वीरभद्रकृतं नृसिंहस्तोत्रम्

वीरभद्र उवाच
जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव । स्थित्यर्थं त्वं प्रयुक्तोऽसि परेशः परमेष्ठिना ॥ १७॥ जन्तुचक्रं भगवता प्रच्छिन्नं मत्स्यरूपिणा । पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा ॥ १८॥ बिभर्षि कर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही । अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १९॥ वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः । त्वमेव सर्वभूतानां प्रभवः प्रभुरव्ययः ॥ २०॥ यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित्प्रजायते । तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम् ॥ २१॥ नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायणः । त्वया वेदाश्च धर्माश्च शुभमार्गे प्रतिष्ठिताः ॥ २२॥ यदर्थमवतारोऽयं निहतः स हि दानवः । हिरण्यकशिपुश्चैव प्रह्लादोऽपि सुरक्षितः ॥ २३॥ अतीव घोरं भगवन्नरसिंहवपुस्तव । उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ ॥ २४॥ ॥ इति शिवपुराणे शतरुद्रसंहितायां एकादशाध्यायान्तर्गतं वीरभद्रकृतं नृसिंहस्तोत्रं समाप्तम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और संदर्भ
वीरभद्रकृतं नृसिंहस्तोत्रम् का वर्णन शिवपुराण (Shiva Purana) की शतरुद्रसंहिता (अध्याय 11) में मिलता है। यह स्तोत्र हिंदू धर्म की 'हरि-हर' (Hari-Hara) एकता का एक अद्भुत उदाहरण है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध कर दिया, तब भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ और वे समस्त ब्रह्मांड को भस्म करने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपने अंशावतार वीरभद्र (Virabhadra) को भेजा। युद्ध से पहले, वीरभद्र ने भगवान नृसिंह की स्तुति की, जिसे आज हम इस स्तोत्र के रूप में जानते हैं।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)
इस स्तोत्र में वीरभद्र ने भगवान विष्णु के दशावतारों और उनकी शिव भक्ति का वर्णन किया है:
- अवतारों का स्मरण: वीरभद्र कहते हैं—"जन्तुचक्रं भगवता..."। उन्होंने मत्स्य, कूर्म, वराह और वामन अवतारों का उल्लेख करते हुए कहा है कि आप समय-समय पर जगत के कल्याण के लिए अवतरित होते हैं।
- शिव परायण (Devoted to Shiva): श्लोक २२ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही गई है—"नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायणः" (हे हरि! आपसे बढ़कर शिव का कोई दूसरा भक्त नहीं है)। यह पंक्ति शैव और वैष्णव मतों के बीच के भेद को मिटाती है।
- उपसंहार (Withdrawal): अंतिम श्लोक में वीरभद्र प्रार्थना करते हैं—"उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ"। अर्थात, हे विश्वात्मा! अब आपका कार्य पूर्ण हो चुका है, कृपया अपने इस घोर रूप को समेट लें (शांत हो जाएं)।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
शिवपुराण के संदर्भ में, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- क्रोध नियंत्रण (Control over Anger): चूंकि यह स्तोत्र भगवान नृसिंह के क्रोध को शांत करने के लिए गाया गया था, इसका पाठ साधक के भीतर के अनियंत्रित क्रोध और आवेश को शांत करता है।
- समन्वय और शांति: यह स्तोत्र जीवन में विरोधों (Conflicts) को समाप्त कर शांति और समन्वय (Harmony) लाता है।
- सुरक्षा (Protection): "तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम्" - यह पंक्ति विश्वास दिलाती है कि जब भी भक्त पर दुख आएगा, भगवान अवतरित होकर उसे रोग और भय से मुक्त (निरामय) करेंगे।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- प्रदोष काल (Pradosh Kaal): भगवान शिव और नृसिंह दोनों की पूजा के लिए प्रदोष का समय (सूर्यास्त के आसपास) सर्वश्रेष्ठ है।
- नृसिंह जयंती या चतुर्दशी तिथि को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
- स्नान करके शुद्ध आसन पर बैठें। भगवान नृसिंह और शिव दोनों का मानसिक ध्यान करें और फिर इस स्तोत्र का पाठ करें।
- अंत में, "ॐ नमो नारसिंहाय" और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें।