वृहस्पतिवार व्रत कथा एवं पूजा विधि
गुरुवार का व्रत - सर्वश्रेष्ठ और अति फलदायक
वृहस्पतिवार व्रत का महत्व
वृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा का विशेष महत्व है। यह व्रत सर्वश्रेष्ठ और अति फलदायक माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत रखने से:
- धन, पुत्र और विद्या की प्राप्ति होती है
- मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है
- परिवार में सुख और शांति का वास होता है
- सभी संकटों का निवारण होता है
बृहस्पति देव ज्ञान और सौभाग्य के देवता हैं। जो कोई भी सच्चे मन से इस व्रत को करता है, बृहस्पति देव उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
पूजा सामग्री
- पीले वस्त्र (पूजा और धारण के लिए)
- चने की दाल और गुड़/मुनक्का
- केला (पूजन और प्रसाद हेतु)
- पीले फल (आम, केला आदि)
- पीला चंदन
- फूल, अगरबत्ती, दीपक
- विष्णु भगवान की प्रतिमा/तस्वीर
पूजा विधि
- दिन में एक बार ही भोजन करें
- प्रातःकाल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें
- केले की जड़ या केले के पेड़ की पूजा करें
- पीले चंदन से विष्णु भगवान का पूजन करें
- चने की दाल और गुड़ का भोग लगाएं
- पीला भोजन (चने की दाल से बना) ग्रहण करें
- भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करें
- कथा प्रेमपूर्वक सुनें या पढ़ें
- मन, क्रम, वचन से शुद्ध होकर बृहस्पति देव से प्रार्थना करें
श्री वृहस्पतिवार की प्रथम कथा
राजा और साधु (भगवान का प्रथम दर्शन)
एक समय की बात है कि भारतवर्ष में एक नृपति राज्य करता था। वह बड़ा ही प्रतापी और दानी था। वह नित्यप्रति दिन मंदिर में दर्शन करने जाता था और ब्राह्मण तथा गुरु की सेवा किया करता था। उसके दरवाजे से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता था। वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था तथा हर दिन गरीबों की सहायता करता था।
परन्तु यह सब बातें उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थीं। वह न व्रत करती और न किसी को एक दमड़ी तक दान में देती थी तथा राजा से भी ऐसा करने को मना किया करती थी।
साधु का आगमन: त एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे। घर पर रानी और दासी थीं। उस समय गुरु वृहस्पतिदेव एक साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने गए। रानी कहने लगी— "हे साधू महाराज! मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। अब आप इस प्रकार की कृपा करें कि वह सब धन नष्ट हो जावे तथा मैं आराम से रह सकूं।"
साधू ने समझाया कि धन से भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, निर्धन कन्याओं का विवाह कराओ। परंतु रानी नहीं मानी।
साधू का वचन: तब साधू ने कहा— "हे देवी! तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो ऐसा ही होगा। वृहस्पतिवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से कहना वह हजामत करवाए, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना। इस प्रकार सात वृहस्पतिवार करने से तुम्हारा सब धन नष्ट हो जावेगा।"
ऐसा कहकर वह साधू वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए। रानी ने साधू के कहने के अनुसार वैसा ही किया। तीन वृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसका समस्त धन नष्ट हो गया और दोनों को भोजन के लिए तरसने लगे।
दासी की भूख और चमत्कार
राजा परदेश चला गया। रानी और दासी दुःखी रहने लगीं। किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन जल पी कर ही रह जातीं।
बहन के पास: एक बार सात रोज बिना भोजन के व्यतीत हो गये तो रानी ने दासी से कहा कि मेरी बहन के पास जा और पांच सेर बेझर मांग ला। दासी बहन के पास गई परंतु वह उस समय वृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन रही थी। जब तक कथा होती है तब तक न उठते हैं और न बोलते हैं, इसलिये वह न बोली।
दासी क्रोधित होकर लौट आई और रानी से बोली कि आपकी बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
चमत्कार: बाद में रानी की बहन अपनी बहन के घर आई और बोली— "हे बहन! मैं वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी इसलिए नहीं बोली। देखो! वृहस्पति भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो।"
जब रानी घर के अंदर गई तो उसे एक घड़ा बेझर का भरा मिल गया! तब रानी और दासी ने निश्चय किया कि वृहस्पति भगवान का पूजन जरूर करेंगे।
व्रत का आरंभ: सात रोज बाद जब वृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना गुड़ बीन लाईं तथा उसकी दाल से केले की जड़ का तथा विष्णु भगवान का पूजन किया।
भोजन पीला कहां से आवे? परंतु गुरु भगवान प्रसन्न थे! दो थालों में सुंदर पीला भोजन लेकर आये और दासी को देकर बोले— "यह तुम्हारे और रानी के लिए भोजन है।"
अब वह प्रत्येक वृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत करने लगीं। वृहस्पति भगवान की कृपा से फिर रानी और दासी के पास धन हो गया!
राजा की वापसी और पुत्र प्राप्ति
दासी ने रानी को समझाया कि अब दान पुण्य करो, भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, कुआं-तालाब बनवाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ। रानी ने वैसा ही किया तो काफी यश फैलने लगा।
राजा का स्वप्न: एक दिन उधर परदेश में भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा— "हे त्रक! उठ, तेरी रानी तुझको याद करती है। अपने देश को चला जा।"
राजा अपने नगर लौट आया। राजा को आश्चर्य हुआ कि उसके नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, मंदिर और धर्मशालाएं बनी हुई थीं!
रानी ने बताया कि यह सब धन वृहस्पति देव के व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। राजा ने निश्चय किया कि वह रोजाना दिन में तीन बार कहानी कहा करूंगा।
पुत्र प्राप्ति: उसी रात को वृहस्पति देव ने राजा को स्वप्न में कहा— "हे राजा! सभी सोच को त्याग दे। तेरी रानी गर्भ से है।"
नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर पुत्र पैदा हुआ! जो सद्भावना पूर्वक वृहस्पतिवार का व्रत करता है, वृहस्पति देव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
श्री वृहस्पतिवार की द्वितीय कथा
निर्धन ब्राह्मण की पुत्री
प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था। वह बहुत ही निर्धन था, उसके कोई भी संतान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी— वह स्नान न करती, किसी देवता का पूजन न करती, प्रातःकाल उठते ही पहले भोजन करती।
पुत्री का जन्म: भगवान की कृपा से ब्राह्मण की स्त्री के कन्या रूपी रत्न पैदा हुई। वह कन्या प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप करने लगी तथा वृहस्पतिवार का व्रत करने लगी।
सोने के जौ का चमत्कार: स्कूल जाते समय वह अपनी मुट्ठी में जौ भरके ले जाती और मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के हो जाते! लौटते समय उनको बीनकर घर ले आती थी।
एक दिन उसकी मां ने देख लिया और कहा— "हे बेटी! सोने के जौओं को फटकने के लिये सोने का सूप होना चाहिए।"
सोने का सूप: दूसरे दिन गुरुवार था। कन्या ने व्रत रखा और वृहस्पति देव से प्रार्थना की— "हे प्रभो! यदि मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो।"
बृहस्पति देव की कृपा से सोने का सूप मिला! उसे वह घर ले आई।
राजकुमार से विवाह
एक दिन उस नगर का राजकुमार वहां से निकला। इस कन्या के रूप और सोने के सूप में जौ साफ करते देखकर मोहित हो गया। घर आकर भोजन त्याग कर लेट गया।
राजा ने पूछा तो राजकुमार बोला— "मुझे उस लड़की के साथ विवाह करना है जो सोने के सूप में जौ को साफ कर रही थी।"
राजा ने तुरंत मंत्री भेजकर ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ करवा दिया।
पुनः गरीबी: कन्या के घर से जाते ही फिर ब्राह्मण के घर में गरीबी आ गई। एक दिन दुखी होकर ब्राह्मण अपनी पुत्री के पास गया। बेटी ने बहुत सा धन देकर विदा किया।
माता को सुधारना: पुत्री ने अपनी माँ को बुलाया और कहा— "हे मां! तुम प्रातःकाल उठकर स्नान करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जावेगी।"
परन्तु माँ ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल बच्चों का झूठन खा लिया।
कोठरी में बंद: एक दिन पुत्री को बहुत गुस्सा आया। उसने रात को कोठरी में माँ को बंद कर दिया। प्रातःकाल निकाल कर स्नानादि कराके पूजा पाठ करवाया तो उसकी माँ की बुद्धि ठीक हो गई!
फिर वह प्रत्येक वृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी। इस व्रत के प्रभाव से उसकी माँ भी बहुत धनवान तथा पुत्रवती हो गई और वृहस्पति जी के प्रभाव से स्वर्ग को प्राप्त हुई।
बृहस्पति देव आरती और चालीसा
(व्रत के अंत में आरती अवश्य करें)