पद्मिनी एकादशी व्रत कथा
अधिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी - दुर्लभ वस्तु प्राप्ति
पद्मिनी एकादशी का महत्व
अधिक (मल/लौंद) मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। यह 36 महीने बाद आती है। इस एकादशी के आराध्य देव भगवान विष्णु हैं।
इस व्रत के अद्भुत लाभ:
- अनेक पुण्यों को देने वाली
- विष्णुलोक की प्राप्ति
- मुक्ति और भक्ति दोनों प्रदान करती है
- दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति
- जप-तप से भी अधिक प्रभावशाली
- चारों पहर अलग-अलग यज्ञ फल (अग्नि होम, वाजपेय, अश्वमेध, राजसूय)
- समस्त तीर्थ और यज्ञों का फल
- इस व्रत से बढ़कर कोई यज्ञ, तप, दान नहीं
- अजय पुत्र की प्राप्ति (कार्तवीर्य जैसा)
विशेष: अधिक मास भगवान को अत्यंत प्रिय है और उसमें भी एकादशी सबसे अधिक प्रिय तिथि है।
[!IMPORTANT] पद्मिनी एकादशी भगवान की सबसे प्रिय तिथि है। यह जप-तप से भी अधिक प्रभावशाली है। इस व्रत से दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु प्राप्त हो सकती है। 36 महीने में एक बार आने वाली यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है।
एकादशी व्रत विधि
पूजा सामग्री
- स्वर्ण प्रतिमा - राधा-कृष्ण और पार्वती-महादेव
- घड़ा - मिट्टी या तांबे का, धान्य के ऊपर
- पात्र - तांबा, चांदी या सोने का (घड़े के मुंह पर)
- तुलसी दल - भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय
- फूल और माला - सफेद और पीले फूल
- धूप-दीप - अगरबत्ती, घी का दीपक
- नैवेद्य - फल, मधु, मिष्ठान
- केसर, चंदन - पूजन के लिए
- वस्त्र - घड़े और प्रतिमा के लिए
- चार पहर के फल - नारियल, बिल्वफल, सीताफल, सुपारी/नारंगी
- स्नान सामग्री - गोबर, मृत्तिका, तिल, कुश, आमलकी चूर्ण
- दक्षिणा - ब्राह्मणों के लिए
व्रत की विधि
दशमी तिथि पर (एक दिन पहले):
- कांसे के पात्र का त्याग - किसी भी रूप में प्रयोग नहीं
- निषिद्ध भोजन त्यागें: मांस, मसूर, चना, कोदों, शहद, शाक, पराया अन्न
- हविष्य भोजन करें (बिना नमक)
- रात्रि में भूमि पर शयन
- ब्रह्मचर्य का पालन करें
एकादशी के दिन - प्रातःकाल:
- नित्य कर्म से निवृत्त हों
- दातुन करें, 12 बार कुल्ला करें
- पुण्य क्षेत्र में स्नान के लिए जाएं
- विशेष स्नान विधि:
- गोबर, मृत्तिका, तिल, कुश, आमलकी चूर्ण से स्नान
- मिट्टी लगाते हुए प्रार्थना करें (नीचे देखें)
- वरुण मंत्र जपें
- तीर्थों का स्मरण करें
मिट्टी से प्रार्थना:
"हे मृत्तिके! मैं तुमको नमस्कार करता हूं। तुम्हारे स्पर्श से मेरा शरीर पवित्र हो। समस्त औषधियों से पैदा हुई, और पृथ्वी को पवित्र करने वाली, तुम मुझे शुद्ध करो। ब्रह्मा के थूक से पैदा होने वाली! तुम मेरे शरीर को छूकर मुझे पवित्र करो। हे शंख-चक्र-गदा धारी देवों के देव! जगन्नाथ! आप मुझे स्नान के लिए आज्ञा दीजिये।"
पूजन विधि:
- स्वच्छ सुंदर वस्त्र धारण करें
- संध्या, तर्पण करें
- मंदिर में जाएं
- स्वर्ण की प्रतिमा बनाएं - राधा-कृष्ण और पार्वती-महादेव
- धान्य पर घड़ा रखें
- घड़े को वस्त्र-गंध से अलंकृत करें
- घड़े के मुंह पर पात्र रखें
- पात्र पर भगवान की प्रतिमा स्थापित करें
- धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, केसर से पूजा करें
- भगवान के सम्मुख नृत्य-गान करें
व्रत के नियम:
- पतित और रजस्वला स्त्री को स्पर्श नहीं करें
- भक्तजनों के साथ पुराण कथा सुनें
- निर्जल व्रत करें (यदि संभव हो)
- यदि शक्ति न हो तो जलपान या अल्पाहार
रात्रि जागरण - चार पहर पूजन:
- पहला पहर: नारियल अर्पित करें → अग्नि होम का फल
- दूसरा पहर: बिल्वफल अर्पित करें → वाजपेय यज्ञ का फल
- तीसरा पहर: सीताफल अर्पित करें → अश्वमेध यज्ञ का फल
- चौथा पहर: सुपारी/नारंगी अर्पित करें → राजसूय यज्ञ का फल
- प्रति पहर विष्णु या महादेव की पूजा
- नाच-गान करके भगवान का स्मरण
द्वादशी पारण:
- सूर्योदय तक जागरण करें
- स्नान करें
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं
- सब पदार्थ भगवान की प्रतिमा सहित ब्राह्मणों को दान दें
- दक्षिणा दें
पद्मिनी एकादशी व्रत कथा
अधिक मास शुक्लपक्ष
श्री पद्मिनी एकादशी की संपूर्ण कथा
अर्जुन ने कहा – "हे भगवन्! अब आप अधिक (मल) मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में बताएं। उस एकादशी का नाम क्या है तथा उसके व्रत की विधि क्या है? इसमें किस देवता की पूजा की जाती है और इसके व्रत से क्या फल मिलता है? कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक कहें।"
श्रीकृष्ण बोले – "हे पार्थ! अधिक (लौंद) मास की एकादशी अनेक पुण्यों को देने वाली है, उसका नाम पद्मिनी है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। इस एकादशी के व्रत की विधि को मैंने सबसे पहले नारदजी से कहा था। यह विधि अनेक पापों का नष्ट करने वाली तथा मुक्ति और भक्ति प्रदान करने वाली है।
हे पार्थ! मैंने तुम्हें एकादशी के व्रत का पूरा विधान बता दिया। अब जो पद्मिनी एकादशी का भक्तिपूर्वक व्रत कर चुके हैं, उनकी कथा को कहता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो। यह सुन्दर कथा पुलस्त्यजी ने नारदजी से कही थी –
एक समय कार्तवीर्य ने रावण को अपने बंदीगृह में बन्द कर लिया। उसे मुनि पुलस्त्य ने कार्तवीर्य से विनय करके छुड़ाया। इस घटना को सुनकर नारदजी ने पुलस्त्यजी से पूछा – "हे महाराज! उस मायावी रावण को, जिसने समस्त देवताओं सहित इन्द्र को जीत लिया, कार्तवीर्य ने किस प्रकार जीता, सो आप मुझे समझाइए।"
इस पर पुलस्त्यजी बोले – "हे नारदजी! आप पहले कार्तवीर्य की उत्पत्ति का वृत्तांत सुनो –
त्रेतायुग में महिष्मती नामक नगरी में कार्तवीर्य नामक एक राजा राज्य करता था। उस राजा के सौ स्त्रियां थीं, उसमें से किसी के भी राज्य भार संभालने वाला योग्य पुत्र नहीं था। तब राजा ने आदरपूर्वक पण्डितों को बुलवाया और पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किये, परन्तु सब असफल रहे।
जिस प्रकार दु:खी मनुष्य को भोग नीरस मालूम पड़ते हैं, उसी प्रकार उसको भी अपना राज्य पुत्र बिना दु:खमय प्रतीत होता था। अन्त में वह तप के द्वारा ही सिद्धियों को प्राप्त जानकर तपस्या करने के लिए वन को चला गया।
उसकी स्त्री (हरिश्चन्द्र की पुत्री प्रमदा) वस्त्रालंकारों को त्याग कर अपने पति के साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गई। उस स्थान पर इन लोगों ने दस हजार वर्ष तक तपस्या की परन्तु सिद्धि प्राप्त न हो सकी। राजा के शरीर में केवल हड्डियां रह गईं।
यह देख कर प्रमदा ने विनय सहित महासती अनसूया से पूछा – "मेरे पतिदेव को तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गये, परन्तु अभी तक भगवान् प्रसन्न नहीं हुए हैं, जिससे मुझे पुत्र प्राप्त हो। इसका क्या कारण है?"
इस पर अनसूया बोली – "अधिक (लौंद) मास में जो कि छत्तीस महीने बाद आता है, उसमें दो एकादशी होती हैं। इसमें शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी और कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम परमा है। उसके जागरण और व्रत करने से भगवान् तुम्हें अवश्य ही पुत्र देंगे।"
इसके पश्चात् अनसूयाजी ने व्रत की विधि बतलाई। रानी ने अनसूया की बतलाई विधि के अनुसार एकादशी का व्रत और रात्रि में जागरण किया। इससे भगवान् विष्णु उस पर बहुत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने के लिए कहा।
रानी ने कहा – "आप यह वरदान मेरे पति को दीजिए।"
प्रमदा का वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले – "हे प्रमदे! मल मास (लौंद) मुझे बहुत प्रिय है। उसमें भी एकादशी तिथि मुझे सबसे अधिक प्रिय है। इस एकादशी का व्रत तथा रात्रि जागरण तुमने विधिपूर्वक किया। इसलिए मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूं।"
इतना कहकर भगवान् विष्णु राजा से बोले – "हे राजेन्द्र! तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो। क्योंकि तुम्हारी स्त्री ने मुझको प्रसन्न किया है।"
भगवान् की मधुर वाणी सुनकर राजा बोला – "हे भगवन्! आप मुझे सबसे श्रेष्ठ, सबके द्वारा पूजित तथा आपके अतिरिक्त देव, दानव, मनुष्य आदि से अजय उत्तम पुत्र दीजिए।"
भगवान् तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये।
उसके बाद वे दोनों अपने राज्य को वापस आ गये। उन्हीं के यहां कार्तवीर्य उत्पन्न हुए थे। वह भगवान् के अतिरिक्त सबसे अजय थे। इन्होंने रावण को जीत लिया था। यह सब पद्मिनी के व्रत का प्रभाव था।" इतना कहकर पुलस्त्यजी वहां से चले गये।
भगवान् बोले – "हे पाण्डुनन्दन अर्जुन! यह मैंने अधिक (लौंद) मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत कहा है। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह विष्णु लोक को जाता है।"
सूतजी बोले – "हे महर्षियो! जो आपने पूछा था, सो मैंने सब कह दिया। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? जो मनुष्य इसकी कथा को सुनेंगे वे स्वर्ग लोक को जाएंगे।"
कथासार
भगवान् सर्वशक्तिमान हैं, वे दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु देने में समर्थ हैं, किन्तु भगवान् को प्रसन्न करके अपनी मनवांछित वस्तु प्राप्त करने का मार्ग मनुष्य को ज्ञात होना चाहिए।
इस कथा की शिक्षा:
- 36 महीने में एक बार - अधिक मास (मल मास/लौंद)
- जप-तप से भी अधिक प्रभावशाली व्रत
- सौ रानियां, कोई योग्य पुत्र नहीं
- अनेक यज्ञ किए, सब असफल
- 10,000 वर्ष तपस्या - फिर भी सिद्धि नहीं
- शरीर में केवल हड्डियां रह गईं
- महासती अनसूया ने पद्मिनी एकादशी बताई
- रानी प्रमदा ने विधिपूर्वक व्रत किया
- वरदान पति को दे दिया - पतिव्रता धर्म
- अधिक मास भगवान को बहुत प्रिय
- उसमें भी एकादशी सबसे अधिक प्रिय
- कार्तवीर्य - भगवान के अतिरिक्त सबसे अजय
- रावण को जीत लिया - जिसने इंद्र को हराया था
- यह सब पद्मिनी व्रत का प्रभाव
जय श्री हरि!
भगवान विष्णु आरती और चालीसा
(व्रत के अंत में आरती अवश्य करें)