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Sri Vishnu Stuti (Narasimha Purane) – श्री विष्णु स्तुतिः (नरसिंहपुराणे)

Sri Vishnu Stuti (Narasimha Purane) – श्री विष्णु स्तुतिः (नरसिंहपुराणे)
॥ श्री विष्णु स्तुतिः (नरसिंहपुराणे) ॥ ब्रह्मोवाच । नमः क्षीराब्धिवासाय नागपर्यङ्कशायिने । नमः श्रीकरसंस्पृष्टदिव्यपादाय विष्णवे ॥ १ ॥ नमस्ते योगनिद्राय योगान्तर्भाविताय च । तार्क्ष्यासनाय देवाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ २ ॥ नमः क्षीराब्धिकल्लोलस्पृष्टमात्राय शार्ङ्गिणे । नमोऽरविन्दपादाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥ ३ ॥ भक्तार्चितसुपादाय नमो योगप्रियाय वै । शुभाङ्गाय सुनेत्राय माधवाय नमो नमः ॥ ४ ॥ सुकेशाय सुनेत्राय सुललाटाय चक्रिणे । सुवक्त्राय सुकर्णाय श्रीधराय नमो नमः ॥ ५ ॥ सुवक्षसे सुनाभाय पद्मनाभाय वै नमः । सुभ्रुवे चारुदेहाय चारुदन्ताय शार्ङ्गिणे ॥ ६ ॥ चारुजङ्घाय दिव्याय केशवाय नमो नमः । सुनखाय सुशान्ताय सुविद्याय गदाभृते ॥ ७ ॥ धर्मप्रियाय देवाय वामनाय नमो नमः । असुरघ्नाय चोग्राय रक्षोघ्नाय नमो नमः ॥ ८ ॥ देवानामार्तिनाशाय भीमकर्मकृते नमः । नमस्ते लोकनाथाय रावणान्तकृते नमः ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सप्तचत्वारिंशोऽध्याये ब्रह्म कृत श्री विष्णु स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

श्री विष्णु स्तुतिः (नरसिंहपुराण): परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

श्री विष्णु स्तुतिः (Sri Vishnu Stuti) सनातन धर्म की ज्ञान-परंपरा के अंतर्गत आने वाले महत्वपूर्ण उपपुराणों में से एक 'नरसिंहपुराण' (Narasimha Purana) से उद्धृत है। यह स्तुति पुराण के ४७वें अध्याय में स्थित है और इसकी रचना स्वयं भगवान ब्रह्मा ने की है। जब देवताओं और ऋषियों पर संकट के बादल मंडराए, तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के अनंत सामर्थ्य और उनके दयालु स्वरूप का स्मरण करते हुए इन पावन श्लोकों का गान किया। यह स्तोत्र भगवान विष्णु को उनके 'पालनकर्ता' और 'दुखहर्ता' स्वरूप में समर्पित है।

नरसिंहपुराण मुख्य रूप से भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार और उनके अन्य दिव्य अवतारों की महिमा का गान करता है। इस स्तुति में भगवान विष्णु के उस शांत स्वरूप का वर्णन है जहाँ वे क्षीर सागर (Milk Ocean) में शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं। प्रथम श्लोक— "नमः क्षीराब्धिवासाय नागपर्यङ्कशायिने" — इसी दिव्य दृश्य को साधक की आँखों के सामने साकार कर देता है। भगवान ब्रह्मा यहाँ विष्णु जी को 'विश्व का आधार' और 'अज्ञान का नाशक' बताते हैं।

इस स्तुति का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह भगवान विष्णु के सगुण (आकार युक्त) और निर्गुण (ऊर्जा स्वरूप) दोनों रूपों का समन्वय करती है। ब्रह्मा जी प्रभु के अंगों—नेत्र, केश, भाल, भुजाओं—का अत्यंत सूक्ष्म और सौंदर्यपूर्ण वर्णन करते हैं, जो साधक को 'ध्यान योग' (Meditation) में सहायता प्रदान करता है। जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि वह उस विराट चेतना से जुड़ जाता है जो संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रही है।

ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से, इस स्तुति को 'आपदुद्धारक' (संकटों से उबारने वाली) माना गया है। ब्रह्मा जी की यह वाणी हमें यह विश्वास दिलाती है कि चाहे असुरों का आतंक हो (असुरघ्नाय) या राक्षसों का भय (रक्षोघ्नाय), भगवान विष्णु का नाम स्मरण मात्र ही समस्त भयों का समूल नाश करने के लिए पर्याप्त है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए अमोघ है जो मानसिक अशांति, दरिद्रता और अज्ञात भयों से मुक्ति पाना चाहते हैं।

विशिष्ट महत्व: ब्रह्मा कृत स्तुति और इसके दार्शनिक संकेत

ब्रह्मा कृत श्री विष्णु स्तुति का तात्विक महत्व इसके 'योगात्मक' संकेतों में छिपा है। श्लोक २ में उन्हें "योगनिद्राय योगान्तर्भाविताय" कहा गया है। यह शब्द इंगित करते हैं कि परमात्मा योगनिद्रा (पूर्ण विश्राम की दिव्य अवस्था) में रहते हुए भी संपूर्ण जगत के प्रति सजग हैं। साधक के लिए यह संकेत है कि उसे भी अपने भीतर की 'अंतर्दृष्टि' जाग्रत करनी चाहिए।

  • ब्रह्मांडीय रक्षक: भगवान विष्णु का 'गरुड़वाहन' (तार्क्ष्यासनाय) स्वरूप यह दर्शाता है कि ईश्वर ज्ञान और गति के स्वामी हैं। गरुड़ वेदों के प्रतीक हैं, और उन पर सवारी करना वेदों के सर्वोच्च स्वामी होने का प्रमाण है।
  • अवतारों का स्मरण: श्लोक ८ और ९ में भगवान के 'वामन' अवतार और 'राम' अवतार (रावणान्तकृते) का उल्लेख मिलता है। यह सिद्ध करता है कि विष्णु ही समय-समय पर धर्म की रक्षा हेतु विभिन्न रूप धारण करते हैं।
  • आरोग्य और ज्ञान: उन्हें 'सुविद्या' और 'सुशान्त' कहा गया है। यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि साधक के बुद्धि कौशल और मानसिक शांति को भी बढ़ाता है।

भगवान ब्रह्मा ने इस स्तुति के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जो ईश्वर भक्तों के प्रति 'योगप्रियाय' (योग से प्रसन्न होने वाले) हैं, वे ही 'भीमकर्मकृते' (भयानक कर्म करने वाले शत्रुओं का नाश करने वाले) भी हैं। यह शक्ति और शांति का अद्भुत संगम है।

फलश्रुति: विष्णु स्तुति पाठ के अमोघ लाभ (Benefits)

नरसिंहपुराण और ऋषियों के अनुसार, ब्रह्मा कृत इस विष्णु स्तुति के नित्य पाठ से निम्नलिखित दिव्य फल प्राप्त होते हैं:

  • समस्त पापों का क्षय: यह स्तोत्र साधक के संचित पापों को जलाकर उसे निर्मल बनाता है। भगवान का नाम 'पापनाशन' है, जो चित्त की अशुद्धियों को धो देता है।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: "सुशान्ताय" स्वरूप का ध्यान करने से अनियंत्रित मन शांत होता है, अवसाद (Depression) दूर होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है।
  • शत्रु और बाधा मुक्ति: 'असुरघ्नाय' और 'रक्षोघ्नाय' वचनों के प्रभाव से साधक के गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं की योजनाएं विफल हो जाती हैं और मार्ग की बाधाएं दूर होती हैं।
  • वैकुण्ठ एवं मोक्ष की प्राप्ति: नित्य पाठ से भगवान नारायण के चरणों में अनन्य प्रीति बढ़ती है, जो अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर वैकुण्ठ लोक का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • आरोग्य और दीर्घायु: भगवान विष्णु 'अच्युत' और 'प्राणद' हैं। उनकी स्तुति करने से शरीर में प्राण-शक्ति का संचार होता है और व्याधियाँ दूर होती हैं।

पाठ विधि एवं विशेष साधना विधान (Ritual Method)

भगवान विष्णु की यह स्तुति सात्विकता और अटूट विश्वास की मांग करती है। पूर्ण लाभ हेतु निम्न विधि का पालन करें:

१. श्रेष्ठ समय और दिन:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। गुरुवार (Thursday) और एकादशी तिथि भगवान विष्णु के लिए विशेष शुभ मानी जाती है। संध्या काल में पाठ करना दिन भर के तनाव को मिटाता है।

२. शुद्धि एवं वस्त्र:

स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें, जो सात्विकता का प्रतीक हैं। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।

३. पूजन एवं अर्पण:

सामने भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं। प्रभु को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) और पीले पुष्प अर्पित करें।

४. मानसिक पाठ:

पाठ करते समय श्लोकों के अर्थ का चिंतन करें। यह अनुभव करें कि भगवान नारायण की कृपा दृष्टि आप पर पड़ रही है। पाठ के अंत में 'ॐ नमो नारायणाय' का १०८ बार जप करना साधना को पूर्णता देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तुति नरसिंहपुराण के किस अध्याय में है?

यह स्तुति नरसिंहपुराण के ४७वें अध्याय (सप्तचत्वारिंशोऽध्याये) में वर्णित है, जहाँ भगवान ब्रह्मा ने विष्णु जी की वन्दना की है।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल वैकुण्ठ प्राप्ति के लिए है?

नहीं, यह स्तोत्र भौतिक सुखों, शत्रु विजय और मानसिक शांति के लिए भी उतना ही प्रभावी है जितना कि आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष के लिए।

3. क्या महिलाएं श्री विष्णु स्तुति का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। महिलाएं पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने परिवार के कल्याण के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।

4. 'क्षीराब्धिवासाय' शब्द का क्या अर्थ है?

'क्षीराब्धि' का अर्थ है दूध का सागर (क्षीर सागर) और 'वासाय' का अर्थ है निवास करने वाले। यह भगवान विष्णु के उस आदि स्वरूप को दर्शाता है जो सृष्टि के आधार हैं।

5. क्या यह स्तोत्र रावण जैसे शत्रुओं से रक्षा करता है?

हाँ, अंतिम श्लोक में 'रावणान्तकृते' कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि जो शक्ति रावण जैसे महाबली राक्षस का अंत कर सकती है, वह साधक के जीवन के किसी भी शत्रु को परास्त कर सकती है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान विष्णु की साधना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। स्तोत्र पाठ मात्र के लिए माला की आवश्यकता नहीं है, परंतु एकाग्रता हेतु इसका प्रयोग करें।

7. क्या बिना संस्कृत जाने भी लाभ मिल सकता है?

हाँ, मंत्रों की ध्वनि तरंगे भाव प्रधान होती हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक सुनने या पाठ करने से भी समान फल प्राप्त होता है।

8. 'योगनिद्रा' का अर्थ क्या है?

योगनिद्रा भगवान विष्णु की वह स्थिति है जिसमें वे बाहरी जगत से विमुख होकर ब्रह्मांड के निर्माण और संचालन का सूक्ष्म मानसिक कार्य करते हैं। यह 'जाग्रत सुषुप्ति' की अवस्था है।

9. क्या यह पाठ बुरी नजर या तंत्र बाधा में प्रभावी है?

जी हाँ, 'रक्षोघ्नाय' और 'असुरघ्नाय' नामों का कंपन किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और तंत्र बाधा को तत्काल दूर करने की शक्ति रखता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की निष्ठा पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और मानसिक शांति का अनुभव होने लगता है।