्णपक्ष

श्री षट्तिला एकादशी की संपूर्ण कथा

श्री कृष्ण भगवान् के श्रीमुख से मन को आनन्द एवं सन्तोष देने वाली एकादशियों के व्रत की उत्तम कथाएं सुनकर अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उन्हें नमन किया और बोले – "हे मधुसूदन! आपके मुख से कथाएं सुनकर मुझे अपार आनन्द मिला है। हे जगदीश्वर! कृपा कर अन्य एकादशियों की कथाएं भी सुनाने का कष्ट करें।"


माघ कृष्ण एकादशी का परिचय:

"हे पार्थ! अब मैं माघ मास के कृष्ण पक्ष की षट्तिला एकादशी व्रत की कथा सुनाता हूं –


दालभ्य और पुलस्त्य ऋषि का संवाद:

एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा – "हे मुनीश्वर! मनुष्य मृत्युलोक में ब्रह्महत्या आदि महान् पाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्नति देकर ईर्ष्या आदि करते हैं, ऐसे सभी पाप मनुष्य क्रोध, ईर्ष्या, उत्तेजना और अज्ञानतावश करते हैं और बाद में पश्चात्ताप करते हैं कि हाय! यह मैंने क्या किया!

हे महामुनि! ऐसे प्राणियों को नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे ऐसे प्राणियों को नरक प्राप्त न हो। ऐसा कौन सा दान-पुण्य है जिसके प्रभाव से नरक यातना से बचा जा सकता है, यह सब आप कृपा पूर्वक कहिए?"


पुलस्त्य ऋषि का उपदेश:

इस पर पुलस्त्य महात्मा बोले – "हे महाभाग! आपने मुझसे अत्यन्त गम्भीर प्रश्न पूछा है। इससे संसारीजनों का बहुत लाभ होगा। जिस भेद को इन्द्र आदि देव भी नहीं जानते, वह भेद मैं आपको अवश्य ही बताऊंगा।

माघ मास आने पर मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध रहना चाहिए और इन्द्रियों को वश में करके तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार आदि से सर्वथा बचना चाहिए।

पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर कण्डे (उपले) बनाना चाहिए। उन कंडों से १०८ बार हवन करें।

जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, तब अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करना चाहिए। स्नान आदि नित्य क्रिया से देवों के देव भगवान् श्री विष्णु का पूजन-कीर्तन करना चाहिए।

एकादशी के दिन व्रत करें और रात्रि को जागरण तथा हवन करें। उसके दूसरे दिन धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान् का पूजन करें और खिचड़ी का भोग लगाना चाहिए।

उस दिन भगवान् को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य देना चाहिए।


षट्तिला - तिल के छह प्रयोग:

इसके पश्चात् ब्राह्मण को जल से भरा कुंभ, तिल दान करना चाहिए। यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को गौ और तिल दान देना चाहिए।

इस प्रकार मनुष्य जितने तिल दान करता है। वह उतने ही सहस्त्र वर्ष स्वर्ग में निवास करता है।

१. तिल स्नान
२. तिल की उबटन
३. तिलोदक (तिल तर्पण)
४. तिल का हवन
५. तिल का भोजन
६. तिल का दान

इस प्रकार छ: रूपों में तिलों का प्रयोग षट्तिला कहलाती है। इससे अनेक प्रकार के पाप दूर हो जाते हैं।


नारद और विष्णु का संवाद:

ऐसा कहकर पुलस्त्य ऋषि बोले – "अब मैं एकादशी की कथा कहता हूं - एक दिन नारद ऋषि ने भगवान् से षट्तिला एकादशी के संबंध में पूछा, वे बोले – "हे भगवन्! आपको नमस्कार है। षट्तिला एकादशी के व्रत का पुण्य क्या है? उनकी क्या कथा है, सो कृपा कर कहिए।"

नारद की विनती सुनकर श्री विष्णु भगवान् बोले – "हे नारद! मैं तुमसे आंखों देखी सत्य घटना कहता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो –


व्रत करने वाली ब्राह्मणी:

प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक माह तक व्रत करती रही, इससे उसका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। वह अत्यन्त बुद्धिमान थी।

फिर उसने कभी भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के निमित्त अन्नादि का दान नहीं किया

मैंने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर तो शुद्ध कर लिया है और इसको विष्णु लोक भी प्राप्त हो जायेगा। परन्तु इसने कभी अन्नदान नहीं किया है, अन्न के बिना प्राणी की तृप्ति होना कठिन है।


भगवान का भिक्षु रूप:

ऐसा सोचकर मैं मृत्यु लोक में गया और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा मांगी।

वह ब्राह्मणी बोली – "हे महाराज! आप यहां किसलिए आये हैं?"

मैंने कहा – "मुझे भिक्षा चाहिए।"

इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया।

मैं उसे लेकर स्वर्ग लौट आया।


स्वर्ग में ब्राह्मणी का आगमन:

कुछ समय बीतने पर वह ब्राह्मणी भी शरीर त्यागकर स्वर्ग आई। मिट्टी के पिण्ड के प्रभाव से उसे उस जगह एक आम वृक्ष सहित गृह मिला, परन्तु उसने गृह को अन्य वस्तुओं से शून्य पाया।

वह घबराई हुई मेरे पास आई और बोली – "हे भगवन्! मैंने अनेकों व्रत आदि से आपकी पूजा की है। परन्तु फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रहित है, इसका क्या कारण है?"


देवस्त्रियों से षट्तिला का ज्ञान:

मैंने कहा – "तुम अपने गृह को जाओ और जब देव-स्त्रियां तुम्हें देखने आएं, तब तुम उनसे षट्तिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और विधि पूछना, जब तक वह तुम्हें न बताएं, तब तक द्वार न खोलना।"

भगवान् के ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर को गई और जब देव स्त्रियां आईं और द्वार खुलवाने लगीं तब वह ब्राह्मणी बोली – "यदि आप मुझे देखने आई हैं तो पहले षट्तिला एकादशी का माहात्म्य कहिए।"

उनमें से एक देव स्त्री बोली – "यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो सुनो – मैं तुम्हें एकादशी व्रत और उसका माहात्म्य विधि सहित कहती हूं।"

जब उसने षट्तिला एकादशी का माहात्म्य सुना दिया, तब उस ब्राह्मणी ने द्वार खोला।


व्रत का प्रभाव:

देव स्त्रियों ने उसको सब स्त्रियों से अलग पाया। उस ब्राह्मणी ने भी देव स्त्रियों के कहे अनुसार षट्तिला का व्रत किया और इसके प्रभाव से उसका गृह धनधान्य से भरपूर हो गया।


व्रत का महत्व:

अतः हे अर्जुन! मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षट्तिला एकादशी का व्रत करना चाहिए। इससे मनुष्यों को जन्म-जन्म की आरोग्यता प्राप्त हो जाती है। इस व्रत से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

कथासार

इस व्रत से जहां हमें शारीरिक शुद्धि और आरोग्यता प्राप्त होती है, वहीं अन्न, तिल आदि दान करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है।

इस कथा की शिक्षा:

  • व्रत के साथ दान भी आवश्यक - केवल व्रत से घर खाली रहा
  • प्राणी जो-जो और जैसा दान करता है, शरीर त्यागने के बाद वैसा ही प्राप्त होता है
  • मिट्टी का पिंड दिया = आम वृक्ष सहित घर मिला (पर खाली)
  • अन्न के बिना तृप्ति कठिन है
  • बिना दानादि के कोई भी धार्मिक कार्य सम्पन्न नहीं - शास्त्र वचन
  • धार्मिक कृत्यों के साथ-साथ दान अवश्य करना चाहिए
  • तिल दान का विशेष महत्व - जितने तिल = उतने हजार वर्ष स्वर्ग
  • पाप अज्ञानतावश होते हैं - बाद में पश्चात्ताप
  • इन्द्र आदि को भी अज्ञात - षट्तिला का गुप्त तत्व
  • व्रत करने से जन्म-जन्म की आरोग्यता

जय श्री हरि!

FAQ

षट्तिला कब?

माघ कृष्ण। जनवरी-फरवरी में।

तिल के 6 प्रयोग?

स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन, दान।

संबंधित

जय श्री हरि! ॥

।। ॐ नमः शिवाय ।।