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परिवर्तिनी (वामन) एकादशी व्रत कथा

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी - भगवान विष्णु करवट बदलते हैं

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या वामन एकादशी या जयंती एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी के आराध्य देव भगवान विष्णु (वामन रूप) हैं।

इस व्रत के अद्भुत लाभ:

  • कथा श्रवण मात्र से समस्त पापों का नाश
  • स्वर्ग का अधिकारी
  • नीच पापियों का भी उद्धार
  • ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की पूजा का फल
  • विष्णु लोक की प्राप्ति
  • अश्वमेध यज्ञ का फल
  • इस लोक और परलोक दोनों में यश
  • स्वर्ग में चंद्रमा के समान प्रकाशित
  • संसार में कुछ भी करना शेष नहीं रहता

विशेष: इस दिन भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं।

[!IMPORTANT] परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट लेते हैं। इस दिन श्रीवामन भगवान की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवताओं की पूजा का फल मिलता है। यह चातुर्मास में विशेष महत्व रखती है।

एकादशी व्रत विधि

पूजा सामग्री

  • तुलसी दल - भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय
  • फूल और माला - सफेद और पीले फूल, विशेषकर कमल
  • धूप-दीप - अगरबत्ती, घी का दीपक
  • नैवेद्य - फल, मधु, मिष्ठान
  • चंदन - लाल चंदन, केसर
  • कलश - जल से भरा कलश
  • पंचामृत - दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • अक्षत - चावल के दाने
  • वस्त्र - भगवान को अर्पित करने के लिए
  • शय्या - विष्णु जी के करवट बदलने की प्रतीकात्मक व्यवस्था
  • दान सामग्री - चावल, दही, चांदी, तांबा
  • दक्षिणा - ब्राह्मणों के लिए

व्रत की विधि

दशमी तिथि पर (एक दिन पहले):

  • सात्त्विक भोजन करें
  • मांस, प्याज, लहसुन से परहेज करें
  • रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें
  • परिवर्तिनी व्रत की तैयारी करें

एकादशी के दिन:

  • प्रातःकाल स्नान करें
  • स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • भगवान विष्णु की वामन रूप में पूजा करें
  • प्रतीकात्मक रूप से भगवान को करवट बदलने की व्यवस्था करें
  • तुलसी दल, कमल पुष्प से पूजन करें
  • फूल, नैवेद्य अर्पित करें
  • धूप, दीप से पूजन करें
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
  • पूर्ण उपवास रखें

वामन भगवान की विशेष प्रार्थना:

"हे वामन रूपधारी भगवान विष्णु! आप त्रिविक्रम रूप में तीन पग में तीनों लोक को नाप गए। आप राजा बलि के भक्त हैं और उनके रक्षक भी। आप आज करवट बदल रहे हैं। मुझे भी अपनी शरण में लें। मेरे सभी पाप नष्ट करें।"


रात्रि जागरण:

  • रात्रि में जागरण अत्यंत आवश्यक है
  • भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें
  • वामन अवतार की गाथा का स्मरण करें
  • हरि नाम का जाप करें
  • व्रत कथा का श्रवण-पठन करें

द्वादशी पारण और दान:

  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं
  • चावल और दही सहित चांदी का दान करें
  • तांबा का दान भी शुभ है
  • विशेष रूप से दक्षिणा दें
  • गरीबों को अन्न दान करें
  • त्रयोदशी से पूर्व पारण करें

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

भाद्रपद शुक्लपक्ष

श्री परिवर्तिनी (वामन) एकादशी की संपूर्ण कथा

अर्जुन ने कहा – "हे भगवन्! भादों की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसके व्रत की विधि क्या है? उस एकादशी के व्रत को करने से कौन-सा फल मिलता है, हे मधुसूदन! यह सब समझाकर कहिए।"

भगवान् श्री कृष्ण बोले – "हे अर्जुन! भादों मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जयन्ती एकादशी भी कहते हैं। इस एकादशी की कथा के सुनने मात्र से ही समस्त पापों का नाश हो जाता है और प्राणी स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है। इस जयन्ती एकादशी की कथा से नीच पापियों का भी उद्धार हो जाता है।

यदि कोई धर्मपरायण मनुष्य एकादशी के दिन मेरी पूजा करता है तो मैं उसको संसार की पूजा का फल देता हूं। जो मनुष्य मेरी पूजा करता है, उसे मेरे लोक की प्राप्ति होती है। इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं।

जो मनुष्य इस एकादशी के दिन श्रीवामन भगवान की पूजा करता है वह तीनों देवता अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश की पूजा करता है। हे अर्जुन! जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें इस संसार में कुछ भी करना शेष नहीं रहता

इस एकादशी के दिन श्रीविष्णु भगवान् करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।"


इस पर आश्चर्यचकित होकर अर्जुन बोले – "हे कृष्णजी! आपके वचनों को सुनकर मैं भ्रम में पड़ गया हूं कि आप किस प्रकार सोते तथा करवट बदलते हैं? आपने बलि को क्यों बांधा और वामन रूप धारण करके क्या लीलाएं कीं। चातुर्मास्य व्रत की विधि क्या है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्त्तव्य है, सो सब विस्तारपूर्वक कहिए।"


श्री कृष्ण भगवान् बोले – "हे अर्जुन! अब तुम पापों को नष्ट करने वाली इस कथा का श्रवण करो। त्रेतायुग में बलि नाम का एक दानव था। वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदैव यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन न कर सके और भगवान् के पास जाकर प्रार्थना करने लगे। अन्त में मैंने वामन रूप धारण किया और तेजस्वी ब्राह्मण बालक रूप में राजा बलि को जीता।"

इस पर अर्जुन बोले – "हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस बलि को किस प्रकार जीता, यह सब विस्तारपूर्वक समझाइये।"


श्री कृष्ण भगवान् बोले – "मैंने वामन रूप धारण करके राजा बलि से याचना की कि हे राजन्! तुम मुझे तीन पैर भूमि दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने इस छोटी-सी याचना को स्वीकार कर लिया और भूमि देने को तैयार हो गया।

जब उसने मुझे वचन दे दिया, तब मैंने अपने आकार को बढ़ाया और भूलोक में पैर, भुवन लोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महर्लोक में पेट, जन लोक में हृदय, तप लोक में कंठ और सत्यलोक में मुख रखकर अपने सिर को ऊंचा उठा लिया। उस समय सूर्य, नक्षत्र, इन्द्र तथा अन्य देवता मेरी स्तुति करने लगे।

उस समय मैंने राजा बलि से पूछा कि हे राजन्! अब मैं तीसरा पैर कहां रखूं। इतना सुनकर राजा बलि ने अपना सिर नीचा कर दिया। तब मैंने अपना तीसरा पग उसके सिर पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिए मैंने अपने उस असुर भक्त को पाताल लोक में पहुंचा दिया

तब वह मुझसे विनती करने लगा। मैंने उससे कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे पास रहूंगा। भादों के शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है।"


इस एकादशी को विष्णु भगवान् सोते हुए करवट बदलते हैं। इस दिन त्रिलोकी के नाथ श्री विष्णु भगवान् की पूजा की जाती है। इसमें चावल और दही सहित चांदी का दान किया जाता है। इस दिन रात्रि को जागरण करना चाहिए।

इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को जाता है। वह स्वर्ग लोक में जाकर सदैव चन्द्रमा के समान प्रकाशित रहता है। उसको इस लोक तथा परलोक दोनों में यश मिलता है। जो इन पापों को नष्ट करने वाली कथा सुनते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

कथासार

व्यक्ति दान करे किन्तु दान करके अभिमान न करे। अहंकार व्यक्ति को ले डूबता है।

इस कथा की शिक्षा:

  • राजा बलि ने अभिमान किया और पाताल को चला गया
  • अति हर कार्य की बुरी होती है
  • भक्ति के प्रभाव से असुर भी स्वर्ग का अधिकारी बन सकता है
  • बलि दानी, सत्यवादी, ब्राह्मणसेवी था - फिर भी स्वर्ग गया
  • वचन की महत्ता - बलि ने वचन न तोड़ा, सिर दे दिया
  • भगवान भक्त से वादा निभाते हैं - "मैं सदैव तुम्हारे पास रहूंगा"
  • त्रिविक्रम रूप - तीन पग में तीनों लोक
  • भगवान की दो प्रतिमाएं - बलि के पास और क्षीरसागर में
  • करवट बदलना - भगवान की चातुर्मास लीला
  • परिवर्तिनी एकादशी पर चावल-दही-चांदी दान
  • वामन पूजा = ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की पूजा
  • नीच पापियों का भी उद्धार संभव

जय श्री हरि!

FAQ

परिवर्तिनी कब?

भाद्रपद शुक्ल। सितंबर में।

महत्व?

विष्णु करवट बदलते हैं। वामन पूजा।

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जय श्री हरि! ॥

।। ॐ नमः शिवाय ।।