Trideva Kruta Ravi Stuti – श्री रवि स्तुतिः (त्रिदेव कृतम्) | Bhavishya Purana

॥ श्री त्रिदेव कृत रवि स्तुति: परिचय और महात्म्य ॥
श्री त्रिदेव कृत रवि स्तुति (Trideva Kruta Ravi Stuti) हिन्दू धर्म के भविष्य पुराण (Bhavishya Purana) के ब्रह्म पर्व (अध्याय 153) से ली गई है। यह एक अत्यंत दुर्लभ और दैवीय घटना है जहाँ सृष्टि के पालनहार और संहारक - ब्रह्मा, विष्णु और महेश - तीनों मिलकर भगवान सूर्य की आराधना करते हैं।
जब त्रिदेव अज्ञान और मोह के वशीभूत हो गए थे, तो उन्होंने चराचर जगत के प्रकाश पुंज सूर्य देव की शरण ली। इस स्तुति में वे सूर्य को "परमात्मा" (Supreme Soul) और अपनी उत्पत्ति का कारण स्वीकार करते हैं। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि सूर्य केवल एक गृह नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म हैं।
॥ श्लोक और भावार्थ (Verse Meanings) ॥
ब्रह्मा जी की स्तुति (Verses 3-10)
मुख्य भाव: ब्रह्मा जी सूर्य को "देवदेवेश" और "लोकदीप" (संसार का दीपक) कह कर नमन करते हैं। वे सूर्य को ही विष्णु, शिव, कालचक्र, और मोक्ष का दाता बताते हैं। वे सूर्य से शांति और प्रसाद (कृपा) की याचना करते हैं।
विशेषण: कोणवल्लभ (दिक्पालों के प्रिय), खषोल्क (आकाश में उल्का रूप), तमोघ्न (अंधकार नाशक)।
भगवान शिव की स्तुति (Verses 13-21)
मुख्य भाव: महादेव सूर्य की "जय-जयकार" करते हैं। वे सूर्य को "शम्भु", "शंकर" और "हंस" कहते हैं। शिव जी सूर्य को "संसार सागर को पीने वाला" (संसारार्णवपीताय) और "मोक्ष द्वार प्रदाता" बताते हैं।
प्रार्थना: "हे अद्भुत गोपते! मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ, मुझे हाथ का सहारा (हस्तावलम्बन) दीजिये।"
भगवान विष्णु की स्तुति (Verses 24-33)
मुख्य भाव: भगवान विष्णु सूर्य को नमन करते हुए कहते हैं कि सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। वे सूर्य को "जगत्पति" और "वेद रूप" कहते हैं। विष्णु जी एक परम रहस्य उद्घाटन करते हैं - "हे अनघ! कल्प के आरम्भ में जगत के पालन के लिए ब्रह्मा, मैं और रुद्र आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।" (श्लोक 31)
विशेषण: द्वादशपाणि (12 हाथों वाले), त्रिमूर्ति, वेदांग रूप, यज्ञ कला।
॥ पाठ विधि और लाभ (Rituals & Benefits) ॥
मोक्ष और ज्ञान: यह स्तोत्र "अज्ञान नाशक" है। जो व्यक्ति जीवन में दिशाहीन महसूस कर रहा हो, उसे इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
रोग मुक्ति: सूर्य आरोग्य के देवता हैं। त्रिदेवों द्वारा पूजित होने के कारण, यह स्तोत्र गंभीर रोगों और नेत्र पीड़ा को दूर करता है।
समय: रविवार को या प्रतिदिन सूर्योदय के समय पूर्व मुख होकर पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
संकट निवारण: भगवान शिव की प्रार्थना (श्लोक 21) भवसागर (सांसारिक कष्टों) से पार लगाने के लिए अत्यंत सिद्ध मंत्र है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)