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Trideva Kruta Ravi Stuti – श्री रवि स्तुतिः (त्रिदेव कृतम्) | Bhavishya Purana

Trideva Kruta Ravi Stuti – श्री रवि स्तुतिः (त्रिदेव कृतम्) | Bhavishya Purana
॥ श्री रवि स्तुतिः (त्रिदेव कृतम् - भविष्य पुराण) ॥ दृष्ट्वैवं देवदेवस्य रूपं भानोर्महात्मनः । विस्मयोत्फुल्लनयनास्तुष्टवुस्ते दिवाकरम् ॥ १ ॥ ॥ ब्रह्मोवाच (ब्रह्मा जी बोले) ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ब्रह्मा स्तोतुं प्रचक्रमे । प्रणम्य शिरसा भानुमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्ज्वल । लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ ॥ ३ ॥ भास्कराय नमो नित्यं खषोल्काय नमो नमः । विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे ॥ ४ ॥ नमस्ते पञ्चकालाय इन्द्राय वसुरेतसे । खगाय लोकनाथाय एकचक्ररथाय च ॥ ५ ॥ जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे । तमोघ्नाय सुरूपाय तेजसां निधये नमः ॥ ६ ॥ अर्थाय कामरूपाय धर्मायामिततेजसे । मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय च नमो नमः ॥ ७ ॥ क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतवे । शुभाय शुभरूपाय शुभदाय शुभात्मने ॥ ८ ॥ शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु वै नमः । नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्मणाय नमो नमः ॥ ९ ॥ ब्रह्मदेवाय ब्रह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने । ब्रह्मणे च प्रसादं वै कुरु देव जगत्पते ॥ १० ॥ एवं स्तुत्वा रविं ब्रह्मा श्रद्धया परया विभो । तूष्णीमासीन्महाभाग प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ११ ॥ ॥ महादेव उवाच (भगवान शिव बोले) ॥ ब्रह्मणोऽनन्तरं रुद्रः स्तोत्रं चक्रे विभावसोः । त्रिपुरारिर्महातेजाः प्रणम्य शिरसा रविम् ॥ १२ ॥ जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर । जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर ॥ १३ ॥ जय लोकप्रदीपेन जय भानो जगत्पते । जय काल जयाऽनन्त संवत्सर शुभानन ॥ १४ ॥ जय देवाऽदितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन । तमोघ्न जय सप्तेश जय सप्ताश्ववाहन ॥ १५ ॥ ग्रहेश जय कान्तीश जय कालेश शङ्कर । अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद ॥ १६ ॥ जय वेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै गतः । सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च ॥ १७ ॥ क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय । कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे ॥ १८ ॥ विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्माय वै जय । जयोङ्कार वषट्कार स्वाहाकार स्वधाय च ॥ १९ ॥ जयाश्वमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च । संसारार्णवपीताय मोक्षद्वारप्रदाय च ॥ २० ॥ संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते । हस्तावलम्बनो देव भव त्वं गोपतेऽद्भुत ॥ २१ ॥ ईशोऽप्येवमहीनाङ्गं स्तुत्वा भानुं प्रयत्नतः । विरराज महाराज प्रणम्य शिरसा रविम् ॥ २२ ॥ ॥ विष्णुरुवाच (भगवान विष्णु बोले) ॥ अथ विष्णुर्महातेजाः कृताञ्जलिपुटो रविम् । उवाच राजशार्दूल भक्त्या श्रद्धासमन्वितः ॥ २३ ॥ नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् । दिवाकरं रविं भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥ २४ ॥ इन्द्रं विष्णुं हरिं हंसमर्कं लोकगुरुं विभुम् । त्रिनेत्रं त्र्यक्षरं त्र्यङ्गं त्रिमूर्तिं त्रिगतिं शुभम् ॥ २५ ॥ षण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः । चतुर्विंशतिपादाय नमो द्वादशपाणिने ॥ २६ ॥ नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः । देवानां पतये नित्यं वर्णानां पतये नमः ॥ २७ ॥ त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः । त्वं सोमस्त्वं तथादित्यस्त्वमोङ्कारक एव हि ॥ २८ ॥ बृहस्पतिर्बुधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः । यमस्त्वं वरुणस्त्वं हि नमस्ते कश्यपात्मज ॥ २९ ॥ त्वया ततमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् । त्वत्त एव समुत्पन्नं सदेवासुरमानुषम् ॥ ३० ॥ ब्रह्मा चाहं च रुद्रश्च समुत्पन्ना जगत्पते । कल्पादौ तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ॥ ३१ ॥ नमस्ते वेदरूपाय अह्नरूपाय वै नमः । नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः ॥ ३२ ॥ प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोज्ज्वल । संसारार्णवमग्नानां प्रसादं कुरु गोपते । वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥ ३३ ॥ ॥ इति श्रीभविष्ये महापुराणे ब्राह्मेपर्वणि त्रिदेवकृत श्री रवि स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

॥ श्री त्रिदेव कृत रवि स्तुति: परिचय और महात्म्य ॥

श्री त्रिदेव कृत रवि स्तुति (Trideva Kruta Ravi Stuti) हिन्दू धर्म के भविष्य पुराण (Bhavishya Purana) के ब्रह्म पर्व (अध्याय 153) से ली गई है। यह एक अत्यंत दुर्लभ और दैवीय घटना है जहाँ सृष्टि के पालनहार और संहारक - ब्रह्मा, विष्णु और महेश - तीनों मिलकर भगवान सूर्य की आराधना करते हैं।

जब त्रिदेव अज्ञान और मोह के वशीभूत हो गए थे, तो उन्होंने चराचर जगत के प्रकाश पुंज सूर्य देव की शरण ली। इस स्तुति में वे सूर्य को "परमात्मा" (Supreme Soul) और अपनी उत्पत्ति का कारण स्वीकार करते हैं। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि सूर्य केवल एक गृह नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म हैं।

॥ श्लोक और भावार्थ (Verse Meanings) ॥

ब्रह्मा जी की स्तुति (Verses 3-10)

मुख्य भाव: ब्रह्मा जी सूर्य को "देवदेवेश" और "लोकदीप" (संसार का दीपक) कह कर नमन करते हैं। वे सूर्य को ही विष्णु, शिव, कालचक्र, और मोक्ष का दाता बताते हैं। वे सूर्य से शांति और प्रसाद (कृपा) की याचना करते हैं।

विशेषण: कोणवल्लभ (दिक्पालों के प्रिय), खषोल्क (आकाश में उल्का रूप), तमोघ्न (अंधकार नाशक)।

भगवान शिव की स्तुति (Verses 13-21)

मुख्य भाव: महादेव सूर्य की "जय-जयकार" करते हैं। वे सूर्य को "शम्भु", "शंकर" और "हंस" कहते हैं। शिव जी सूर्य को "संसार सागर को पीने वाला" (संसारार्णवपीताय) और "मोक्ष द्वार प्रदाता" बताते हैं।

प्रार्थना: "हे अद्भुत गोपते! मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ, मुझे हाथ का सहारा (हस्तावलम्बन) दीजिये।"

भगवान विष्णु की स्तुति (Verses 24-33)

मुख्य भाव: भगवान विष्णु सूर्य को नमन करते हुए कहते हैं कि सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। वे सूर्य को "जगत्पति" और "वेद रूप" कहते हैं। विष्णु जी एक परम रहस्य उद्घाटन करते हैं - "हे अनघ! कल्प के आरम्भ में जगत के पालन के लिए ब्रह्मा, मैं और रुद्र आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।" (श्लोक 31)

विशेषण: द्वादशपाणि (12 हाथों वाले), त्रिमूर्ति, वेदांग रूप, यज्ञ कला।

॥ पाठ विधि और लाभ (Rituals & Benefits) ॥

  • मोक्ष और ज्ञान: यह स्तोत्र "अज्ञान नाशक" है। जो व्यक्ति जीवन में दिशाहीन महसूस कर रहा हो, उसे इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।

  • रोग मुक्ति: सूर्य आरोग्य के देवता हैं। त्रिदेवों द्वारा पूजित होने के कारण, यह स्तोत्र गंभीर रोगों और नेत्र पीड़ा को दूर करता है।

  • समय: रविवार को या प्रतिदिन सूर्योदय के समय पूर्व मुख होकर पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।

  • संकट निवारण: भगवान शिव की प्रार्थना (श्लोक 21) भवसागर (सांसारिक कष्टों) से पार लगाने के लिए अत्यंत सिद्ध मंत्र है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तुति को 'त्रिदेव कृत' क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव - तीनों ने बारी-बारी से भगवान सूर्य की स्तुति की है। यह दुर्लभ प्रसंग भविष्य पुराण में मिलता है।

2. त्रिदेवों ने सूर्य की पूजा क्यों की?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार त्रिदेव अज्ञान और मोह में पड़ गए थे। तब ज्ञान और प्रकाश के देवता सूर्य की आराधना करके उन्होंने पुनः अपने स्वरूप और कर्तव्य का बोध प्राप्त किया।

3. इस स्तुति का प्रमुख लाभ क्या है?

इसके पाठ से अज्ञान (Ignorance) और भ्रम का नाश होता है। जैसे सूर्य अंधकार मिटाते हैं, वैसे ही यह स्तुति जीवन के अंधकार को मिटाकर 'मोक्ष' और 'ज्ञान' प्रदान करती है।

4. यह किस पुराण से लिया गया है?

यह 'भविष्य महापुराण' (Bhavishya Mahapurana) के 'ब्रह्म पर्व' (Brahma Parva) के अंतर्गत अध्याय 153 से लिया गया है।

5. 'कोणवल्लभ' का क्या अर्थ है?

'कोण' का अर्थ है दिशाएँ (कोने) और 'वल्लभ' का अर्थ है प्रिय/स्वामी। सूर्य सभी दिशाओं के स्वामी और कोणार्क (कोण + अर्क) के देवता हैं।

6. विष्णु जी ने सूर्य को क्या कहा है?

विष्णु जी ने कहा - 'ब्रह्मा, मैं और रुद्र आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।' यह सूर्य की सर्वोच्चता (परब्रह्म स्वरूप) को दर्शाता है।

7. 'हस्तावलम्बन' का क्या अर्थ है?

हस्त (हाथ) + अवलम्बन (सहारा)। शिव और विष्णु दोनों ने सूर्य से संसार सागर में डूबे हुए को हाथ का सहारा देने की प्रार्थना की है।

8. पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

सूर्योदय के समय (प्रातःकाल) और रविवार को इसका पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है।

9. क्या यह मोक्षदायक है?

जी हाँ, श्लोक 7 में सूर्य को 'मोक्ष' और 'मोक्षरूप' कहा गया है। यह अज्ञान नाश कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

10. 'द्वादशपाणिने' का क्या अर्थ है?

बारह हाथों वाले। यह वर्ष के 12 महीनों के 12 आदित्यों (सूर्य के 12 रूप) का प्रतीक है।