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दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा

|| श्री गणेशाय नमः ||

घट स्थापना दुर्गा पूजन सामग्री

गंगाजल, रोली, मौली, पान, सुपारी, धूपबत्ती, घी का दीपक, फल, फूल की माला, विल्वपत्र, चावल, केले का खम्भा, बन्दनवार के वास्ते आम के पत्ते, चन्दन, घट, नारियल, सूर्योषधि हल्दी की गांठ, पंचरत्न, लाल वस्त्र, पूर्ण पात्र (चावल से भरा पात्र), गंगा की मृत्तिका, जौ, (जव), बताशा, सुगन्धित तेल, सिन्दूर, कपूर, पंच सुगन्ध, नैवेद्य के वास्ते फल इत्यादि (पंचामृत), दूध, दही, मधु, चीनी (पंचगव्य), गाय का गोबर, गोमूत्र, गो दूध, गो रही, गो घृत, दुर्गा जी की स्वर्ण मूर्ति अथवा मृत्तिका की प्रतिमा, कुमारी पूजन के लिए वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्यादि, अष्टमी में ज्योति पूजन के वास्ते, उपरोक्त सामग्री। डाभ घृत, गंगाजल।

दुर्गा नवरात्र व्रत कथा

विधि और महत्व

इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं। प्रातःकाल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढ़नी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं। कथा के अन्त में बारम्बार "दुर्गा माता तेरी सदा जय हो" का उच्चारण करें।

|| कथा प्रारम्भ ||
|| कथा प्रारम्भ ||

पौराणिक कथा

बृहस्पति जी का प्रश्न

बृहस्पति जी बोले- "हे ब्रह्मा जी! आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। चैत्र, आश्विन, माघ और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में जब नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? हे भगवन्! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार करना उचित है और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो।"

ब्रह्मा जी का उत्तर

बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे- "हे बृहस्पति! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।"

"इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है।"

मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या और काक बन्ध्या के इस व्रत के करने से पुत्र हो जाता है। समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन-सा मनोरथ है जो सिद्ध नहीं हो सकता।

जो मनुष्य इस अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता-पिता हीन हो जाता है, अर्थात् उसके माता-पिता मर जाते हैं और अनेक दुःखों को भोगता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंगहीन हो जाता है, उसके सन्तानोत्पत्ति नहीं होती। इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुःख भोगता है।

इस व्रत को न करने वाला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो, भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता रहता है और गूंगा हो जाता है। जो सुहागिन स्त्री भूल से इस व्रत को नहीं करती वह पति से हीन होकर नाना प्रकार के दुःखों को भोगती है। यदि व्रत करने वाले मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सकें तो एक समय भोजन करें और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र की कथा का श्रवण करें।

सुमति की कथा

हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम सावधान होकर सुनो।

पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो, ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पैदा हुई।

वह कन्या अपने घर में बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा पूजा और होम किया करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी।

पिता का क्रोध और श्राप

एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा- "हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।"

इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुःख हुआ और पिता से कहने लगी- "पिताजी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से आधीन हूं जैसी आप की इच्छा हो वैसा ही करो। रोगी, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा विवाह कर सकते हो। होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है।"

"मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है। जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार ही मिलता है, क्योंकि कर्म करना मनुष्य के अधीन है पर फल देव के अधीन है।"

जैसे अग्नि में पड़े हुए तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं, उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा- "जाओ, जल्दी जाओ! अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर क्या करती है?"

वन में कष्ट और देवी का प्रकट होना

इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि- "अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला।" इस तरह अपने दुःख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।

उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगीं- "हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं।"

इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी- "आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो? यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन-दासी को कृतार्थ करो।"

ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुन देवी कहने लगीं- "मैं आदि शक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मा और सरस्वती हूं। मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुःख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं।"

पूर्व जन्म की कथा

हे ब्राह्मणी! मैं तुम पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं। तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूं, सुनो!

तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया।

इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया। इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ, उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनोवांछित वस्तु दे रही हूं। तुम्हारी इच्छा हो सो मांगो।

इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचनों को सुनकर ब्राह्मणी बोली- "अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूं। कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो।"

देवी कहने लगीं- "उन दिनों में जो तुमने व्रत किया था, उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति का कोढ़ दूर होने के लिए अर्पण करो। मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जायेगा।"

पति की व्याधि मुक्ति

ब्रह्मा जी बोले- इस प्रकार देवी का वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और अपने पति को निरोग करने की इच्छा से "ठीक है", ऐसे बोली। तब तक उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया, जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती है।

वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रमी वाली समझ कर स्तुति करने लगी- "हे दुर्गे! आप दुर्गति को दूर करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो। तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो। हे अम्बे! मुझ अपराध रहित अबला को मेरे पिता ने कुष्ठी के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया। आपने ही मेरा आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है। हे देवी! आपको प्रणाम करती हूं। मुझ दीन की रक्षा करो।"

पुत्र रत्न और व्रत विधि

ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की बहुत स्तुति की, उससे की हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत सन्तोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी- "हे ब्राह्मणी! तेरे उदायल नाम का अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र ही होगा।"

ऐसा कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगीं- "हे ब्राह्मणी! और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु मांग सकती है।"

ऐसा भगवती के वचन सुनकर सुमति बोली- "हे भगवती दुर्गे! अगर आप मेरे पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्रि विधि बताइए। जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं, उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें।"

नवरात्र व्रत विधि

इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर दुर्गा कहने लगीं- "हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत की विधि को बतलाती हूं, जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।"

  • समय: आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करें।
  • आहार: यदि दिन भर व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें।
  • स्थापना: पढे लिखे ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें।
  • पूजन: महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती इनकी मूर्तियां बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधि पूर्वक अर्घ्य दें।

पुष्प और नैवेद्य का महत्व

  • बिजौरा के फूल: अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है।
  • जायफल: कीर्ति की प्राप्ति।
  • दाख: कार्य की सिद्धि।
  • आंवला: सुख की प्राप्ति।
  • केला: आभूषण की प्राप्ति।

इस प्रकार फलों से अर्घ्य देकर यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, जौ, तिल, बिम्ब, नारियल, दाख और कदम्ब - इनसे हवन करें।

  • गेहूं: लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
  • खीर व चम्पा के पुष्प: धन की प्राप्ति।
  • पत्तों से: तेज और सुख की प्राप्ति।
  • आंवले से: कीर्ति।
  • केले से: पुत्र।
  • कमल से: राज सम्मान।
  • दाखों से: सुख सम्पति।

खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल - इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे।

व्रत का फल

इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है, उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, इनमें तनिक भी संशय नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है, उसका करोड़ों गुना मिलता है। इस नवरात्र के व्रत करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मन्दिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें।

ब्रह्मा जी बोले कि बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अन्तर्ध्यान हो गईं। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्ति पूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है।

हे बृहस्पते! यह दुर्लभ व्रत का महात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है। ऐसा ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आनन्द के कारण रोमांचित हो गए और ब्रह्मा जी से कहने लगे कि हे ब्रह्मा जी! आपने मुझ पर अति कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का महात्म्य सुनाया। हे प्रभो! आपके बिना और कौन इस महात्म्य को सुना सकता है?

ऐसे बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियों का हित करने वालों इस अलौकिक व्रत को पूछा है। इसलिए तुम धन्य हो। यह भगवति शक्ति सम्पूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है।

दुर्गा (सप्तशती) हवन विधान

हवन विधि

नवरात्रि में अष्टमी की रात्रि को दुर्गा सप्तशती द्वारा हवन किया जाता है। सरल ग्रह सत्यानुसार गणेश स्मरण संकल्प, गणपति मातृका नवग्रह, रूद्र, कलश-पूजन विधि पूर्वक भगवती की पूजा करके ब्रह्म पूजन ब्राह्मण वरुणादि करावें। पीछे आचार्य, कवचार्गला, कीलक तथा रात्रि सूक्त का पाठ करें। कुशकाण्डिका करें और "प्रजापतये स्वाहा" से लेकर वरुण गणपति तथा नवग्रह की आहुतियां 13 अध्याय तक देवें।

ध्यान दें

किसी भी पुस्तक में हवन विधि नहीं लिखी होने से साधारण पण्डित यथा विधि हवन नहीं कर पाते हैं। अतः यह विधि बहुत महत्वपूर्ण है।

1. प्रथम अध्याय के अन्त में

इति शब्दो हरेल्लक्ष्मी वधा कुलविनाशकः ।
अध्यायौ हरेत् प्राणान मार्कण्डेय्यादिकं वदेत् ||

नोट: अध्याय के अन्त में 'इति' बोलने से लक्ष्मी का नाश, 'वध' बोलने से कुल का नाश, 'अध्याय' बोलने से प्राणों का नाश होता है। इसलिए 'ॐ' चमनो में जल लेकर इस प्रकार खोलकर जल छोड़ दें:

ओउम् जय मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमहात्म्ये सत्याः सन्तु मम ( यजमानस्य वा ) कामाः श्री।

2. प्रथमो ध्यायान्ते

एक उल्टे साबुत पान साकल्य में भिगोकर 1 कमल गट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, एक छोटी इलायची, शहद - ये सब चीजें शुचि में रखकर खड़े होकर बोलें।

वैदिक तान्त्रिक आहुति:

ओउम् प्राणाय स्वाहा अपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा अम्बे अम्बिके अम्बालिके नमानयतिश्चन ससस्त्यश्वकः सुभद्रिका कांपीलवासिनी ओउम् स्वाहा।

(इसे अग्नि में साकल्य छोड़ें)

तान्त्रिक मन्त्र:

ओउम् सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै ऐ बीजाधिष्ठायै महाकालिकायै नमः आहुतिं समर्पयामि स्वाहा।

बाद में निम्न मन्त्र से पांच बार घी छोड़ें:

ओम् घृत घ्रुतापावनः पिवतवसा वसापावनाः पिवतानरिक्षस्य हविरसिंह स्वाहा। दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिशो दिगभ्याः स्वाहा।

3. द्वितीय ध्यायान्ते

सामान तथा प्रथम अध्यायक्त वैदिक आहुति पूर्ववत्।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

ह्रीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै श्री महालक्ष्म्यै अष्टविंशतिवर्णित्मिकायै लक्ष्मीबीजाधिष्ठायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

4. तृतीयो ध्यायान्ते

"गर्ज गर्ज क्षण मूढ" (मन्त्र 38) में शहद की आहुति दें। अध्यायन्त में सामग्री ही श्रुचि में रख कर नीचे के मन्त्रों से आहुति दें, वैदिक मन्त्र पूर्ववत् हैं।

तान्त्रिक मन्त्र:

ओउम् जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै लक्ष्मीबीजाधिष्ठायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

5. चतुर्थो ध्यायान्ते

मन्त्र 24 "शलेन पाहिनी देवि" से मन्त्र 27 तक की आहुति नहीं देनी चाहिए। अतः मन्त्र बोलकर आध मिनट ठहर कर ओउम् नमश्चण्डिकायै स्वाहा से आहुति देनी चाहिए। अन्त में प्रथम अध्याय सामग्री विशेष पायस व मिश्री से आहुति देनी चाहिए।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

ह्रीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै श्री महालक्ष्म्यै अष्टविंशतिवर्णित्मिकायै लक्ष्मीबीजाधिष्ठायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: ओउम् प्राणाय स्वाहा इत्यादि पूर्वत् यानी प्रथम अध्याय के मन्त्र बोलकर आहुति दें और घी की पांच आहुति दें।

6. पंचमो ध्यायान्ते

आहुति सामग्री: 1 पान, 1 साकल्य, 1 कमल गट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 1 इलायची, गूगल, कपूर, पुष्प तथा ऋतुफल।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै धूम्रक्ष्यै विष्णामायादि चतुर्विद्ववताम्भो नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: ओउम् प्राणाय स्वाहा इत्यादि पूर्ववत् यानी प्रथम अध्याय के मन्त्र बोलकर आहुति दें और घी की पांच आहुति दें।

7. षष्ठो ध्यायान्ते

सामग्री: पूर्ववत्। विशेष: भोजपत्र।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

ओउम् जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै रक्ताक्ष्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: पूर्ववत्।

8. सप्तमो ध्यायान्ते

सामग्री: पूर्ववत्। विशेष: दो जायफल।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

ओउम् जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा। कालीचामुंडा देव्यै कर्पूरबीजाधिष्ठायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: पूर्ववत्।

9. अष्टमो ध्यायान्ते

सामग्री: पूर्ववत्। विशेष: लाल चन्दन।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

ओउम् जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै रक्ताक्ष्यै अष्टमातृकासहितायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: पूर्ववत्।

10. नवमो ध्यायान्ते

सामग्री: पूर्ववत्। विशेष: 1 बिल्वफल व मैनफल।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै भैरवायै तारादेव्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।।

वैदिक मन्त्र: पूर्ववत्।

11. दशमो ध्यायान्ते

सामग्री: पूर्ववत्। विशेष: बिल्वफल व मैनफल। तान्त्रिक तथा वेदमन्त्र आहुति के लिए नवम अध्याय के समान ही है।

12. एकादशो ध्यायान्ते

यहां खीर का हवन होता है।

  • "रोगान शेषानपहसि" – मन्त्र 29 से गिलोय की आहुति दे दें।
  • "सर्वाबाधाप्रशमनम्" – मन्त्र 39 से सफ़ेद सरसों या काली मिर्च की आहुति दें।
  • "भक्ष्यान्त्याश्च" – मन्त्र 44 से अनार की कली की आहुति दें।
  • "ततो मां देवता" – मन्त्र 44 अनार की कली की आहुति दें।
  • "शाकाम्भरीति" – मन्त्र 49 से बथुआ या पालक शाक की आहुति दें।

अध्याय के अन्त में समान पूर्ववत्। विशेष: पायस (खीर) पुष्प।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै लक्ष्मीबीजाधिष्ठायै गरुड़वाहिनी नारायणी देव्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: पूर्ववत्।

13. द्वादशो ध्यायान्ते

"बलिप्रदाने पूज्या" मन्त्र 10 से कूष्मांड की अथवा नारियल को बांध कर उसकी बलि रखें। अध्यायान्त में समान वहीं पूर्ववत विशेष: ऋतुफल केला।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै वर प्रदायै वैष्णवीदेव्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र: वही प्रथम अध्याय के अन्त वाले।

14. त्रयोदशो ध्यायान्ते

समान प्रथम अध्यायावत् विशेष: एक फल व फूल।

तान्त्रिक आहुति मन्त्र:

क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै श्री विद्यायै नमः अहमाहुतिं समर्पयामि स्वाहा।

वैदिक मन्त्र:

ओउम् प्राणाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, अम्बे अम्बिके अम्बालिके नमानयति कश्चन समस्त्यश्वकः सुभद्रिका कापीलवासिनी ओउम् स्वाहा।
ओउम् घृतापावन पिवतवसा वसोपावनः पिवतान्तरिक्षस्य हविरसिंह स्वाहा। दिशः प्रदिशः ऽआदिशोविदिशऽउदिशो दिगभ्यः स्वाहा।

समापन विधि: पश्चात् श्री सूक्तहवन, स्विष्टकृत होम दिक्पाल, भैरव पूजा बलिदान कराने के पश्चात् ज्वारों की पूजा करके छेदन ले आवें। पीछे पूर्णाहुति करके यज्ञ विभूति ले और देवी जी के सामने आरती करें। पुष्पांजलि से पुष्प अक्षत ज्वारे भी देवें। बाद में यजमान का अभिषेक, तिलक, रक्षा आदि करायें सुवासणौ, आरती आदि सारा कार्य करा देवें तथा बटुक और कन्याओं के तिलकादि करके उन्हें भोजन करा दें।

|| इति श्री दुर्गा ( सप्तशती ) हवन विधानम् ||

आरती और चालीसा

अथ दुर्गा चालीसा

दोहा:
जय जय दुर्गा भय हारिणी, शिवा सुमंगल रूप।
जय अम्बे चण्डिका, महिला अमित अनूप॥

चौपाई:
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि लिलाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटी विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुखपावे॥

तुम संसार शक्ति लय लीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़ कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रहलाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी धूमावती माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। क्षिन भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगूर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै। ताको देख काल डर भाजै॥

सोहे अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं बिराजत। तिहूं लोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्त बीज शंखन संहारे॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमर पुरी औरों सब लोका। तब महिमा सब रहे अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥

प्रेम भक्ति से जो जस गावे। दुःख दरिद्र निकट नहीं आवे॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म मरण ताको छुटि जाई॥

जोगी सुर-मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारण तप कीनो। काम और क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहू काल नहि सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मर्म न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्बा भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहीं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब बिनशावें॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि दे करहु निहाला॥

जब लगि जियौं दयाफल पाऊं। तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊं॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परम पद पावै॥

देवी दास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्बा भवानी॥

अम्बे जी की आरती

जय अम्बे मैया जय मंगल मूर्ति, मैया जय आनन्द करणी।
तुमको निश दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे...॥

मांग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को।
उज्जवल से दोउ नैना, चंद्र बदन नीको॥ जय अम्बे...॥

कनक समान कलेश्वर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गलमाला, कंठन पर छाजै॥ जय अम्बे...॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर नर मुनिजन सेवक, तिनके दुःखहारी॥ जय अम्बे...॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥ जय अम्बे...॥

शुम्भ निशुम्भ बिडारे, महिषासुर धाती।
धूम्र विलोचन नयना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे...॥

चौबीस योगिनी मंगल गावे, नृत्य करत भैंरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे...॥

भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नार॥ जय अम्बे...॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे...॥

यह अम्बे की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥ जय अम्बे...॥

दुर्गा जी की आरती

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,
तेरे ही गुन गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती...

तेरे भक्त जनों पर माता! भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पड़ो, मां करके सिंह सवारी।
सौ-सौ सिंहों से है बलशाली, दस भुजाओं वाली,
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया...

मां बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता,
पूत कपूत सुने हैं, पर ना माता सुनी कुमाता।
सब पे करुणा बरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली,
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया...

नहीं मांगते धन और दौलत न चांदी न सोना,
हम तो मांगें मां तेरे मन में एक छोटा सा कोना।
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,
सतियों के सत को संवारती, ओ मैया...

आरती श्री शिवजी की

जय शिव ओंकारा, ॐ शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव...॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजै।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजै॥ ॐ जय शिव...॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज ते सोहै।
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहै॥ ॐ जय शिव...॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव...॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव...॥

करके मध्य श्रेष्ठ कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
सुखकर्ता दुःखहर्ता जग पालनकर्ता॥ ॐ जय शिव...॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव...॥

त्रिगुण शिव की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव...॥

ॐ जय जगदीश हरे

ओउम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय...॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालन कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं गोसाईं तुमको मैं कुमती॥ ॐ जय...॥

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥

॥ जय माता दी ॥

।। ॐ नमः शिवाय ।।