श्री वराहमुखी स्तवः
Sri Varahamukhi Stava — वराह मुख की उद्धारिणी शक्ति

श्री वराहमुखी स्तवः — परिचय और रहस्य
श्री वराहमुखी स्तवः (Sri Varahamukhi Stava) देवी वाराही की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तव है। जहाँ अन्य स्तोत्र देवी की कृपा मांगते हैं, यह स्तव देवी के 'वराह मुख' (Boar Face) की अदम्य शक्ति का आह्वान करता है। यह मुख केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी को उबारने (जैसे वराह अवतार ने हिरण्याक्ष से बचाया) और शत्रुओं को जड़ से उखाड़ने के लिए है।
तंत्र शास्त्र में वाराही को 'स्तम्भिनी' (The Paralyzer) कहा गया है। यह स्तव मुख्य रूप से स्तम्भन प्रयोग के लिए सिद्ध है — जब कोई शत्रु आपकी प्रगति में बाधा बन जाये और कोई मानवीय उपाय काम न करे, तब 'वराहमुखी' का यह स्तव उस बाधा को वहीं रोक देता है।
विशेष तथ्य: श्लोक 1 में देवी का अद्भुत स्वरूप वर्णन है — कुवलयनिभा (नीलकमल जैसा वर्ण), कौशेयार्धोरुका (रेशमी अधोवस्त्र), मुकुटोज्ज्वला (मुकुट से चमकती), हलमुसलिनी (हल और मुसल धारिणी), कपिलनयना (भूरी आँखें), कठोरघनस्तनी (दृढ़ वक्षस्थल)। यह वाराही का सबसे विस्तृत शारीरिक वर्णन है।
9 श्लोकों का विश्लेषण
श्लोक 1 — देवी का स्वरूप: नीलकमल वर्ण, मुकुटधारिणी, हल-मुसल धारिणी। भक्तों को वर और अभय देने वाली। "जयति जगतां मातः" — हे जगत की माता, आपका शरीर जयशील है।
श्लोक 2 — भक्त को 6 वरदान: (1) विपत्ति से पार, (2) भय दूर, (3) भूत-प्रेत स्वयं दूर भागें, (4) लक्ष्मी स्वयं आये, (5) शत्रु नष्ट हों, (6) रण में विजय और जगत वशीकरण।
श्लोक 3 — शत्रु स्तम्भन (सबसे शक्तिशाली): "स्तिमितगतयः" — गति रुक जाये, "सीदद्वाचः" — वाणी लड़खड़ाये, "परिच्युतहेतयः" — हथियार छूट जायें, "क्षुभितहृदयाः" — हृदय कांप उठे, "गलितौजसः" — तेज नष्ट हो, "भग्नोत्साहाः" — उत्साह टूट जाये। यह कोर्ट केस और कानूनी विवादों में अमोघ श्लोक है।
श्लोक 4 — देवी का साहस: जिनके कोमल हाथ गेंद खेलने में भी थक जायें, वे ही भारी मुसल और हल उठाकर शत्रुओं के प्राण हरती हैं — "अहो तव साहसम्" — अहो! आपका साहस अद्भुत है!
श्लोक 5-6 — चामरधारी सेविकाएं और चण्डोच्चण्ड: देवी के दोनों ओर चामर डुलाती सेविकाएं और आगे खड़ा चण्डोच्चण्ड (क्षेत्रपाल/भैरव) जो शत्रुओं का रक्त पीता है।
श्लोक 7 — पृथ्वी उद्धार: वराह अवतार की कथा — चारों समुद्रों से घिरी, पाताल के सर्प बिलों से डूबी पृथ्वी को देवी की कुटिल दंष्ट्राकोटी (टेढ़ी दाढ़ का किनारा) ने उबारा। यह असम्भव को सम्भव करने का श्लोक है।
श्लोक 8 — भय से मुक्ति: घने अंधेरे जंगल में, पिशाच-निशाचर के बीच, चोर-बाघ-साँप-हाथी के संकट में — "सकृदपि मुखे मातस्त्वन्नाम सन्निहितं यदि" — माँ, यदि एक बार भी आपका नाम मुख पर हो, तो भय कैसा?
श्लोक 9 — फलश्रुति (8 फल): दीर्घायु (चिरं आयुः), प्रिय कवित्व (कवितां प्रियां), पुत्र सुख (सुत), सुख, धन, आरोग्य, कीर्ति, श्री (लक्ष्मी) और विजय (जयम्) — ये 8+ फल मिलते हैं।
पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
समय: यह उग्र साधना है — रात्रि काल या गोधूलि बेला सर्वश्रेष्ठ। सप्तमी, अष्टमी, अमावस्या की रात्रि विशेष फलदायी।
दिशा: शत्रु नाश हेतु दक्षिण मुख, धन/शांति हेतु उत्तर मुख। लाल या काला आसन।
ध्यान: देवी के मेघ-वर्ण (नीलकमल जैसा) और वराह मुख का ध्यान। कल्पना करें कि वे अपनी दाढ़ों से आपकी समस्याओं को कुचल रही हैं।
संकल्प: हाथ में जल और लाल पुष्प लेकर समस्या बोलें, फिर 3, 11 या 21 बार पाठ करें।
नैवेद्य: देवी को शकरकंद, गुड़ और उड़द दाल के व्यंजन (वड़ा) प्रिय हैं।