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Sri Vinayaka Ashtottara Shatanama Stotram - 108 Names for Archana

Sri Vinayaka Ashtottara Shatanama Stotram

Sri Vinayaka Ashtottara Shatanama Stotram - 108 Names for Archana
॥ श्री विनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ विनायको विघ्नराजो गौरीपुत्रो गणेश्वरः । स्कन्दाग्रजोऽव्ययः पूतो दक्षोऽध्यक्षो द्विजप्रियः ॥ १ ॥ अग्निगर्वच्छिदिन्द्रश्रीप्रदो वाणीप्रदायकः । सर्वसिद्धिप्रदः शर्वतनयः शर्वरीप्रियः ॥ २ ॥ सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता देवानीकार्चितः शिवः । सिद्धिबुद्धिप्रदः शान्तो ब्रह्मचारी गजाननः ॥ ३ ॥ द्वैमातुरो मुनिस्तुत्यो भक्तविघ्नविनाशनः । एकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरः शक्तिसम्युतः ॥ ४ ॥ लम्बोदरः शूर्पकर्णो हरिर्ब्रह्मविदुत्तमः । काव्यो ग्रहपतिः कामी सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ५ ॥ पाशाङ्कुशधरश्चण्डो गुणातीतो निरञ्जनः । अकल्मषः स्वयं सिद्धः सिद्धार्चितपदाम्बुजः ॥ ६ ॥ बीजापूरफलासक्तो वरदः शाश्वतः कृती । द्विजप्रियो वीतभयो गदी चक्रीक्षुचापधृत् ॥ ७ ॥ श्रीदोऽज उत्पलकरः श्रीपतिस्तुतिहर्षितः । कुलाद्रिभेत्ता जटिलश्चन्द्रचूडोऽमरेश्वरः ॥ ८ ॥ नागयज्ञोपवीती च कलिकल्मषनाशनः । स्थूलकण्ठः स्वयङ्कर्ता सामघोषप्रियः परः ॥ ९ ॥ स्थूलतुण्डोऽग्रणीर्धीरो वागीशः सिद्धिदायकः । दूर्वाबिल्वप्रियः कान्तः पापहारी समाहितः ॥ १० ॥ आश्रितश्रीकरः सौम्यो भक्तवाञ्छितदायकः । शान्तोऽच्युतार्च्यः कैवल्यो सच्चिदानन्दविग्रहः ॥ ११ ॥ ज्ञानी दयायुतो दान्तो ब्रह्मद्वेषविवर्जितः । प्रमत्तदैत्यभयदो व्यक्तमूर्तिरमूर्तिमान् ॥ १२ ॥ शैलेन्द्रतनुजोत्सङ्गखेलनोत्सुकमानसः । स्वलावण्यसुधासारजितमन्मथविग्रहः ॥ १३ ॥ समस्तजगदाधारो मायी मूषकवाहनः । रमार्चितो विधिश्चैव श्रीकण्ठो विबुधेश्वरः ॥ १४ ॥ चिन्तामणिद्वीपपतिः परमात्मा गजाननः । हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ अष्टोत्तरशतेनैवं नाम्नां विघ्नेश्वरं विभुम् । यः पूजयेदनेनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ॥ १६ ॥ दूर्वादलैः बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते ॥ १७ ॥ इति भविष्योत्तरपुराणे विनायकाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।

स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री विनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् भविष्योत्तर पुराण से उद्धृत है। यह मात्र स्तुति नहीं, बल्कि भगवान गणेश के १०८ नामों की अर्चना (पूजा) के लिए उपयोग किया जाने वाला मुख्य पाठ है।
षोडशोपचार पूजा में इसे 'अंग पूजा' या 'पुष्पांजलि' के समय पढ़ा जाता है।

अर्चने का महत्व और विधि (Ritual Significance)

यह स्तोत्र विशेष रूप से पुष्प-अर्चना के लिए अत्यंत फलदायी है।

अर्चना विधि:

हाथ में पुष्प या दूर्वा लें। प्रत्येक नाम के साथ "ॐ (नाम) नमः" बोलें और भगवान के चरणों में अर्पित करें।

उदाहरण: "ॐ विनायकाय नमः", "ॐ विघ्नराजाय नमः"...

विशिष्ट नामों का रहस्य (Unique Names)

  • चिन्तामणिद्वीपपति (Chintamani-dvipa-pati): श्लोक 15 में उन्हें "चिन्तामणि द्वीप" का स्वामी कहा गया है। यह उनका परम धाम है जो इक्षु (गन्ने) के सागर से घिरा है और जहाँ भक्तों की हर इच्छा (चिंता) पूर्ण होती है।
  • द्वैमातुर (Dvaimatura): श्लोक 4 में उन्हें "दो माताओं वाला" कहा गया है। यह उनके जन्म की कथा को दर्शाता है जहाँ पार्वती और गंगा (या मालिनी) दोनों ने उनका पालन किया।
  • शूर्पकर्ण (Shurpakarna): "सूप" जैसे कानों वाले। जैसे सूप अनाज को रखकर कचरे को बाहर कर देता है, वैसे ही गणेश जी सत्य को ग्रहण कर असत्य को उड़ा देते हैं।

फलश्रुति (Benefits)

श्लोक 16 और 17 के अनुसार, जो भक्त भक्ति भाव से इन 108 नामों द्वारा पूजा करता है:
  • सर्व विघ्न मुक्ति: वह समस्त बाधाओं से मुक्त हो जाता है (सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते)।
  • सर्व कामना सिद्धि: उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं (सर्वान्कामानवाप्नोति)।
  • द्रव्य लाभ: दूर्वा, बिल्व पत्र, पुष्प और चंदन-अक्षत से पूजा करने पर विशेष फल मिलता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

"अष्टोत्तर शतनाम" का क्या अर्थ है?

"अष्टोत्तर शत" का अर्थ है 108। यह स्तोत्र भगवान विनायक के 108 सिद्ध नामों का संग्रह है जिसका उपयोग अर्चना के लिए किया जाता है।

यह किस पुराण से लिया गया है?

यह भविष्योत्तर पुराण से लिया गया है, जो व्रत और अनुष्ठानों के लिए एक प्रामाणिक ग्रंथ है।

"द्वैमातुर" का क्या अर्थ है?

"द्वैमातुर" का अर्थ है "दो माताओं वाला"। गणेश जी का पालन देवी पार्वती और देवी गंगा (कुछ कथाओं में मालिनी) दोनों ने किया था, इसलिए उन्हें यह नाम मिला।

"चिन्तामणि द्वीप पति" क्यों कहा गया है?

श्लोक 15 के अनुसार, वे उस दिव्य धाम के स्वामी हैं जहाँ इच्छा-पूर्ति करने वाली "चिन्तामणि" मणियाँ सुलभ हैं।

अर्चने के लिए किसका प्रयोग करें?

श्लोक 17 स्पष्ट रूप से "दूर्वा दल" (दूर्वा घास) और "बिल्व पत्र" की अनुशंसा करता है। लाल रंग के पुष्प भी गणेश जी को अत्यंत प्रिय हैं।

"शूर्पकर्ण" का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

"शूर्प" (सूप) जैसे कान। यह इस बात का प्रतीक है कि भक्त को केवल सार (सत्य) ग्रहण करना चाहिए और निस्सार (असत्य) को उड़ा देना चाहिए।

"भालचन्द्र" का क्या अर्थ है?

"भाल" अर्थात माथा। जो अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं, वे भालचन्द्र हैं। यह शिव-पुत्र होने का भी संकेत है।

इसका मुख्य लाभ क्या है?

फलश्रुति कहती है "सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते" - अर्थात साधक सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त हो जाता है।

अर्चना कैसे करें?

प्रत्येक नाम के पहले "ॐ" और अंत में "नमः" लगाकर (जैसे ॐ गजाननाय नमः) पुष्प या दूर्वा अर्पित करें।

क्या इसे रोज पढ़ सकते हैं?

हाँ, प्रतिदिन पूजा के समय इन 108 नामों का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और गणेश जी की कृपा बनी रहती है।