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Vakya Vritti – वाक्यवृत्तिः (आदि शंकराचार्य कृत अद्वैत वेदान्त)

Vakya Vritti – वाक्यवृत्तिः (आदि शंकराचार्य कृत अद्वैत वेदान्त)
॥ वाक्यवृत्तिः ॥ सर्गस्थितिप्रलयहेतुमचिन्त्यशक्तिं विश्वेश्वरं विदितविश्वमनन्तमूर्तिम् । निर्मुक्तबन्धनमपारसुखाम्बुराशिं श्रीवल्लभं विमलबोधघनं नमामि ॥ १ ॥ यस्य प्रसादादहमेव विष्णु- मय्येव सर्वं परिकल्पितं च । इत्थं विजानामि सदात्मरूपं तस्याङ्घ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ २ ॥ तापत्रयार्कसन्तप्तः कश्चिदुद्विग्नमानसः । शमादिसाधनैर्युक्तः सद्गुरुं परिपृच्छति ॥ ३ ॥ अनायासेन येनास्मान्मुच्येयं भवबन्धनात् । तन्मे सङ्क्षिप्य भगवन् केवयं कृपया वद ॥ ४ ॥ गुरुरुवाच । साध्वी ते वचनव्यक्तिः प्रतिभाति वदामि ते । इदं तदिति विस्पष्टं सावधानमनाः शृणु ॥ ५ ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः । तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम् ॥ ६ ॥ शिष्य उवाच । को जीवः कः परश्चात्मा तादात्म्यं वा कथं तयोः । तत्त्वमस्यादिवाक्यं वा कथं तत्प्रतिपादयेत् ॥ ७ ॥ गुरुरुवाच । अत्र ब्रूमः समाधानं कोऽन्यो जीवस्त्वमेव हि । यस्त्वं पृच्छसि मां कोऽहं ब्रह्मैवासि न संशयः ॥ ८ ॥ शिष्य उवाच । पदार्थमेव जानामि नाद्यापि भगवन् स्फुटम् । अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थं प्रतिपद्ये कथं वद ॥ ९ ॥ गुरुरुवाच । सत्यमाह भवानत्र विज्ञानं नैव विद्यते । हेतुः पदार्थबोधो हि वाक्यार्थावगतेरिह ॥ १० ॥ अन्तःकरणतद्वृत्तिसाक्षी चैतन्यविग्रहः । आनन्दरूपः सत्यः सन् किं नात्मानं प्रपद्यसे ॥ ११ ॥ सत्यानन्दस्वरूपं धीसाक्षिणं ज्ञानविग्रहम् । चिन्तयात्मतया नित्यं त्यक्त्वा देहादिगां धियम् ॥ १२ ॥ रूपादिमान्यतः पिण्डस्ततो नात्मा घटादिवत् । वियदादिमहाभूतविकारत्वाच्च कुम्भवत् ॥ १३ ॥ अनात्मा यदि पिण्डोऽयमुक्तहेतुबलान्मतः । करामलकवत्साक्षादात्मानं प्रतिपादय ॥ १४ ॥ घटद्रष्टा घटाद्भिन्नः सर्वथा न घटो यथा । देहदृष्टा तथा देहो नाहमित्यवधारय ॥ १५ ॥ एवमिन्द्रियदृङ्नाहमिन्द्रियाणीति निश्चिनु । मनो बुद्धिस्तथा प्राणो नाहमित्यवधारय ॥ १६ ॥ सङ्घातोऽपि तथा नाहमिति दृश्यविलक्षणम् । द्रष्टारमनुमानेन निपुणं सम्प्रधारय ॥ १७ ॥ देहेन्द्रियादयो भावा हानादिव्यापृतिक्षमाः । यस्य सन्निधिमात्रेण सोऽहमित्यवधारय ॥ १८ ॥ अनापन्नविकारः सन्नयस्कान्तवदेव यः । बुद्ध्यादींश्चालयेत्प्रत्यक्सोऽहमित्यवधारय ॥ १९ ॥ अजडात्मवदाभान्ति यत्सान्निध्याज्जडा अपि । देहेन्द्रियमनःप्राणाः सोऽहमित्यवधारय ॥ २० ॥ आगमन्मे मनोऽन्यत्र साम्प्रतं च स्थिरीकृतम् । एवं यो वेद धीवृत्तिं सोऽहमित्यवधारय ॥ २१ ॥ स्वप्नजागरिते सुप्तिं भावाभावौ धियां तथा । यो वेत्त्यविक्रियः साक्षात्सोऽहमित्यवधारय ॥ २२ ॥ घटावभासको दीपो घटादन्यो यथेष्यते । देहावभासको देही तथाहं बोधविग्रहः ॥ २३ ॥ पुत्रवित्तादयो भावा यस्य शेषतया प्रियाः । द्रष्टा सर्वप्रियतमः सोऽहमित्यवधारय ॥ २४ ॥ परप्रेमास्पदतया मा न भूवमहं सदा । भूयासमिति यो द्रष्टा सोऽहमित्यवधारय ॥ २५ ॥ यः साक्षिलक्षणो बोधस्त्वम्पदार्थः स उच्यते । साक्षित्वमपि बोद्धृत्वमविकारितयात्मनः ॥ २६ ॥ देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यो विलक्षणः । प्रोज्झिताशेषषड्भावविकारस्त्वम्पदाभिधः ॥ २७ ॥ त्वमर्थमेवं निश्चित्य तदर्थं चिन्तयेत्पुनः । अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च ॥ २८ ॥ निरस्ताशेषसंसारदोषोऽस्थूलादिलक्षणः । अदृश्यत्वादिगुणकः पराकृततमोमलः ॥ २९ ॥ निरस्तातिशयानन्दः सत्यः प्रज्ञानविग्रहः । सत्तास्वलक्षणः पूर्णः परमात्मेति गीयते ॥ ३० ॥ सर्वज्ञत्वं परेशत्वं तथा सम्पूर्णशक्तिता । वेदैः समर्थ्यते यस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३१ ॥ यज्ज्ञानात्सर्वविज्ञानं श्रुतिषु प्रतिपादितम् । मृदाद्यनेकदृष्टान्तैस्तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३२ ॥ यदानन्त्यं प्रतिज्ञाय श्रुतिस्तत्सिद्धये जगौ । तत्कार्यत्वं प्रपञ्चस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३३ ॥ विजिज्ञास्यतया यच्च वेदान्तेषु मुमुक्षुभिः । समर्थ्यतेऽतियत्नेन तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३४ ॥ जीवात्मना प्रवेशश्च नियन्तृत्वं च तान्प्रति । श्रूयते यस्य वेदेषु तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३५ ॥ कर्मणां फलदातृत्वं यस्यैव श्रूयते श्रुतौ । जीवनां हेतुकर्तृत्वं तद्ब्रह्मेत्यवधारय ॥ ३६ ॥ तत्त्वम्पदार्थौ निर्णीतौ वाक्यार्थश्चिन्त्यतेऽधुना । तादात्म्यमत्र वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः ॥ ३७ ॥ संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः । अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः ॥ ३८ ॥ प्रत्यग्बोधो य आभाति सोऽद्वयानन्दलक्षणः । अद्वयानन्दरूपश्च प्रत्यग्बोधैकलक्षणः ॥ ३९ ॥ इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् । अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तेत तदैव हि ॥ ४० ॥ तदर्थस्य च पारोक्ष्यं यद्येवं किं ततः शृणु । पूर्णानन्दैकरूपेण प्रत्यग्बोधोऽवतिष्ठते ॥ ४१ ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्यं च तादात्म्यप्रतिपादने । लक्ष्यौ तत्त्वम्पदार्थौ द्वावुपादाय प्रवर्तते ॥ ४२ ॥ हित्वा द्वौ शबलौ वाच्यौ वाक्यं वाक्यार्थबोधने । यथा प्रवर्ततेऽस्माभिस्तथा व्याख्यातमादरात् ॥ ४३ ॥ आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः । अन्तःकरणसम्भिन्नबोधः स त्वम्पदाभिधः ॥ ४४ ॥ मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः । पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः ॥ ४५ ॥ प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता । विरुध्यते यतस्तस्माल्लक्षणा सम्प्रवर्तते ॥ ४६ ॥ मानान्तरविरोधे तु मुख्यार्थस्यापरिग्रहे । मुख्यार्थेनाविनाभूते प्रतीतिर्लक्षणोच्यते ॥ ४७ ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा । सोऽहमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा ॥ ४८ ॥ अहं ब्रह्मेतिवाक्यार्थबोधो यावद्दृढी भवेत् । शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् ॥ ४९ ॥ श्रुत्याचार्यप्रसादेन दृढो बोधो यदा भवेत् । निरस्ताशेषसंसारनिदानः पुरुषस्तदा ॥ ५० ॥ विशीर्णकार्यकरणो भूतसूक्ष्मैरनावृतः । विमुक्तकर्मनिगलः सद्य एव विमुच्यते ॥ ५१ ॥ प्रारब्धकर्मवेगेन जीवन्मुक्तो यदा भवेत् । किञ्चित्कालमनारब्धकर्मबन्धस्य सङ्क्षये ॥ ५२ ॥ निरस्तातिशयानन्दं वैष्णवं परमं पदम् । पुनरावृत्तिरहितं कैवल्यं प्रतिपद्यते ॥ ५३ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ वाक्यवृत्तिः सम्पूर्णम् ॥

वाक्यवृत्तिः: आत्मज्ञान और 'तत्त्वमसि' का तात्विक विवेचन (Introduction)

वाक्यवृत्तिः (Vakya Vritti) अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक परम सिद्ध और दार्शनिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ उपनिषदों के महावाक्य 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तुम ही हो) की विस्तृत और वैज्ञानिक व्याख्या करता है। सनातन धर्म में केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि 'ज्ञान मार्ग' को भी मोक्ष का अनिवार्य साधन माना गया है। वाक्यवृत्ति इसी ज्ञान मार्ग का प्रदीप है, जो साधक के अंतर्मन से 'अहं' और 'अज्ञान' के अंधकार को मिटाकर उसे साक्षात् विष्णु (परमात्मा) के स्वरूप का बोध कराता है।

ग्रंथ की शुरुआत भगवान विष्णु (श्रीवल्लभ) को नमन करते हुए होती है, जिन्हें 'विमलबोधघन' (शुद्ध ज्ञान का पुंज) कहा गया है। आदि शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि गुरु की कृपा से ही जीव यह जान पाता है कि— "अहमेव विष्णुः" (मैं ही विष्णु हूँ)। यह 'विष्णु' शब्द यहाँ उस व्यापक चेतना का प्रतीक है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में ओतप्रोत है। वाक्यवृत्ति ५३ श्लोकों के माध्यम से गुरु और शिष्य के संवाद के रूप में आगे बढ़ती है, जहाँ शिष्य 'तापत्रय' (दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों) से मुक्ति का मार्ग पूछता है।

इस ग्रंथ की अद्वितीयता इसकी 'तर्कसंगत' पद्धति में है। यह साधक को केवल विश्वास करने के लिए नहीं कहता, बल्कि उसे 'नेति-नेति' (यह नहीं, वह नहीं) की विधि से यह समझने में सहायता करता है कि शरीर, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि—ये सब नाशवान 'दृश्य' हैं, जबकि इन सबको देखने वाला 'द्रष्टा' (साक्षी) ही वास्तविक आत्मा है। जो मुमुक्षु (मोक्ष का इच्छुक) संसार के बंधनों से अनायास ही मुक्त होना चाहता है, उसके लिए वाक्यवृत्ति का अनुशीलन अनिवार्य है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं महावाक्य रहस्य (Significance)

वाक्यवृत्ति का महत्व वेदान्त की 'पदार्थ-शोधन' प्रक्रिया में निहित है। महावाक्य 'तत्त्वमसि' में तीन पद हैं— तत् (परमात्मा), त्वम् (जीवात्मा) और असि (दोनों की एकता)। आदि शंकराचार्य जी ने श्लोक २६ से ४५ तक इन तीनों पदों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है।

  • त्वम् पद (Thou): साधक को यह बोध कराया जाता है कि वह पंचकोशों और अवस्थात्रय (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का साक्षी 'साक्षी-चेतन' है।
  • तत् पद (That): ईश्वर को जगत का कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बताया गया है, जो माया की उपाधि से मुक्त होने पर साक्षात् परब्रह्म है।
  • असि पद (Are): यह पद जीवात्मा और परमात्मा के बीच की कल्पित दूरी को मिटाकर 'अखण्डाकार वृत्ति' का उदय करता है।

भाग-लक्षणा का सिद्धांत: श्लोक ४८ में शंकराचार्य जी एक अत्यंत महत्वपूर्ण तांत्रिक और दार्शनिक नियम 'भाग-लक्षणा' की चर्चा करते हैं। जैसे "वही यह देवदत्त है" कहने पर काल और स्थान के भेद को छोड़कर केवल व्यक्ति पर ध्यान दिया जाता है, वैसे ही 'तत्त्वमसि' में जीवात्मा की अल्पज्ञता और परमात्मा की सर्वज्ञता को त्यागकर केवल 'शुद्ध चेतना' के अभेद को स्वीकार किया जाता है। यह बोध ही जीवन्मुक्ति का आधार है।

वाक्यवृत्ति पाठ के अमोघ लाभ: फलश्रुति (Benefits)

इस ग्रंथ के मनन और निदिध्यासन से साधक को निम्नलिखित अलौकिक फल प्राप्त होते हैं:

  • भव-बन्धन से मुक्ति: "मुच्येयं भवबन्धनात्" — संसार के जन्म-मृत्यु और पुनरावृत्ति के चक्र से साधक को अनायास ही मुक्ति मिल जाती है।
  • पाप एवं अज्ञान का नाश: 'निरस्ताशेषसंसारनिदानः' — अज्ञान ही समस्त पापों की जड़ है। इस पाठ से अज्ञान नष्ट होता है, जिससे प्रारब्ध के अलावा समस्त पाप भस्म हो जाते हैं।
  • मानसिक शांति और निर्भयता: जब साधक स्वयं को 'अद्वयानन्द' (अद्वितीय आनंद स्वरूप) के रूप में पहचानता है, तो उसके जीवन से भय, ईर्ष्या और तनाव का अंत हो जाता है।
  • जीवन्मुक्ति का आनंद: श्लोक ५२ के अनुसार, साधक इसी देह में रहते हुए मुक्त पुरुष की भांति आनंदपूर्वक विचरण करता है।
  • वैष्णव परम पद की प्राप्ति: "वैष्णवं परमं पदम्" — अंततः साधक भगवान विष्णु के उस धाम को प्राप्त करता है जहाँ से लौटना नहीं पड़ता।

पठन विधि एवं साधना के सोपान (Ritual Method)

वाक्यवृत्ति एक 'विचार प्रधान' ग्रंथ है, अतः इसकी साधना में केवल पाठ ही नहीं, अपितु 'श्रवण, मनन और निदिध्यासन' अनिवार्य है:

१. श्रेष्ठ समय और एकाग्रता:

इसके अध्ययन के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है, जब बुद्धि शांत और ग्रहणशील होती है। गुरुवार (गुरु का दिन) इसका विशेष दिवस माना गया है।

२. शुद्धि एवं आसन:

स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत या पीले वस्त्र पहनें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। भगवान विष्णु और आदि शंकराचार्य का मानसिक स्मरण करें।

३. स्वाध्याय पद्धति:

प्रत्येक श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और उसके अर्थ पर गहराई से विचार करें। विशेष रूप से "सोऽहमित्यवधारय" (वह मैं हूँ—ऐसा निश्चय करें) वाले श्लोकों का बार-बार उच्चारण करें।

४. गुरु-शिष्य भाव:

वाक्यवृत्ति का पाठ करते समय स्वयं को एक जिज्ञासु शिष्य और आदि शंकराचार्य को साक्षात् सद्गुरु मानकर संवाद का अनुभव करें। यह 'भाव' ज्ञान को हृदयंगम करने में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वाक्यवृत्तिः का रचयिता कौन है और इसका मुख्य विषय क्या है?

इस ग्रंथ के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं। इसका मुख्य विषय उपनिषदों के 'तत्त्वमसि' महावाक्य की व्याख्या के माध्यम से जीवात्मा और परमात्मा की एकता सिद्ध करना है।

2. 'वाक्यवृत्ति' शब्द का अर्थ क्या है?

'वाक्य' का अर्थ है महावाक्य (तत्त्वमसि) और 'वृत्ति' का अर्थ है व्याख्या या विवेचन। अतः महावाक्य के अर्थ का स्पष्ट प्रतिपादन करना ही वाक्यवृत्ति है।

3. क्या इसे केवल सन्यासी ही पढ़ सकते हैं?

नहीं, आदि शंकराचार्य ने इसे उन सभी के लिए रचा है जो संसार के दुखों से मुक्त होकर शांति चाहते हैं। गृहस्थ भी शुद्ध मन से इसका अध्ययन कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

4. 'तत्त्वमसि' का सरल अर्थ क्या है?

'तत्' (वह ईश्वर), 'त्वम्' (तुम/आत्मा), 'असि' (हो)। इसका अर्थ है कि अज्ञान के कारण तुम स्वयं को छोटा जीव मानते हो, पर वास्तव में तुम वही अनंत परब्रह्म हो।

5. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत श्रेयस्कर है। परंतु श्रद्धापूर्वक स्वयं पाठ और मनन करने से भी साधक की बुद्धि शुद्ध होती है।

6. 'साक्षी' भाव का वाक्यवृत्ति में क्या महत्व है?

श्लोक ११ और २६ में साक्षी भाव पर बल दिया गया है। इसका अर्थ है स्वयं को शरीर और मन की क्रियाओं से अलग होकर 'देखने वाला' महसूस करना। यही आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी है।

7. क्या यह विष्णु स्तोत्र है या दर्शन शास्त्र?

यह मूलतः एक प्रकरण ग्रंथ (Introduction to Vedanta) है। हालाँकि, यह भगवान विष्णु (श्रीवल्लभ) की वन्दना से शुरू होता है, इसलिए यह ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

चूँकि यह ज्ञान मार्ग का पाठ है, इसके लिए माला अनिवार्य नहीं है। परंतु यदि आप 'अहं ब्रह्मास्मि' मंत्र का जप करना चाहें, तो रुद्राक्ष या तुलसी की माला श्रेष्ठ है।

9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है?

जी हाँ, जब जीव को यह बोध होता है कि वह 'अमृत स्वरूप' आत्मा है, तो मृत्यु का भय स्वतः ही विलीन हो जाता है।

10. पाठ का फल कितने समय में मिलता है?

यह साधक की 'मुमुक्षुता' (तीव्र इच्छा) पर निर्भर है। ४१ दिनों तक नित्य अर्थ सहित पाठ करने से चित्त की चंचलता समाप्त होने लगती है और सात्विक बोध का उदय होता है।