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Sri Vagvadini Shatkam – श्री वाग्वादिनी षट्कम्

Sri Vagvadini Shatkam – श्री वाग्वादिनी षट्कम्
॥ श्री वाग्वादिनी षट्कम् (शृंगेरी जगद्गुरु विरचितम्) ॥ वरदाप्यहेतुकरुणा- -जन्मावनिरपि पयोजभवजाये । किं कुरुषे न कृपां मयि वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ १ ॥
(हे ब्रह्माजी की पत्नी (पयोज-भव-जाये)! यद्यपि आप वर देने वाली (वरदा) और अहैतुकी (बिना कारण) करुणा की जन्मभूमि हैं, फिर भी आप मुझ पर कृपा क्यों नहीं कर रही हैं? हे वाग्वादिनी! मुझे बताइये, बताइये (वद वद)। स्वाहा।)
किं वा ममास्ति महती पापततिस्तत्प्रभेदने तरसा । किं वा न तेऽस्ति शक्तिर्वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ २ ॥
(क्या मेरे पापों (पाप-तति) का समूह इतना महान (बड़ा) है? या क्या आपके पास उन पापों को शीघ्रता (तरसा) से नष्ट करने की शक्ति नहीं है? हे वाग्वादिनी! बताइये, बताइये। स्वाहा।)
किं जीवः परमशिवा- -द्भिन्नोऽभिन्नोऽथ भेदश्च । औपाधिकः स्वतो वा वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ ३ ॥
(क्या जीव परमशिव से भिन्न है, या अभिन्न (एक) है? यदि भेद है, तो क्या वह औपाधिक (केवल उपाधि/शरीर के कारण) है या स्वतः (स्वाभाविक) है? हे वाग्वादिनी! मुझे (सत्य) बताइये, बताइये। स्वाहा।)
वियदादिकं जगदिदं सर्वं मिथ्याऽथवा सत्यम् । मिथ्यात्वधीः कथं स्या- -द्वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ ४ ॥
(यह आकाश (वियद) आदि संपूर्ण जगत, क्या सब मिथ्या (Illusory) है या सत्य (Real)? और यदि मिथ्या है, तो यह 'मिथ्यात्व की बुद्धि' (यह समझ कि सब मिथ्या है) कैसे प्राप्त हो? हे वाग्वादिनी! बताइये, बताइये। स्वाहा।)
ज्ञानं कर्म च मिलितं हेतुर्मोक्षेऽथवा ज्ञानम् । तज्ज्ञानं केन भवे- -द्वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ ५ ॥
(मोक्ष प्राप्ति का हेतु (कारण) क्या है - क्या ज्ञान और कर्म का मिश्रण (ज्ञान-कर्म-समुच्चय), या केवल ज्ञान? और वह (मोक्ष-प्रद) ज्ञान किसके द्वारा प्राप्त होता है? हे वाग्वादिनी! बताइये, बताइये। स्वाहा।)
ज्ञानं विचारसाध्यं किं वा योगेन कर्मसाहस्रैः । कीदृक्सोऽपि विचारो वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ॥ ६ ॥
(क्या ज्ञान 'विचार' (आत्म-चिंतन) से साध्य है, या योग से, या हजारों वैदिक कर्मों (कर्म-साहस्रैः) से? और वह 'विचार' भी किस प्रकार का होना चाहिए? हे वाग्वादिनी! मुझे बताइये, बताइये। स्वाहा।)
॥ इति शृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचितं श्री वाग्वादिनी षट्कम् ॥

परिचय: श्री वाग्वादिनी षट्कम्

श्री वाग्वादिनी षट्कम् 6 श्लोकों का एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमयी स्तोत्र है। इसकी रचना आधुनिक काल के महानतम वेदांती संत, शृंगेरी पीठ के 33वें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामीजी ने की थी। सामान्यतः भक्त भगवान से धन, स्वास्थ्य या सुरक्षा मांगते हैं, लेकिन इस स्तोत्र में आचार्य ने माँ वाग्वादिनी (परम ज्ञान की देवी) से सीधे 'ब्रह्म-ज्ञान' के प्रश्न पूछे हैं।

प्रत्येक श्लोक के अंत में 'वद वद वाग्वादिनि स्वाहा' (बताओ, बताओ, हे वाग्वादिनी! मैं आहुति देता हूँ) का प्रयोग इसे एक मंत्र जैसा प्रभाव देता है। यह स्तोत्र उन साधकों के लिए है जो जीवन के परम सत्य को जानना चाहते हैं।

स्तोत्र का दार्शनिक महत्व (Vedantic Significance)

यह स्तोत्र वस्तुतः 'अद्वैत वेदांत' का सार है। इसमें जगद्गुरु ने एक मुमुक्षु (मोक्ष का इच्छुक) बनकर शंकाएँ उठाई हैं:

  • जीव-ब्रह्म ऐक्य: श्लोक 3 में 'जीव' और 'परमशिव' के संबंध पर प्रश्न है - क्या हम ईश्वर से अलग हैं? अद्वैत कहता है, नहीं, भेद केवल 'औपाधिक' (Illusionary) है।
  • जगत की सत्यता: श्लोक 4 में पूछा गया है कि यह दुनिया सच है या झूठ (मिथ्या)? यह शंकराचार्य के 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' सिद्धांत की ओर संकेत करता है।
  • मोक्ष का मार्ग: श्लोक 5 और 6 में 'ज्ञान योग' बनाम 'कर्म योग' का प्रश्न है। आचार्य पूछते हैं कि मुक्ति पूजा-पाठ (कर्म) से मिलेगी या आत्म-विचार (ज्ञान) से?

पाठ के लाभ

यद्यपि यह एक दार्शनिक रचना है, फिर भी श्रद्धापूर्वक इसके पाठ से अद्भुत फल मिलते हैं:

1. आध्यात्मिक संशय का नाश

जो साधक कंफ्यूज्ड हैं कि कौन सा मार्ग अपनाएं, उन्हें इसका पाठ करने से स्वतः ही भीतर से सही मार्गदर्शन (Intuition) मिलता है।

2. कुशाग्र बुद्धि

'वद वद वाग्वादिनि' का जप वाणी और बुद्धि को तीक्ष्ण करता है। वकीलों, शिक्षकों और दार्शनिकों के लिए यह बहुत लाभकारी है।

3. पापों का शमन

दूसरे श्लोक में भक्त पूछता है - "क्या मेरे पाप तेरी शक्ति से बड़े हैं?" यह पुकार माँ की करुणा को जगाती है और पापों को जला देती है।

4. आत्म-विचार की प्रेरणा

इसे पढ़ने से मन फालतू बातों से हटकर 'मैं कौन हूँ?' (Self-Enquiry) जैसे गहरे चिंतन में लगता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'षट्कम' (Shatkam) का क्या अर्थ है?

'षट्कम' संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है 'छह का समूह'। चूँकि इस स्तोत्र में 6 श्लोक हैं, इसलिए इसे षट्कम कहा जाता है (जैसे निर्वाण षट्कम)।

2. 'वद वद' (Vada Vada) का क्या मतलब है?

'वद' धातु का अर्थ है 'बोलना'। 'वद-वद' का अर्थ है - "बोलिए, बोलिए!" या "बताइये, बताइये!"। यह बालक का अपनी माँ से आग्रह है।

3. क्या गृहस्थ लोग इसका पाठ कर सकते हैं?

बिलकुल। यद्यपि इसमें सन्यास और मोक्ष की बातें हैं, लेकिन गृहस्थ भी विवेक और वैराग्य पाने के लिए इसका पाठ कर सकते हैं।

4. 'स्वाहा' (Swaha) शब्द अंत में क्यों है?

'स्वाहा' आमतौर पर हवन में आहुति देते समय बोला जाता है। यहाँ इसका प्रयोग आत्म-निवेदन (Self-offering) के लिए किया गया है - "मैं अपने अज्ञान की आहुति देता हूँ।"

5. ज्ञान और कर्म में क्या श्रेष्ठ है?

शंकराचार्य और अद्वैत मत के अनुसार, मोक्ष केवल 'ज्ञान' से होता है। कर्म केवल चित्त (मन) को शुद्ध करने का साधन है, साध्य नहीं। 5वें श्लोक में यही प्रश्न उठाया गया है।

6. इसे किस राग में गाया जा सकता है?

इसे शांत और गंभीर रागों में जैसे राग यमन या राग भैरवी में धीमे स्वर में गाया जाना चाहिए, ताकि अर्थ पर ध्यान रहे।

7. क्या इसका पाठ मौन रहकर करना चाहिए?

चूँकि यह 'विचार' (Contemplation) प्रधान स्तोत्र है, इसे अर्थ समझते हुए मन ही मन या बहुत धीमे स्वर में पढ़ना सबसे अच्छा है।

8. 'मिथ्यात्वधी' (Mithyatvadhi) क्या है?

इसका अर्थ है 'मिथ्यात्व की बुद्धि' - यानी यह पक्का ज्ञान हो जाना कि "यह दुनिया एक सपना है, सच नहीं।" यह वैराग्य की उच्च अवस्था है।

9. क्या बच्चों को यह स्तोत्र सिखाना चाहिए?

हाँ, इससे उनमें जिज्ञासा (Curiosity) और तर्क शक्ति बढ़ती है। वे जीवन के गहरे सवालों के बारे में सोचना शुरू करते हैं।

10. शृंगेरी गुरु परंपरा में इनका क्या स्थान है?

श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामीजी ने ही कलाडी (शंकराचार्य का जन्मस्थान) की खोज की थी। वे आधुनिक समय के सबसे प्रभावशाली अद्वैत आचार्यों में से एक माने जाते हैं।