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वसिष्ठप्रोक्तं त्रैलोक्यविजयकवचस्तोत्रम्

वसिष्ठप्रोक्तं त्रैलोक्यविजयकवचस्तोत्रम्

वसिष्ठमुनिप्रोक्तं त्रैलोक्यविजयकवचस्तोत्रम्

सगर उवाच । श्रुतं सर्वं मुनिश्रेष्ठ कीर्त्यमानं त्वया विभो । कवचं वद सर्वत्र त्रैलोक्यविजयप्रदम् ॥ १॥ वसिष्ठ उवाच । श‍ृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं परमाद्भुतम् । मन्त्रं च सिद्धिदं शश्वत्साधकानां सुखावहम् ॥ २॥ गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय समुच्चरेत् । स्वाहान्तोऽयं महामन्त्रो दशार्णो भुक्तिमुक्तिदः ॥ ३॥ सदाशिवस्त्वस्य ऋषिः पङ्क्तिश्छन्द उदाहृतम् । देवता कृष्ण उदितो विनियोगोऽखिलाप्तये ॥ ४॥ त्रैलोक्यविजयस्याथ कवचस्य प्रजापतिः । ऋषिश्छन्दश्च जगती देवो राजेश्वरः स्वयम् ॥ ५॥ त्रैलोक्यविजयप्राप्तौ विनियोगः प्रकीर्त्तितः । प्रणवो मे शिरः पातु श्रीकृष्णाय नमः सदा ॥ ६॥ पायात्कपालं कृष्णाय स्वाहेति सततं मम । कृष्णेति पातु नेत्रे मे कृष्णस्वाहेति तारकाम् ॥ ७॥ हरये नम इत्येष भ्रूलतां पातु मे सदा । ॐ गोविन्दाय स्वाहेति नासिकां पातु सन्ततम् ॥ ८॥ गोपालाय नमो गण्डं पातु मे सततं मनुः । क्लीं कृष्णाय नमः कर्णौं पातु कल्पतरुर्मम ॥ ९॥ श्रीं कृष्णाय नमः पातु नित्यं मेऽधरयुग्मकम् । ॐ गोपीशाय स्वाहेति दन्तपङ्क्तिं ममावतु ॥ १०॥ श्रीकृष्णेति रदच्छिद्रं पातु मे त्र्यक्षरो मनुः । ॐ श्रीकृष्णाय स्वाहेति जिह्विकां पातु मे सदा ॥ ११॥ रामेश्वराय स्वाहेति तालुकं पातु मे सदा । राधिकेशाय स्वाहेति कण्ठं मे पातु सर्वदा ॥ १२॥ नमो गोपीगणेशाय ग्रीवां मे पातु सर्वदा । ॐ गोपेशाय स्वाहेति स्कन्धौ पातु सदा मम ॥ १३॥ नमः किशोरवेषाय स्वाहा पृष्ठं ममावतु । उदरं पातु मे नित्यं मुकुन्दाय नमो मनुः ॥ १४॥ ह्रीं श्रीङ्क्लीङ्कृष्णाय स्वाहा करौ पातु सदा मम । ॐ विष्णवे नमः स्वाहा बाहुयुग्मं ममावतु ॥ १५॥ ॐ ह्रीम्भगवते स्वाहा नखपङ्क्तिं ममावतु । नमो नारायणायेति नखरन्ध्रं ममावतु ॥ १६॥ ॐ ह्रींश्रीम्पद्मनाभाय नाभिं पातु सदा मम । ॐ सर्वेशाय स्वाहेति केशान्मम सदावतु ॥ १७॥ नमः कृष्णाय स्वाहेति ब्रह्मरन्ध्रं सदावतु । ॐ माधवाय स्वाहेति भालं मे सर्वदावतु ॥ १८॥ ॐ ह्रींश्रींरसिकेशाय कटिं मम सदावतु । नमो गोपीजनेशाय ऊरू पातु सदा मम ॥ १९॥ ॐ नमो दैत्यनाशाय स्वाहेत्यवतु जानुनी । यशोदानन्दनायेति नमोऽन्तो जङ्घकेऽवतु ॥ २०॥ रासारम्भप्रियायेति स्वाहान्तो ह्रीं ममावतु । वृन्दाप्रियाय स्वाहेति सकलाङ्गानि मेऽवतु ॥ २१॥ परिपूर्णमनाः कृष्णः प्राच्यां मां सर्वदावतु । स्वयं गोलोकनाथो मामाग्नेय्यां दिशि रक्षतु ॥ २२॥ पूर्णब्रह्मस्वरूपश्च दक्षिणे मां सदावतु । नैरृत्यां पातु मां कृष्णाः पश्चिमे पातु मां हरिः ॥ २३॥ गोविन्दः पातु वायव्यामुत्तरे रसिकेश्वरः । ऐशान्यां मे सदा पातु वृन्दावनविहारकृत् ॥ २४॥ वृन्दाप्राणेश्वरः शश्वत्पातु मामूर्द्ध्वदेशतः । सदैव मामधः पातु बलिध्वंसी महाबलः ॥ २५॥ जले स्थले चान्तरिक्षे नृसिंहः पातु मां सदा । स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां माधवः स्वयम् ॥ २६॥ सर्वान्तरात्मा निर्लिप्तः पातु मां सर्वतो विभुः । इति ते कथितं भूप सर्वाघौघविनाशनम् ॥ २७॥ त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमेशितुः । मया श्रुतं शिवमुखात्प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ॥ २८॥ (फलश्रुतिः) गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्कवचं धारयेत्तु यः । कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः ॥ २९॥ स साधकोऽवसद्यत्र तत्र वाणीरमे स्थिते । यदि स्यात्सिद्धकवचो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ३०॥ निश्चितं कोटिवर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात् । राजसूयसहस्राणि वाजपेयशतानि च ॥ ३१॥ महादानानि यान्येव भुवश्चापि प्रदक्षिणा । त्रैलोक्यविजयस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३२॥ व्रतोपवासनियमाः स्वाध्यायाध्ययने तथा । स्नानं च सर्वतीर्थेषु नास्यार्हन्ति कलामपि ॥ ३३॥ सिद्धत्वममरत्वं च दासत्वं श्रीहरेरपि । यदि स्यात्सिद्धकवचः सर्वं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ३४॥ स भवेत्सिद्धकवचो दशलक्षं जपेत्तु यः । यो भवेत्सिद्धकवचो विजयी स भवेद्ध्रुवम् ॥ ३५॥ राज्यं देयं शिरो देयं प्राणा देयाश्च भूपते । एतत्तु कवचं वत्स न देयं सङ्कटेऽपि च ॥ ३६॥ मया प्रकाशितं यत्ते चैतेषां त्राणकारणात् । ममाज्ञाकरणाच्चैव तद्विद्धि कुलभास्कर । इदं धृत्वा तु कवचं चक्रवर्त्ती भवान्भव ॥ ३७॥ ॥ इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे मध्यमभागे त्रयस्त्रिंशत्तमाध्यायान्तर्गतं वसिष्ठमुनिप्रोक्तं त्रैलोक्यविजयकवचस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम

त्रैलोक्य विजय कवच (Trailokya Vijaya Kavacha) एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है जो ब्रह्माण्ड पुराण (Brahmanda Purana) के मध्यम भाग (उपोद्धात) के 33वें अध्याय से लिया गया है। यह संवाद वसिष्ठ मुनि (Sage Vasishtha) और राजा सगर के बीच का है। जब राजा सगर ने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ से पूछा कि तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने का गुप्त उपाय क्या है, तब वसिष्ठ जी ने उन्हें यह "परमाद्भुत" कवच प्रदान किया। यह कवच श्री कृष्ण (Shri Krishna) को समर्पित है, जो 'गोपीजनवल्लभ' रूप में पूजे जाते हैं।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Spiritual Meaning)

  • दशार्ण महामंत्र (The Ten-Syllable Mantra): इस कवच का मूल आधार 10 अक्षरों का मंत्र है - "गोपीजनवल्लभाय स्वाहा" (Gopijanavallabhaya Swaha)। कवच में बताया गया है कि यह मंत्र भुक्ति (भोग/सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला है।
  • अंग-अंग की रक्षा (Divine Protection): इस कवच में साधक भगवान कृष्ण के विभिन्न नामों (जैसे गोविन्द, गोपाल, माधव, नृसिंह, राधापति) का आह्वान करके अपने शरीर के प्रत्येक अंग—सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक—की रक्षा की प्रार्थना करता है। यह एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सुरक्षा घेरा (shield) तैयार करता है।
  • दिशाओं की सुरक्षा: केवल शरीर ही नहीं, यह कवच दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैऋत्य आदि) में भगवान के विभिन्न स्वरूपों (गोलोकनाथ, पूर्णब्रह्म, वृन्दावनविहारकृत्) को रक्षक के रूप में स्थापित करता है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits from Scriptures)

वसिष्ठ मुनि ने स्वयं इस कवच की महिमा (Phalashruti) में निम्नलिखित लाभ बताए हैं:
  • अजेय विजय (Invincible Victory): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 'त्रैलोक्य विजय' का अर्थ है तीनों लोकों में विजय। जो साधक इस कवच को सिद्ध कर लेता है, वह 'विजयी' होता है।
  • पाप नाश (Destruction of Sins): इस कवच को "सर्वाघौघविनाशनम्" कहा गया है, अर्थात यह सभी प्रकार के पापों के समूह का नाश करने वाला है।
  • महान पुण्य की प्राप्ति (Merit): करोड़ों वर्षों की पूजा और हजारों राजसूय (Rajasuya) व वाजपेय यज्ञों का जो फल होता है, वह इस कवच के पाठ मात्र से प्राप्त हो जाता है।
  • सर्व सिद्धि (Attainment of Siddhis): जो व्यक्ति इस कवच को धारण करता है (कंठ या भुजा में) या पाठ करता है, वह साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है और उसे 'जीवन्मुक्त' की स्थिति प्राप्त होती है।

पाठ करने की विधि और नियम

  • गुरु पूजन: श्लोक 29 में स्पष्ट निर्देश है—"गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्", अर्थात पहले गुरु की विधिवत पूजा करके ही इस कवच को धारण या पाठ करना चाहिए।
  • सिद्धि के लिए जप: यदि कोई साधक इस कवच को सिद्ध करना चाहता है, तो उसे इसका दश लक्ष (10 लाख) बार जप करना होता है (श्लोक 35)। सिद्ध होने पर वह निश्चित ही विजयी होता है।
  • गोपनीयता: वसिष्ठ मुनि चेतावनी देते हैं कि यह कवच किसी अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। यह अत्यंत गुप्त (Secret) विद्या है जो केवल योग्य शिष्य या पुत्र को ही दी जानी चाहिए।