अन्नपूर्णा माता व्रत कथा
सुख, समृद्धि और अन्न-धन प्रदाता व्रत
व्रत का समय और महत्व
माँ अन्नपूर्णा माता का महाव्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास में किया जाता है। मुख्य रूप से यह व्रत मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी तक (कुल 21 दिन) चलता है। कुछ भक्त इसे 17 दिनों के लिए भी रखते हैं।
यह व्रत विशेष फलदायी माना गया है। जो भक्त सच्ची श्रद्धा से माँ अन्नपूर्णा की आराधना करते हैं, उनके घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं रहती।
अन्नपूर्णा व्रत और पूजन विधि
"ॐ ह्रीं अन्नपूर्णीय नमः"
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व्रत संकल्प: यह व्रत 21 दिनों तक किया जाता है। यदि 21 दिन का व्रत संभव न हो, तो कम से कम एक दिन निर्जला उपवास अवश्य करें।
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सूत्र बंधन: व्रत के लिए 21 गांठों वाला सूत (धागा) लेना चाहिए। इस सूत्र को धारण कर नियमपूर्वक व्रत का पालन करें।
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कथा श्रवण: प्रतिदिन माँ अन्नपूर्णा की कथा सुनें और प्रसाद ग्रहण करें। यदि कथा सुनाने वाला कोई न मिले, तो पीपल के वृक्ष, तुलसी, सूर्यदेव या गाय को साक्षी मानकर कथा कहें। बिना कथा सुनाए मुख में अन्न का दाना न डालें।
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नियम और संयम:
- व्रत के दौरान नमक (Salt) का त्याग करें। यदि संभव हो तो बिना नमक का भोजन (अलौना) ग्रहण करें।
- क्रोध न करें और झूठ बोलने से बचें।
- सात्विक जीवन व्यतीत करें।
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भूल सुधार: यदि भूलवश व्रत में कोई त्रुटि हो जाए या कुछ खा लिया जाए, तो प्रायश्चित स्वरूप एक दिन का अतिरिक्त उपवास करें।
श्री अन्नपूर्णा माता की कथा
धनंजय और सुलक्षणा की पावन कथा
अन्नपूर्णा माता व्रत कथा
एक समय की बात है, काशी निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था। उसे जीवन में अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल निर्धनता ही उसके दुःख का एक मात्र कारण थी। यह दुःख उसे हर समय सताता रहता था।
एक दिन सुलक्षणा अपने पति से बोली— "स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले। इस प्रकार कब तक काम चलेगा?"
सुलक्षणा की बात धनंजय के मन में बैठ गई। वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा— "हे देवाधिदेव विश्वेश्वर! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल आपके भरोसे बैठा हूँ।"
इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा। यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में कहा— "अन्नपूर्णा! अन्नपूर्णा! अन्नपूर्णा!"
इस प्रकार तीन बार यह ध्वनि सुनाई दी। धनंजय सोच में पड़ गया कि यह कौन है और क्या कह गया? मन्दिर से आते ब्राह्मणों को देखकर वह पूछने लगा— "पंडितजी! अन्नपूर्णा कौन है?"
ब्राह्मणों ने कहा— "तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है। जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर।"
धनंजय घर गया और स्त्री से सारी बात कही। वह बोली— "नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है। वे स्वयं ही खुलासा करेंगे। आप फिर जाकर उनकी आराधना करो।"
धनंजय फिर पूजा में बैठ गया। रात्रि में शंकर जी ने स्वप्न में आज्ञा दी और कहा— "तू पूर्व दिशा में चला जा।"
अगले दिन वह 'अन्नपूर्णा' नाम जपता हुआ पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा। रास्ते में फल खाता और झरनों का पानी पीता। इस प्रकार वह कई दिनों तक चलता गया। अंत में उसे चाँदी सी चमकती वन की शोभा दिखाई दी। वहां एक सुन्दर सरोवर था, जिसके किनारे अप्सराएं झुण्ड बनाए बैठी थीं। वे एक कथा सुन रही थीं और बीच-बीच में "माँ अन्नपूर्णा" का जयकारा लगा रही थीं।
यह अगहन (मार्गशीर्ष) मास की उजेली रात्रि थी और आज से ही व्रत का आरम्भ था। जिस शब्द की खोज में धनंजय निकला था, वह उसे वहां सुनने को मिला। धनंजय ने उनके पास जाकर पूछा— "हे देवियो! आप यह क्या करती हो?"
उन सबने कहा— "हम सब माँ अन्नपूर्णा का व्रत करती हैं।"
धनंजय ने पूछा— "इस व्रत के करने से क्या फल मिलता है? और इसकी विधि क्या है?"
वे कहने लगीं— "इस व्रत के करने से अन्धों को नेत्र मिलते हैं, लूलों को हाथ मिलते हैं, निर्धन के घर धन आता है, बांझी को संतान मिलती है। जो जिस कामना से व्रत करता है, माँ उसकी इच्छा पूरी करती हैं।"
नियम और विधि सुनकर धनंजय ने कहा— "बहिनों! मैं तो दुखिया ब्राह्मण हूँ। मेरे पास न धन है, न विद्या। क्या आप मुझे इस व्रत का सूत देंगी?"
उन्होंने कहा— "हाँ भाई! तेरा कल्याण हो। हम तुम्हें अवश्य देंगी।" उन्होंने उसे 21 गांठ वाला मंगलसूत्र दिया।
धनंजय ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया। जब व्रत पूरा हुआ, तभी सरोवर में से 21 खण्ड की सुवर्ण सीढ़ी (हीरा-मोती जड़ी हुई) प्रकट हुई। धनंजय "जय अन्नपूर्णा! जय अन्नपूर्णा!" कहता हुआ सीढ़ियों से उतर गया।
वहां उसने देखा कि करोड़ों सूर्य से प्रकाशमान माँ अन्नपूर्णा का मन्दिर है। सुवर्ण सिंहासन पर माता अन्नपूर्णा विराजमान हैं। सामने भिक्षा हेतु स्वयं भगवान शंकर खड़े हैं। धनंजय दौड़कर जगदम्बा के चरणों में गिर गया। देवी उसके मन का क्लेश जान गईं।
माता बोलीं— "धनंजय! तूने मेरा व्रत किया है। जा, संसार तेरा सत्कार करेगा।"
माता ने धनंजय की जिह्वा पर बीज मंत्र लिख दिया। अब तो उसके रोम-रोम में विद्या प्रकट हो गई। उसने आँखें खोलीं तो पाया कि वह काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा है।
सुख-समृद्धि और परीक्षा
माँ का वरदान लेकर धनंजय घर आया। सुलक्षणा से सारी बात कही। माता जी की कृपा से उसके घर में सम्पत्ति उमड़ने लगी। छोटा सा घर बहुत बड़ा भवन बन गया। सगे-सम्बन्धी जो पहले बात नहीं करते थे, अब आकर उसकी बड़ाई करने लगे।
लोगों ने कहा— "इतना धन और इतना बड़ा घर है, पर संतान नहीं है। सुलक्षणा से संतान नहीं है, इसलिए तुम दूसरा विवाह करो।"
अनिच्छा होते हुए भी पाश में बंधकर धनंजय को दूसरा विवाह करना पड़ा। सती सुलक्षणा को सौत का दुःख उठाना पड़ा। किंतु वह धर्मपरायण थी, उसने अपना व्रत नहीं छोड़ा।
अगले वर्ष जब अगहन मास आया, तो सुलक्षणा ने पति से कहलाया— "हम व्रत के प्रभाव से ही सुखी हुए हैं। यह माता जी का प्रताप है। हमें यह व्रत नहीं छोड़ना चाहिए।" धनंजय सुलक्षणा के पास आया और दोनों साथ में व्रत पर बैठे।
नयी बहू को इस व्रत की खबर नहीं थी। वह धनंजय का इंतजार कर रही थी। व्रत पूर्ण होने में तीन दिवस बाकी थे कि नयी बहू को पता चला। ईर्ष्या के कारण वह सुलक्षणा के घर आ पहुँची और हंगामा कर दिया। वह धनंजय को जबरदस्ती अपने साथ ले गई।
नये घर में धनंजय को नींद आ गई। इसी समय नयी बहू ने उसके हाथ से व्रत का सूत तोड़कर आग में फेंक दिया।
सूत के जलते ही माता जी का कोप जाग गया। घर में अकस्मात आग लग गई, सब कुछ जलकर खाक हो गया। सुलक्षणा सब समझ गई और पति को फिर अपने घर ले आई। नयी बहू रूठकर अपने पिता के घर चली गई।
पति को परमेश्वर मानने वाली सुलक्षणा बोली— "नाथ! घबराइए नहीं। माता जी की खता पर माता कुमाता नहीं होतीं। आप पुनः श्रद्धा से आराधना शुरू करें। वे जरूर हमारा कल्याण करेंगी।"
धनंजय ने फिर कठोर तप और व्रत किया। माँ अन्नपूर्णा फिर प्रसन्न हुईं और बोलीं— "यह मेरी स्वर्ण मूर्ति ले, इसकी पूजा करना। तेरी पत्नी सुलक्षणा ने श्रद्धा से मेरा व्रत किया है, इसलिए उसे मैंने पुत्र रत्न दिया है।"
धनंजय ने आँखें खोलीं तो पुन: काशी विश्वनाथ के मन्दिर में था। घर लौटकर देखा तो सुलक्षणा गर्भवती थी और समय आने पर उसे तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ।
व्रत का फल एवं समापन
धनंजय ने माता अन्नपूर्णा का विशाल मन्दिर बनवाया। उसमें माता जी की मूर्ति धूमधाम से स्थापित की। यज्ञ किया और स्वयं मन्दिर का आचार्य बन गया।
उधर, नयी बहू के पिता के घर डाका पड़ा और सब लुट गया। वे भीख मांगकर जीवन यापन करने लगे। जब सुलक्षणा ने सुना तो उन्हें बुला भेजा, अलग घर दिया और उनके अन्न-वस्त्र का प्रबंध कर दिया।
फलश्रुति: धनंजय, सुलक्षणा और उनका पुत्र माता जी की कृपा से आनन्द से रहने लगे। हे माँ अन्नपूर्णा! जैसे आपने इनके भण्डार भरे, वैसे ही कथा कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले—सबके भण्डार भरना।
॥ इति श्री अन्नपूर्णा माता व्रत कथा सम्पूर्णम् ॥
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
अन्नपूर्णा माता का व्रत कब शुरू होता है और कब तक चलता है?
अन्नपूर्णा माता कौन हैं?
इस व्रत में '21 गांठों' वाले धागे का क्या महत्व है?
अन्नपूर्णा व्रत में भोजन के क्या नियम हैं?
अन्नपूर्णा माता की व्रत कथा का सार क्या है?
यदि कोई 21 दिनों का व्रत न कर सके, तो क्या विकल्प है?
अन्नपूर्णा व्रत का उद्यापन (समापन) कैसे किया जाता है?
अन्नपूर्णा व्रत करने का क्या फल मिलता है?
पूजा के दौरान अक्षत (चावल) का प्रयोग कैसे करें?
माँ अन्नपूर्णा की आरती और चालीसा
(पाठ के बाद आरती अवश्य करें)