Logoपवित्र ग्रंथ

श्री वराहमुखी स्तवः

Sri Varahamukhi Stava — वराह मुख की उद्धारिणी शक्ति

श्री वराहमुखी स्तवः
॥ श्री वराहमुखी स्तवः ॥ कुवलयनिभा कौशेयार्धोरुका मुकुटोज्ज्वला हलमुसलिनी सद्भक्तेभ्यो वराभयदायिनी । कपिलनयना मध्ये क्षामा कठोरघनस्तनी जयति जगतां मातः सा ते वराहमुखी तनुः ॥ १ ॥ तरति विपदो घोरा दूरात्परिह्रियते भयं स्खलितमतिभिर्भूतप्रेतैः स्वयं व्रियते श्रिया । क्षपयति रिपूनीष्टे वाचां रणे लभते जयं वशयति जगत्सर्वं वाराहि यस्त्वयि भक्तिमान् ॥ २ ॥ स्तिमितगतयः सीदद्वाचः परिच्युतहेतयः क्षुभितहृदयाः सद्यो नश्यद्दृशो गलितौजसः । भयपरवशा भग्नोत्साहाः पराहतपौरुषाः भगवति पुरस्त्वद्भक्तानां भवन्ति विरोधिनः ॥ ३ ॥ किसलयमृदुर्हस्तः क्लिश्येत कन्दुकलीलया भगवति महाभारः क्रीडासरोरुहमेव ते । तदपि मुसलं धत्से हस्ते हलं समयद्रुहां हरसि च तदाघातैः प्राणानहो तव साहसम् ॥ ४ ॥ जननि नियतस्थाने त्वद्वामदक्षिणपार्श्वयो- -र्मृदुभुजलतामन्दोक्षेपप्रवातितचामरे । सततमुदिते गुह्याचारद्रुहां रुधिरासवै- -रुपशमयतां शत्रून् सर्वानुभे मम दैवते ॥ ५ ॥ हरतु दुरितं क्षेत्राधीशः स्वशासनविद्विषां रुधिरमदिरामत्तः प्राणोपहारबलिप्रियः । अविरतचटत्कुर्वद्दंष्ट्रास्थिकोटिरटन्मुखो भगवति स ते चण्डोच्चण्डः सदा पुरतः स्थितः ॥ ६ ॥ क्षुभितमकरैर्वीचीहस्तोपरुद्धपरस्परै- -श्चतुरुदधिभिः क्रान्ता कल्पान्तदुर्ललितोदकैः । जननि कथमुत्तिष्ठेत् पातालसर्पबिलादिला तव तु कुटिले दंष्ट्राकोटी न चेदवलम्बनम् ॥ ७ ॥ तमसि बहुले शून्याटव्यां पिशाचनिशाचर- -प्रमथकलहे चोरव्याघ्रोरगद्विपसङ्कटे । क्षुभितमनसः क्षुद्रस्यैकाकिनोऽपि कुतो भयं सकृदपि मुखे मातस्त्वन्नाम सन्निहितं यदि ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ विदितविभवं हृद्यैः पद्यैर्वराहमुखीस्तवं सकलफलदं पूर्णं मन्त्राक्षरैरिममेव यः । पठति स पटुः प्राप्नोत्यायुश्चिरं कवितां प्रियां सुतसुखधनारोग्यं कीर्तिं श्रियं जयमुर्वराम् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्री वराहमुखी स्तवः सम्पूर्णम् ॥

श्री वराहमुखी स्तवः — परिचय और रहस्य

श्री वराहमुखी स्तवः (Sri Varahamukhi Stava) देवी वाराही की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तव है। जहाँ अन्य स्तोत्र देवी की कृपा मांगते हैं, यह स्तव देवी के 'वराह मुख' (Boar Face) की अदम्य शक्ति का आह्वान करता है। यह मुख केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी को उबारने (जैसे वराह अवतार ने हिरण्याक्ष से बचाया) और शत्रुओं को जड़ से उखाड़ने के लिए है।

तंत्र शास्त्र में वाराही को 'स्तम्भिनी' (The Paralyzer) कहा गया है। यह स्तव मुख्य रूप से स्तम्भन प्रयोग के लिए सिद्ध है — जब कोई शत्रु आपकी प्रगति में बाधा बन जाये और कोई मानवीय उपाय काम न करे, तब 'वराहमुखी' का यह स्तव उस बाधा को वहीं रोक देता है।

विशेष तथ्य: श्लोक 1 में देवी का अद्भुत स्वरूप वर्णन है — कुवलयनिभा (नीलकमल जैसा वर्ण), कौशेयार्धोरुका (रेशमी अधोवस्त्र), मुकुटोज्ज्वला (मुकुट से चमकती), हलमुसलिनी (हल और मुसल धारिणी), कपिलनयना (भूरी आँखें), कठोरघनस्तनी (दृढ़ वक्षस्थल)। यह वाराही का सबसे विस्तृत शारीरिक वर्णन है।

9 श्लोकों का विश्लेषण

श्लोक 1 — देवी का स्वरूप: नीलकमल वर्ण, मुकुटधारिणी, हल-मुसल धारिणी। भक्तों को वर और अभय देने वाली। "जयति जगतां मातः" — हे जगत की माता, आपका शरीर जयशील है।

श्लोक 2 — भक्त को 6 वरदान: (1) विपत्ति से पार, (2) भय दूर, (3) भूत-प्रेत स्वयं दूर भागें, (4) लक्ष्मी स्वयं आये, (5) शत्रु नष्ट हों, (6) रण में विजय और जगत वशीकरण

श्लोक 3 — शत्रु स्तम्भन (सबसे शक्तिशाली): "स्तिमितगतयः" — गति रुक जाये, "सीदद्वाचः" — वाणी लड़खड़ाये, "परिच्युतहेतयः" — हथियार छूट जायें, "क्षुभितहृदयाः" — हृदय कांप उठे, "गलितौजसः" — तेज नष्ट हो, "भग्नोत्साहाः" — उत्साह टूट जाये। यह कोर्ट केस और कानूनी विवादों में अमोघ श्लोक है।

श्लोक 4 — देवी का साहस: जिनके कोमल हाथ गेंद खेलने में भी थक जायें, वे ही भारी मुसल और हल उठाकर शत्रुओं के प्राण हरती हैं — "अहो तव साहसम्" — अहो! आपका साहस अद्भुत है!

श्लोक 5-6 — चामरधारी सेविकाएं और चण्डोच्चण्ड: देवी के दोनों ओर चामर डुलाती सेविकाएं और आगे खड़ा चण्डोच्चण्ड (क्षेत्रपाल/भैरव) जो शत्रुओं का रक्त पीता है।

श्लोक 7 — पृथ्वी उद्धार: वराह अवतार की कथा — चारों समुद्रों से घिरी, पाताल के सर्प बिलों से डूबी पृथ्वी को देवी की कुटिल दंष्ट्राकोटी (टेढ़ी दाढ़ का किनारा) ने उबारा। यह असम्भव को सम्भव करने का श्लोक है।

श्लोक 8 — भय से मुक्ति: घने अंधेरे जंगल में, पिशाच-निशाचर के बीच, चोर-बाघ-साँप-हाथी के संकट में — "सकृदपि मुखे मातस्त्वन्नाम सन्निहितं यदि" — माँ, यदि एक बार भी आपका नाम मुख पर हो, तो भय कैसा?

श्लोक 9 — फलश्रुति (8 फल): दीर्घायु (चिरं आयुः), प्रिय कवित्व (कवितां प्रियां), पुत्र सुख (सुत), सुख, धन, आरोग्य, कीर्ति, श्री (लक्ष्मी) और विजय (जयम्) — ये 8+ फल मिलते हैं।

पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

समय: यह उग्र साधना है — रात्रि काल या गोधूलि बेला सर्वश्रेष्ठ। सप्तमी, अष्टमी, अमावस्या की रात्रि विशेष फलदायी।

दिशा: शत्रु नाश हेतु दक्षिण मुख, धन/शांति हेतु उत्तर मुख। लाल या काला आसन।

ध्यान: देवी के मेघ-वर्ण (नीलकमल जैसा) और वराह मुख का ध्यान। कल्पना करें कि वे अपनी दाढ़ों से आपकी समस्याओं को कुचल रही हैं।

संकल्प: हाथ में जल और लाल पुष्प लेकर समस्या बोलें, फिर 3, 11 या 21 बार पाठ करें।

नैवेद्य: देवी को शकरकंद, गुड़ और उड़द दाल के व्यंजन (वड़ा) प्रिय हैं।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री वराहमुखी स्तवः क्या है?

देवी वाराही के वराह मुख स्वरूप की स्तुति में रचा गया 9 श्लोकों का शक्तिशाली स्तव। शत्रु स्तम्भन, भय नाश, जगत वशीकरण, दीर्घायु, कवित्व और लक्ष्मी प्राप्ति — ये इसके मुख्य फल हैं। यह स्तम्भन प्रयोग के लिए विशेष सिद्ध है।

2. वराहमुखी का क्या अर्थ है?

'वराह' = सूअर (Boar), 'मुखी' = मुख वाली। भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति-स्वरूपा। जैसे वराह अवतार ने पृथ्वी को उबारा, वैसे ही वराहमुखी अपने भक्तों को हर संकट से उबारती हैं। उनका वराह मुख अदम्य साहस और लक्ष्य-भेदन का प्रतीक है।

3. स्तव और स्तोत्र में क्या अंतर है?

स्तव = देवी की महिमा का विस्तृत वर्णन और स्तुति। स्तोत्र = मंत्रात्मक प्रार्थना जिसमें विशिष्ट फल की कामना होती है। स्तव अधिक भक्ति-प्रधान और वर्णनात्मक है, जबकि स्तोत्र अधिक मंत्र-प्रधान।

4. क्या यह स्तव कवच से अलग है?

हाँ। कवच का मुख्य कार्य शरीर और ऊर्जा क्षेत्र की रक्षा (Protection) है। स्तव देवी की स्तुति है जो उन्हें प्रसन्न कर विशिष्ट कार्य सिद्ध करता है। स्तव अधिक आक्रामक (Active) ऊर्जा रखता है — यह रक्षा नहीं, आक्रमण है।

5. इसे पढ़ने का सबसे अच्छा समय क्या है?

रात्रि काल या गोधूलि बेला (शाम) सर्वश्रेष्ठ। सप्तमी, अष्टमी, अमावस्या की रात्रि विशेष फलदायी। नवरात्रि और गुप्त नवरात्रि में उत्तम। पूर्णिमा को भी पाठ कर सकते हैं।

6. क्या गृहस्थ लोग पढ़ सकते हैं?

बिल्कुल। गृहस्थ जीवन में सबसे अधिक बाधाएं आती हैं — शत्रु, रोग, धन की कमी। यह स्तव गृहस्थों के लिए ढाल है। बस ध्यान रखें कि मन में किसी के अहित की भावना न हो, केवल अपनी रक्षा का भाव हो।

7. फलश्रुति में कितने लाभ बताये गये हैं?

श्लोक 9 में 8+ लाभ: दीर्घायु (चिरं आयुः), प्रिय कवित्व शक्ति, पुत्र सुख, सुख, धन, आरोग्य, कीर्ति, श्री (लक्ष्मी) और उर्वर विजय। "सकलफलदं" — सम्पूर्ण फल देने वाला।

8. श्लोक 8 में किस भय से रक्षा बताई गई है?

घने अंधेरे शून्य जंगल (शून्याटवी) में — पिशाच, निशाचर, प्रमथ गण, चोर, बाघ, साँप, हाथी — इन सभी भयों से। "सकृदपि मुखे" — देवी का नाम एक बार भी मुख पर हो तो भय समाप्त।

9. हल और मुसल क्या हैं?

हल (Plough) = कर्मभूमि जोतने का प्रतीक — नई समृद्धि पैदा करना, ऋण से मुक्ति। मुसल (Pestle) = शत्रुओं को कुचलने का हथियार। श्लोक 4 में कहा गया — कोमल हाथों से ये भारी हथियार उठाना देवी का अद्भुत साहस है।

10. क्या कोर्ट केस और कानूनी विवादों में सहायक है?

हाँ, श्लोक 3 सबसे प्रभावी है — "सीदद्वाचः" (वाणी लड़खड़ाये), "परिच्युतहेतयः" (तर्क/हथियार छूटें), "गलितौजसः" (तेज नष्ट हो), "भग्नोत्साहाः" (उत्साह टूटे)। विरोधी पक्ष पूर्णतः निष्प्रभावी हो जाता है।