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Sri Vinayaka Stavaraja - The King of Ganesha Hymns

Sri Vinayaka Stavaraja

Sri Vinayaka Stavaraja - The King of Ganesha Hymns
॥ श्री विनायक स्तवराजः ॥ बीजापूरगदेक्षुकार्मुकरुजा चक्राब्जपाशोत्पल- व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशप्रोद्यत्कराम्भोरुहः । ध्येयो वल्लभया सपद्मकरयाश्लिष्टोज्ज्वलद्भूषया विश्वोत्पत्तिविपत्तिसंस्थितिकरो विघ्नेश इष्टार्थदः ॥ १ ॥ नमस्ते सिद्धिलक्ष्मीश गणाधिप महाप्रभो । विघ्नेश्वर जगन्नाथ गौरीपुत्र जगत्प्रभो ॥ २ ॥ जय विघ्नेश्वर विभो विनायक महेश्वर । लम्बोदर महाबाहो सर्वदा त्वं प्रसीद मे ॥ ३ ॥ महादेव जगत्स्वामिन् मूषिकारूढ शङ्कर । विशालाक्ष महाकाय मां त्राहि परमेश्वर ॥ ४ ॥ कुञ्जरास्य सुराधीश महेश करुणानिधे । मातुलुङ्गधर स्वामिन् गदाचक्रसमन्वित ॥ ५ ॥ दशबाहो महाराज गजवक्त्र चतुर्भुज । शूर्पकर्ण महाकर्ण गणनाथ प्रसीद मे ॥ ६ ॥ शङ्खशूलसमायुक्त बीजापूरसमन्वित । इक्षुकार्मुकसम्युक्त पद्महस्त प्रसीद मे ॥ ७ ॥ नानाभरणसम्युक्त रत्नकुम्भकर प्रभो । सर्गस्थितिलयाधीश परमात्मन् जय प्रभो ॥ ८ ॥ अनाथनाथ विश्वेश विघ्नसङ्घविनाशन । त्रयीमूर्ते सुरपते ब्रह्मविष्णुशिवात्मक ॥ ९ ॥ त्रयीगुण महादेव पाहि मां सर्वपालक । अणिमादिगुणाधार लक्ष्मीश्रीविष्णुपूजित ॥ १० ॥ गौरीशङ्करसम्पूज्य जय त्वं गणनायक । रतिमन्मथसंसेव्य महीभूदारसंस्तुत ॥ ११ ॥ ऋद्ध्यामोदादिसंसेव्य महागणपते जय । शङ्खपद्मादिसंसेव्य निरालम्ब निरीश्वर ॥ १२ ॥ निष्कलङ्क निराधार पाहि मां नित्यमव्यय । अनाद्य जगतामाद्य पितामहसुपूजित ॥ १३ ॥ धूमकेतो गणाध्यक्ष महामूषकवाहन । अनन्तपरमानन्द जय विघ्नेश्वरेश्वर ॥ १४ ॥ रत्नसिंहासनासीन किरीटेन सुशोभित । परात्पर परेशान परपूरुष पाहि माम् ॥ १५ ॥ निर्द्वन्द्व निर्गुणाभास जपापुष्पसमप्रभ । सर्वप्रमथसंस्तुत्य त्राहि मां विघ्ननायक ॥ १६ ॥ कुमारस्य गुरो देव सर्वैश्वर्यप्रदायक । सर्वाभीष्टप्रद स्वामिन् सर्वप्रत्यूहनाशक ॥ १७ ॥ शरण्य सर्वलोकानां शरणागतवत्सल । महागणपते नित्यं मां पालय कृपानिधे ॥ १८ ॥ एवं श्रीगणनाथस्य स्तवराजमनुत्तमम् । यः पठेच्छृणुयान्नित्यं प्रत्यूहैः स विमुच्यते ॥ १९ ॥ अश्वमेधसमं पुण्यफलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । वशीकरोति त्रैलोक्यं प्राप्य सौभाग्यमुत्तमम् ॥ २० ॥ सर्वाभीष्टमवाप्नोति शीघ्रमेव सुदुर्लभम् । महागणेशसान्निध्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥ २१ ॥ इति श्रीरुद्रयामले श्रीविनायकस्तवराजः सम्पूर्णम् ।

स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री विनायक स्तवराजः (विनायकों के स्तोत्रों का राजा) रुद्रयामल तन्त्र का एक अत्यंत सिद्ध पाठ है।
यह भगवान गणेश के 'विराट' और 'तांत्रिक' स्वरूप का वर्णन करता है, जिसमें वे दस भुजाओं (दशबाहु) वाले और अपनी शक्ति 'वल्लभा' के साथ रत्न सिंहासन पर विराजमान हैं।

विशिष्ट महिमा (Significance)

  • परात्पर स्वरूप: श्लोक 15 में उन्हें 'परात्पर परेशान' (परमेश्वर से भी परे) कहा गया है। यह अद्वैत भाव को दर्शाता है।
  • निरालम्ब: श्लोक 12 में उन्हें 'निरालम्ब' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह जो स्वयं सबका आधार है, पर जिसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं।

फलश्रुति (Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ साधक को तीन दुर्लभ सिद्धियाँ प्रदान करता है:
  • यश और वशीकरण: "वशीकरोति त्रैलोक्यं" - साधक के व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण आ जाता है कि तीनों लोक उसके वश (अनुकूल) हो जाते हैं।
  • अश्वमेध पुण्य: इसके नित्य पाठ से महान अश्वमेध यज्ञ करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।
  • शीघ्र कार्य सिद्धि: "शीघ्रमेव सुदुर्लभम्" - अत्यंत कठिन और असंभव कार्य भी शीघ्र सिद्ध हो जाते हैं।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

"स्तवराज" का क्या अर्थ है?

"स्तवराज" का अर्थ है "स्तुतियों का राजा"। यह दर्शाता है कि यह भगवान गणेश के सभी स्तोत्रों में सर्वोपरि और अत्यंत प्रभावशाली है।

यह किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह स्तोत्र रुद्रयामल तन्त्र से लिया गया है, जो तंत्र साधना का एक प्रमुख और प्राचीन ग्रंथ है।

क्या इसमें "वशीकरण" का लाभ है?

हाँ। श्लोक 20 में "वशीकरोति त्रैलोक्यं" कहा गया है। इसका सात्विक अर्थ है कि साधक का ओरा (आभा) इतना आकर्षक हो जाता है कि सभी उसके प्रति मित्रवत हो जाते हैं।

"धूम्रकेतु" नाम यहाँ क्यों है?

"धूम्रकेतु" (धुएं की पताका वाले) गणेश जी का उग्र रूप है जो अग्नि और धूम्र (धुएं) की तरह विघ्नों को भस्म कर देता है।

क्या यह तांत्रिक स्तोत्र है?

जी हाँ, यह तंत्र ग्रन्थ से है और इसमें गणेश जी के 10 भुजाओं वाले विराट स्वरूप का ध्यान है, जो पाश-अंकुश और विभिन्न आयुध धारण करते हैं।

"अश्वमेध फल" का क्या तात्पर्य है?

अश्वमेध यज्ञ प्राचीन काल में सार्वभौम सत्ता का प्रतीक था। इस स्तोत्र का पाठ उस महायज्ञ के समान ही महान पुण्य और शक्ति देता है।

"इक्षु-कार्मुक" (गन्ने का धनुष) का क्या रहस्य है?

गन्ना (इक्षु) मन का प्रतीक है। जैसे गन्ने को पेरने पर ही रस निकलता है, वैसे ही मन को नियंत्रित (अनुशासित) करने पर ही आत्मानंद प्राप्त होता है।

दैनिक जीवन में इसका क्या उपयोग है?

जब कोई कार्य बहुत कठिन (सुदुर्लभ) हो या शत्रु बाधा अधिक हो, तब यह "स्तवराज" अचूक बाण की तरह काम करता है।

"निरालम्ब" का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है "बिना आधार वाला"। भगवान स्वयं सबके आधार हैं, उन्हें किसी अन्य आधार की आवश्यकता नहीं है। यह उनकी सर्वोच्चता है।

इसके पाठ की विधि क्या है?

चूँकि यह तंत्र से है, इसे पवित्रता और एकाग्रता से पढ़ना चाहिए। किसी विशेष कामना के लिए संकल्प लेकर 21 या 108 दिनों तक पाठ करना विशेष फलदायी है।