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Sri Vani Sharanagati Stotram – श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम्

Sri Vani Sharanagati Stotram – श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम्
॥ श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम् (शृंगेरी जगद्गुरु विरचितम्) ॥ वेणीं सितेतरसमीरणभोजितुल्यां वाणीं च केकिकुलगर्वहरां वहन्तीम् । श्रोणीं गिरिस्मयविभेदचणां दधानां वाणीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥
(जिनकी वेणी (चोटी) काले सर्प (सितेतर-समीरण-भोजी) के समान काली और लंबी है; जिनकी वाणी (स्वर) मयूरों (केकि-कुल) के गर्व को हरने वाली है; जिनका कटि-प्रदेश (श्रोणी) पर्वत के अभिमान को भी चूर करने वाला है - ऐसी माँ वाणी की, मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ।)
वाचः प्रयत्नमनपेक्ष्य मुखारविन्दा- -द्वाताहताब्धिलहरीमदहारदक्षाः । वादेषु यत्करुणया प्रगलन्ति तां त्वां वाणीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥
(हे माँ! जिनकी करुणा से वाद-विवाद (शास्त्रार्थ) में मुख-कमल से बिना किसी प्रयत्न के, हवा से उद्वेलित समुद्र की लहरों (वाताहत-अब्धि-लहरी) के मद (अहंकार) को हरने वाली धाराप्रवाह वाणी अपने आप निकलती है - उस आप (माँ वाणी) की, मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ।)
राकाशशाङ्कसदृशाननपङ्कजातां शोकापहारचतुराङ्घ्रिसरोजपूजाम् । पाकारिमुख्यदिविषत्प्रवरेड्यमानां वाणीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
(जिनका मुख-कमल, पूर्णमासी के चन्द्रमा (राका-शशांक) के समान सुंदर है; जिनके चरण-कमलों की पूजा भक्तों के समस्त शोकों को हरने में चतुर (कुशल) है; और जिनकी स्तुति इन्द्र (पाकारि) आदि मुख्य देवताओं द्वारा की जाती है - ऐसी माँ वाणी की, मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ।)
बालोडुपप्रविलसत्कचमध्यभागां नीलोत्पलप्रतिभटाक्षिविराजमानाम् । कालोन्मिषत्किसलयारुणपादपद्मां वाणीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ ४ ॥
(जिनके बालों के मध्य भाग में बाल-चंद्रमा (अर्धचन्द्र) सुशोभित है; जिनकी आँखें नील-कमल (नीलोत्पल) की शोभा को भी चुनौती देती हैं; और जिनके चरण-कमल समय पर खिले हुए (कोमल) पत्तों (किसलय) की तरह लाल (अरुण) हैं - ऐसी माँ वाणी की, मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ।)
॥ इति शृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचितं श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम् ॥

परिचय: श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम्

श्री वाणी शरणागति स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली लघु स्तोत्र है। इसकी रचना शृंगेरी शारदा पीठ के परम पूज्य 33वें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामीजी ने की थी। वे आदि शंकराचार्य के अवतार माने जाते हैं और अपनी अगाध विद्वता और भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।

'शरणागति' (Sharanagati) का अर्थ है पूर्ण समर्पण। अक्सर हम विद्या प्राप्त कर अहंकार से भर जाते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि सच्ची विद्या वही है जो हमें विनम्र बनाए और माँ सरस्वती के चरणों में समर्पित कर दे। यह स्तोत्र केवल 4 श्लोकों का है, लेकिन इसका एक-एक शब्द भक्ति रस से भरा हुआ है।

इस स्तोत्र की विशिष्टता

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'अनन्य भाव' है। प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति 'वाणीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये' एक संकल्प (Affirmation) की तरह है कि - "मेरे पास कोई और सहारा नहीं है, मैं केवल वाणी (शारदा) की शरण में हूँ।"

  • वाक्-सिद्धि: दूसरे श्लोक में वर्णन है कि माँ की कृपा से भक्त के मुख से समुद्र की लहरों की तरह धाराप्रवाह वाणी निकलती है।
  • सौंदर्य लहरी: इसमें माँ के अद्भुत रूप (मयूर-गर्विणी वाणी, चंद्र-मुख, अरुण-चरण) का वर्णन है जो मन को शांत करता है।
  • शोक नाशक: तीसरे श्लोक में कहा गया है कि माँ के चरणों की पूजा समस्त दुःखों (शोक) को हर लेती है।

पाठ के लाभ

इस दिव्य स्तोत्र के पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

1. अहंकार का नाश

विद्यार्थी और विद्वान अक्सर अहंकार के शिकार हो जाते हैं। यह स्तोत्र अहंकार को गलाकर शुद्ध ज्ञान का पात्र बनाता है।

2. धाराप्रवाह वक्तृत्व शक्ति

जो लोग भाषण देने में हिचकिचाते हैं या डिबेट में भाग लेते हैं, उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। यह वाकपटुता (Oratory Skills) प्रदान करता है।

3. मानसिक शांति

'अनन्य शरण' का भाव मन की भटकाव को रोककर गहरी शांति देता है। यह चिंता और तनाव (Anxiety) को कम करने में भी सहायक है।

4. गुरु कृपा

चूँकि यह एक महान जगद्गुरु द्वारा रचित है, इसके पाठ से गुरु और गोविंद दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इसके रचयिता शृंगेरी मठ के 33वें पीठाधीश्वर 'श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामीजी' हैं। वे 19वीं-20वीं सदी के महान संत थे।

2. 'वाणी' किसका नाम है?

वाणी माँ सरस्वती का ही एक प्रचलित नाम है, जिसका अर्थ है 'शब्द' या 'बोली'। यह दश महाविद्याओं में मातंगी और वाग्देवी का भी द्योतक है।

3. 'अनन्य शरण' का क्या मतलब है?

अनन्य (न अन्य) का अर्थ है 'जिसका कोई दूसरा सहारा न हो'। अर्थात, "हे माँ! मुझे अब अपनी विद्या, बल या बुद्धि पर भरोसा नहीं है, मैं केवल आपके भरोसे हूँ।"

4. क्या परीक्षा के समय इसे पढ़ सकते हैं?

जी हाँ। परीक्षा से पहले यह प्रार्थना करने से मन शांत होता है और 'डर' निकल जाता है, क्योंकि हम परिणाम माँ पर छोड़ देते हैं।

5. इस स्तोत्र में 'समुद्र की लहरों' (अब्धि लहरी) का ज़िक्र क्यों है?

यह एक उपमा (Simile) है। जैसे समुद्र की लहरें लगातार और वेग से आती हैं, वैसे ही माँ की कृपा से भक्त के मुख से ज्ञानमयी वाणी निरंतर प्रवाहित होती है।

6. क्या इसमें कोई बीज मंत्र है?

यह एक भक्ति स्तोत्र है, तांत्रिक मंत्र नहीं। इसमें समर्पण का भाव ही इसका 'बीज' है। इसे बिना दीक्षा के कोई भी पढ़ सकता है।

7. शृंगेरी शारदा पीठ कहाँ है?

शृंगेरी शारदा पीठ कर्नाटक के चिकमगलूर जिले में तुंगा नदी के तट पर स्थित है। इसे स्वयं आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था और यहाँ माँ शारदा की दिव्य मूर्ति विराजमान है।

8. पाठ का सही समय क्या है?

वैसे तो कभी भी, लेकिन संध्या वंदन (शाम) के समय या सुबह पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

9. क्या इसका हिंदी अनुवाद उपलब्ध है?

हाँ, ऊपर दिए गए श्लोकों के नीचे उनका हिंदी भावार्थ दिया गया है ताकि आप अर्थ समझकर पाठ कर सकें।

10. इसे कितनी बार जपना चाहिए?

चूँकि यह केवल 4 श्लोक हैं, आप इसे एक बार भी पढ़ सकते हैं। नवरात्रि में इसे 11 बार पढ़ना शुभ माना जाता है।