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Sri Vishnu Bhujanga Prayata Stotram – श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्

Sri Vishnu Bhujanga Prayata Stotram – श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्
॥ श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् ॥ चिदंशं विभुं निर्मलं निर्विकल्पं निरीहं निराकारमोङ्कारगम्यम् । गुणातीतमव्यक्तमेकं तुरीयं परं ब्रह्म यं वेद तस्मै नमस्ते ॥ १ ॥ विशुद्धं शिवं शान्तमाद्यन्तशून्यं जगज्जीवनं ज्योतिरानन्दरूपम् । अदिग्देशकालव्यवच्छेदनीयं त्रयी वक्ति यं वेद तस्मै नमस्ते ॥ २ ॥ महायोगपीठे परिभ्राजमाने धरण्यादितत्त्वात्मके शक्तियुक्ते । गुणाहस्करे वह्निबिम्बार्धमध्ये समासीनमोङ्कर्णिकेऽष्टाक्षराब्जे ॥ ३ ॥ समानोदितानेकसूर्येन्दुकोटि- -प्रभापूरतुल्यद्युतिं दुर्निरीक्षम् । न शीतं न चोष्णं सुवर्णावदात- -प्रसन्नं सदानन्दसंवित्स्वरूपम् ॥ ४ ॥ सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं किरीटोचिताकुञ्चितस्निग्धकेशम् । स्फुरत्पुण्डरीकाभिरामायताक्षं समुत्फुल्लरत्नप्रसूनावतंसम् ॥ ५ ॥ लसत्कुण्डलामृष्टगण्डस्थलान्तं जपारागचोराधरं चारुहासम् । अलिव्याकुलामोदिमन्दारमालं महोरस्फुरत्कौस्तुभोदारहारम् ॥ ६ ॥ सुरत्नाङ्गदैरन्वितं बाहुदण्डै- -श्चतुर्भिश्चलत्कङ्कणालङ्कृताग्रैः । उदारोदरालङ्कृतं पीतवस्त्रं पदद्वन्द्वनिर्धूतपद्माभिरामम् ॥ ७ ॥ स्वभक्तेषु सन्दर्शिताकारमेवं सदा भावयन् सन्निरुद्धेन्द्रियाश्वः । दुरापं नरो याति संसारपारं परस्मै परेभ्योऽपि तस्मै नमस्ते ॥ ८ ॥ श्रिया शातकुम्भद्युस्निग्धकान्त्या धरण्या च दूर्वादलश्यामलाङ्ग्या । कलत्रद्वयेनामुना तोषिताय त्रिलोकीगृहस्थाय विष्णो नमस्ते ॥ ९ ॥ शरीरं कलत्रं सुतं बन्धुवर्गं वयस्यं धनं सद्म भृत्यं भुवं च । समस्तं परित्यज्य हा कष्टमेको गमिष्यामि दुःखेन दूरं किलाहम् ॥ १० ॥ जरेयं पिशाचीव हा जीवतो मे वसामत्ति रक्तं च मांसं बलं च । अहो देव सीदामि दीनानुकम्पिन् किमद्यापि हन्त त्वयोदासितव्यम् ॥ ११ ॥ कफव्याहतोष्णोल्बणश्वासवेग -व्यथाविस्फुरत्सर्वमर्मास्थिबन्धाम् । विचिन्त्याहमन्त्यामसङ्ख्यामवस्थां बिभेमि प्रभो किं करोमि प्रसीद ॥ १२ ॥ लपन्नच्युतानन्त गोविन्द विष्णो मुरारे हरे नाथ नारायणेति । यथानुस्मरिष्यामि भक्त्या भवन्तं तथा मे दयाशील देव प्रसीद ॥ १३ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ भुजङ्गप्रयातं पठेद्यस्तु भक्त्या समाधाय चित्ते भवन्तं मुरारे । स मोहं विहायाशु युष्मत् प्रसादात् समाश्रित्य योगं व्रजत्यच्युतं त्वाम् ॥ १४ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचित श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् और आदि शंकराचार्य की दृष्टि (Introduction)

श्री विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् (Sri Vishnu Bhujanga Prayata Stotram) जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित उन विलक्षण रचनाओं में से एक है, जो अद्वैत वेदांत के गंभीर दर्शन को भक्ति की कोमल रसधार में पिरोती है। "भुजङ्ग प्रयात" का शाब्दिक अर्थ है—सर्प की गति (Snake-like movement)। संस्कृत व्याकरण में यह एक ऐसा छंद है जिसमें चार यगण होते हैं, और जब इसे पढ़ा या गाया जाता है, तो इसकी लयबद्धता एक लहराते हुए सर्प के समान अत्यंत चित्ताकर्षक लगती है। शंकराचार्य ने इस छंद का उपयोग भगवान विष्णु की उस अनंत सत्ता का वर्णन करने के लिए किया है जो 'शेषशायी' (शेषनाग पर शयन करने वाले) हैं।

इस स्तोत्र की रचना का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को संसार के मोह-पाश और विशेषकर 'मृत्यु के भय' से मुक्त करना है। शंकराचार्य, जो स्वयं ज्ञान मार्ग के प्रणेता थे, वे इस स्तोत्र के माध्यम से सिद्ध करते हैं कि ईश्वर का निराकार सत्य ('परं ब्रह्म') और सगुण रूप ('विष्णु') वास्तव में एक ही हैं। प्रथम दो श्लोकों में वे भगवान को 'निर्विकल्प' और 'आद्यन्तशून्य' (शुरुआत और अंत से रहित) कहकर उनकी दार्शनिक व्याख्या करते हैं, जबकि बाद के श्लोकों में उनके दिव्य आभूषणों, कौस्तुभ मणि और मंदार मालाओं का वर्णन कर भक्त के हृदय में प्रेम जाग्रत करते हैं।

अकादमिक और आध्यात्मिक शोध के अनुसार, यह स्तोत्र 'अंत काल' (मृत्यु के समय) की प्रार्थना के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित है। श्लोक संख्या १० से १२ में शंकराचार्य ने वृद्धावस्था और मृत्यु के समय होने वाले शारीरिक एवं मानसिक कष्टों का अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। वे जरावस्था को एक 'पिशाचिनी' के समान बताते हैं जो बल और मांस का भक्षण करती है। ऐसी असहाय स्थिति में केवल 'अच्युत, अनंत और गोविन्द' के नामों का संकीर्तन ही साधक का एकमात्र सहारा होता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भक्ति केवल सुख का साधन नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम और सबसे कठिन संघर्ष की तैयारी है।

वैष्णव और अद्वैत दोनों ही परंपराओं में इस स्तोत्र का पाठ 'चित्त शुद्धि' (Purification of Mind) के लिए अनिवार्य माना गया है। इसकी वैज्ञानिक संरचना ऐसी है कि इसके सस्वर पाठ से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करते हैं और भय (Anxiety) को जड़ से समाप्त करते हैं। जो साधक अपनी इंद्रियों को वश में करना चाहता है, उसके लिए श्लोक ८ में 'सन्निरुद्धेन्द्रियाश्वः' (इंद्रियों रूपी घोड़ों को रोकने वाला) बनकर संसार सागर को पार करने का गुप्त मार्ग बताया गया है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य की उस अपार करुणा का प्रतीक है, जो वे कलयुग के उन जीवों के प्रति रखते थे जो सांसारिक मायाजाल में फंसे हुए हैं।

विशिष्ट दार्शनिक महत्व (Significance)

विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्र का महत्व केवल इसकी साहित्यिक सुंदरता में नहीं, बल्कि इसमें छिपे 'शरणागति योग' (Yoga of Surrender) में है। शंकराचार्य इसमें भक्त को यह बोध कराते हैं कि जिस धन, पुत्र, पत्नी और शरीर के अभिमान में वह जी रहा है, मृत्यु के समय उसे उन सबको अकेला ही छोड़कर 'दुःखेन दूरं' (दुख के साथ बहुत दूर) जाना होगा। यह वैराग्य का वह बिंदु है जहाँ से वास्तविक भक्ति प्रारंभ होती है।

इस स्तोत्र में प्रयुक्त 'अष्टाक्षराब्जे' (आठ अक्षरों वाले कमल) का संदर्भ भगवान के 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र की ओर संकेत करता है। यह दर्शाता है कि भगवान हमारे हृदय के भीतर ही एक महायोगपीठ पर विराजमान हैं। इस पाठ का विशिष्ट महत्व यह भी है कि यह ईश्वर के 'विश्व-साक्षी' (Universal Witness) स्वरूप को उजागर करता है। जब हम भगवान के 'जपारागचोराधरं' (जपा के पुष्प जैसी लाल कांति वाले होंठ) का ध्यान करते हैं, तो हमारे मन की चंचलता स्वतः ही उनके स्थिर स्वरूप में विलीन होने लगती है।

फलश्रुति: पाठ के दिव्य लाभ (Benefits from Phala Shruti)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (श्लोक १४) और परंपरा के अनुसार, इस पाठ के लाभ निम्नलिखित हैं:

  • मोह का नाश (Removal of Delusion): "स मोहं विहायाशु" — जो भक्त इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन से अज्ञान का पर्दा हट जाता है और वह सत्य को देखने में सक्षम होता है।
  • मृत्यु के भय से मुक्ति: वृद्धावस्था के रोगों (कफ, श्वास वेग) और मृत्यु के कष्टों का वर्णन होने के कारण, यह पाठ साधक को मानसिक रूप से निर्भय बनाता है।
  • योग सिद्धि की प्राप्ति: "समाश्रित्य योगं व्रजत्यच्युतं" — नियमित पाठ करने वाला व्यक्ति योग के उस मार्ग पर अग्रसर होता है जो उसे अविनाशी परमात्मा से जोड़ता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता: भुजंगप्रयात छंद की लयबद्धता विक्षिप्त मन को शांत कर एकाग्रता प्रदान करती है।
  • वैकुण्ठ सान्निध्य: इस स्तोत्र के द्वारा किया गया 'नख-शिख' ध्यान साधक को वैकुंठ धाम और विष्णु-सायुज्य की प्राप्ति कराता है।

पाठ विधि एवं सर्वोत्तम अभ्यास (Ritual Method)

विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् का पाठ भाव और लय के साथ करने पर शीघ्र फल प्राप्त होता है:

  • समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा रात में सोने से पहले पाठ करने से बुरे स्वप्न और भय का नाश होता है।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत पीले या श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के चित्र या शालिग्राम जी के सम्मुख बैठें।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: घी का दीपक जलाएं और भगवान को तुलसी दल अर्पित करें। पाठ के अंत में १३वें श्लोक का कम से कम ३ बार दोहराव करें।
  • एकाग्रता: पाठ करते समय जैसे-जैसे अंगों का वर्णन आए, अपने हृदय के भीतर भगवान के उसी स्वरूप का मानसिक चित्रण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. विष्णु भुजङ्ग प्रयात स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य स्तोत्र के रचयिता अद्वैत वेदांत के महान आचार्य जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं।

2. 'भुजङ्ग प्रयात' शब्द का क्या अर्थ है?

यह एक विशिष्ट काव्य छंद है। 'भुजङ्ग' यानी सर्प और 'प्रयात' यानी उसकी चाल। इस छंद की लय चलते हुए सर्प के समान सुंदर और गतिशील होती है।

3. क्या यह स्तोत्र मृत्यु के समय मदद करता है?

जी हाँ, शंकराचार्य ने इसमें बुढ़ापे और मृत्यु के कष्टों का वर्णन कर भगवान से रक्षा की पुकार की है। इसे पढ़ने से मृत्यु का अज्ञात भय समाप्त होता है।

4. इस पाठ से मानसिक शांति कैसे मिलती है?

इस स्तोत्र की संगीतमय लय और भगवान के शांत स्वरूप का ध्यान करने से तनाव (Stress) कम होता है और अवचेतन मन को सुरक्षा का अनुभव होता है।

5. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ा जा सकता है?

हाँ, यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो आप इसका हिंदी अर्थ पढ़ सकते हैं या श्रद्धापूर्वक इसे सुन सकते हैं। भगवान भाव के भूखे हैं।

6. स्तोत्र में 'कलत्रद्वयेन' का क्या तात्पर्य है?

श्लोक ९ में 'कलत्रद्वयेन' का अर्थ है भगवान की दो पत्नियाँ—श्री (लक्ष्मी, जो स्वर्ण आभा वाली हैं) और धरणी (पृथ्वी, जो दूर्वा दल के समान श्यामल हैं)।

7. क्या एकादशी पर इसका विशेष फल मिलता है?

हाँ, एकादशी भगवान विष्णु की तिथि है। इस दिन सस्वर पाठ करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल और पितरों की सद्गति प्राप्त होती है।

8. 'अच्युतानन्त गोविन्द' मंत्र का इसमें क्या महत्व है?

श्लोक १३ में इन नामों का संकीर्तन किया गया है। मान्यता है कि मृत्यु के समय इन नामों का स्मरण करने वाला पुनः इस संसार के दुखों में नहीं लौटता।

9. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवत भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन से इसका पाठ कर सकता है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान विष्णु की साधना में 'पीताम्बर' (पीला वस्त्र) धारण करना सात्विकता और आरोग्यता का प्रतीक माना गया है।