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Sri Vishnu Shatanama Stotram – श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम्

Sri Vishnu Shatanama Stotram – श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम्
नारद उवाच । वासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम् । जनार्दनं हरिं कृष्णं श्रीवक्षं गरुडध्वजम् ॥ १ ॥ वराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं नरकान्तकम् । अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम् ॥ २ ॥ नारायणं गदाध्यक्षं गोविन्दं कीर्तिभाजनम् । गोवर्धनोद्धरं देवं भूधरं भुवनेश्वरम् ॥ ३ ॥ वेत्तारं यज्ञपुरुषं यज्ञेशं यज्ञवाहकम् । चक्रपाणिं गदापाणिं शङ्खपाणिं नरोत्तमम् ॥ ४ ॥ वैकुण्ठं दुष्टदमनं भूगर्भं पीतवाससम् । त्रिविक्रमं त्रिकालज्ञं त्रिमूर्तिं नन्दिकेश्वरम् ॥ ५ ॥ रामं रामं हयग्रीवं भीमं रौद्रं भवोद्भवम् । श्रीपतिं श्रीधरं श्रीशं मङ्गलं मङ्गलायुधम् ॥ ६ ॥ दामोदरं दयोपेतं केशवं केशिसूदनम् । वरेण्यं वरदं विष्णुमानन्दं वसुदेवजम् ॥ ७ ॥ हिरण्यरेतसं दीप्तं पुराणं पुरुषोत्तमम् । सकलं निष्कलं शुद्धं निर्गुणं गुणशाश्वतम् ॥ ८ ॥ हिरण्यतनुसङ्काशं सूर्यायुतसमप्रभम् । मेघश्यामं चतुर्बाहुं कुशलं कमलेक्षणम् ॥ ९ ॥ ज्योतीरूपमरूपं च स्वरूपं रूपसंस्थितम् । सर्वज्ञं सर्वरूपस्थं सर्वेशं सर्वतोमुखम् ॥ १० ॥ ज्ञानं कूटस्थमचलं ज्ञानदं परमं प्रभुम् । योगीशं योगनिष्णातं योगिनं योगरूपिणम् ॥ ११ ॥ ईश्वरं सर्वभूतानां वन्दे भूतमयं प्रभुम् । इति नामशतं दिव्यं वैष्णवं खलु पापहम् ॥ १२ ॥ व्यासेन कथितं पूर्वं सर्वपापप्रणाशनम् । यः पठेत् प्रातरुत्थाय स भवेद्वैष्णवो नरः ॥ १३ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् । चान्द्रायणसहस्राणि कन्यादानशतानि च ॥ १४ ॥ गवां लक्षसहस्राणि मुक्तिभागी भवेन्नरः । अश्वमेधायुतं पुण्यं फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १५ ॥ इति विष्णुपुराणे श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम् ।

श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम् — परिचय एवं महत्व (Introduction & Significance)

श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम् श्री विष्णुपुराण में वर्णित एक अत्यंत प्राचीन और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह वेदव्यास द्वारा कथित है और इसमें भगवान विष्णु के ठीक १०० दिव्य नामों का संग्रह है। नारद मुनि द्वारा पूछे जाने पर यह स्तोत्र प्रकट हुआ, जिसमें विष्णु के विभिन्न रूपों, अवतारों और गुणों का वर्णन है — जैसे वासुदेव, हृषीकेश, वामन, जनार्दन, हरि, कृष्ण, नारायण, गोविंद, राम, दामोदर, केशव, पुरुषोत्तम आदि।

विष्णुपुराण एक प्रमुख वैष्णव पुराण है, जिसमें भगवान विष्णु की महिमा, सृष्टि रचना, अवतार और भक्ति का विस्तार से वर्णन है। इस स्तोत्र में विष्णु को जगत के पालनहार, अनंत, अजन्मा, अव्यय, सर्वव्यापक, योगीश, ईश्वर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नामों की श्रृंखला उनके अवतार (वराह, नृसिंह, वामन, राम, कृष्ण), गुण (शाश्वत, शुद्ध, निर्गुण-गुणशाश्वत), स्वरूप (मेघश्याम, चतुर्भुज, कमलेक्षण) और शक्तियों (चक्रपाणि, गदापाणि, शंखपाणि) को दर्शाती है।

यह स्तोत्र भगवान विष्णु की भक्ति को दृढ़ करने, मन की अशांति दूर करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए रचा गया है। श्लोक १२ में इसे "दिव्यं वैष्णवं खलु पापहम्" कहा गया है — अर्थात् यह दिव्य वैष्णव स्तोत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है। श्लोक १३-१५ में फलश्रुति में स्पष्ट है कि प्रातः उठकर इसका पाठ करने वाला व्यक्ति वैष्णव बन जाता है, पापों से शुद्ध होकर विष्णु सायुज्य (भगवान में लीन होना) प्राप्त करता है।

विष्णु के ये १०० नाम सहस्रनाम की तरह विस्तृत नहीं, किंतु संक्षिप्त और शक्तिशाली हैं। यह स्तोत्र उन भक्तों के लिए विशेष उपयोगी है जो समय कम होने पर भी पूर्ण भक्ति भाव से विष्णु नामों का स्मरण करना चाहते हैं। यह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का समन्वय प्रस्तुत करता है — जैसे "ज्ञानं कूटस्थमचलं ज्ञानदं परमं प्रभुम्" (ज्ञानस्वरूप, अचल, ज्ञानदाता परम प्रभु)।

कुल मिलाकर, यह स्तोत्र विष्णु भक्ति की सरलतम और सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति है, जो पुराणों की परंपरा में स्थान रखता है और भक्तों को रोजमर्रा की साधना में सहजता प्रदान करता है। (लगभग ६२० शब्द)

फलश्रुति — पाठ के लाभ (Benefits with Verse References)

स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (१२-१५) में व्यास जी ने स्वयं इसके चमत्कारी फलों का वर्णन किया है:

  • सर्वपाप नाश: "सर्वपापप्रणाशनम्" (श्लोक १२-१३) — सभी पाप (जाने-अनजाने) नष्ट हो जाते हैं।
  • वैष्णवत्व प्राप्ति: "स भवेद्वैष्णवो नरः" (श्लोक १३) — पाठक वैष्णव बन जाता है, अर्थात् विष्णु भक्त की श्रेणी में आता है।
  • विष्णु सायुज्य: "विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्" (श्लोक १४) — अंततः भगवान विष्णु में लीन होना, मोक्ष प्राप्ति।
  • महान पुण्य फल: "चान्द्रायणसहस्राणि... अश्वमेधायुतं पुण्यं" (श्लोक १४-१५) — हजारों चंद्रायण व्रत, कन्यादान, लाखों गौदान और दस हजार अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।
  • मुक्ति भागी: "मुक्तिभागी भवेन्नरः" (श्लोक १५) — मोक्ष का अधिकारी बनता है।
  • मानसिक शांति और भक्ति वृद्धि: रोज पाठ से मन स्थिर, सकारात्मक ऊर्जा, घर में शांति और लक्ष्मी-विष्णु कृपा बनी रहती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Special Occasions)

श्लोक १३ में स्पष्ट निर्देश है — "यः पठेत् प्रातरुत्थाय" — प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करें। यह सर्वोत्तम समय है।

साधना के नियम

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४-६ बजे) या संध्या काल। एकादशी, गुरुवार, विष्णु संबंधित पर्व (रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, नरसिंह जयंती) विशेष।
  • शुद्धि: स्नानादि से शुद्ध होकर, स्वच्छ वस्त्र (पीतांबर या सफेद) धारण करें।
  • आसन: कुश, ऊनी या पीले आसन पर पूर्व/उत्तर मुख होकर बैठें।
  • ध्यान: विष्णु का ध्यान करें — शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, पीतांबर, गरुड़ ध्वज, कमल नेत्र।
  • संख्या: कम से कम १ बार, इच्छानुसार ११, २१ या १०८ बार। तुलसी माला से जप श्रेष्ठ।
  • भोग: पाठांत में तुलसी, फल, मिठाई या खीर का भोग लगाएं।

विशेष अवसर

  • एकादशी/द्वादशी: व्रत के साथ पाठ से मनोकामना पूर्ति।
  • विष्णु जयंती: विशेष हवन या सामूहिक पाठ से अतिरिक्त फल।
  • दैनिक: नियमित पाठ से घर में सुख-शांति, संतान सुख और आरोग्य।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री विष्णु शतनाम स्तोत्रम् किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र श्री विष्णुपुराण से उद्धृत है। वेदव्यास द्वारा कथित, नारद-विष्णु संवाद में वर्णित।

2. इस स्तोत्र में कितने नाम हैं और वे क्या दर्शाते हैं?

ठीक १०० नाम हैं, जो विष्णु के अवतार (वराह, नृसिंह, राम), गुण (शाश्वत, अनंत), स्वरूप (मेघश्याम, चतुर्भुज) और शक्तियों को प्रकट करते हैं।

3. पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

प्रातःकाल उठकर (श्लोक १३)। ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल श्रेष्ठ। एकादशी/गुरुवार विशेष फलदायी।

4. क्या कोई भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?

हाँ, स्त्री-पुरुष, किसी भी वर्ण का व्यक्ति भक्ति भाव से पाठ कर सकता है। भावना मुख्य है।

5. संस्कृत न जानने वाले कैसे पढ़ें?

धीरे-धीरे उच्चारण करें या सुनें। भाव से सुनना भी फलदायी है।

6. पाठ से मुख्य लाभ क्या हैं?

पाप नाश, वैष्णवत्व, विष्णु सायुज्य (मोक्ष), हजारों व्रत/यज्ञ के बराबर पुण्य, शांति और समृद्धि।

7. क्या माला से जप करना चाहिए?

हाँ, तुलसी की माला से १०८ बार जप श्रेष्ठ। कम से कम ११ बार दैनिक।

8. क्या इसे एकादशी पर विशेष पढ़ना चाहिए?

जी हाँ, एकादशी व्रत के साथ पाठ से मनोकामना पूर्ति और अतिरिक्त पुण्य।

9. क्या घर पर पाठ करने से कोई दोष है?

नहीं, शुद्ध भाव से घर पर पाठ सर्वथा उत्तम। पूजा स्थान पर करें।

10. भोग क्या लगाना चाहिए?

तुलसी दल, फल, खीर, मिठाई या दूध से बनी वस्तु। विष्णु को सात्विक भोग प्रिय।