Sri Tripurasundari Dvadashashloki Stuti – श्रीत्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः

श्रीत्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः का परिचय (Introduction)
श्रीत्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः (Sri Tripurasundari Dvadashashloki Stuti) शाक्त तंत्र का एक अत्यंत दुर्लभ और पारलौकिक स्तोत्र है। 'द्वादश श्लोकी' का अर्थ है १२ श्लोकों का समूह (१३वां श्लोक फलश्रुति है)। यह स्तोत्र सामान्य स्तुतियों से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि इसमें देवी राजराजेश्वरी ललिता त्रिपुरसुन्दरी की वंदना किसी भौतिक रूप में नहीं, बल्कि 'शब्द ब्रह्म' (Sabda Brahman) और 'मातृका' (Matrika) के रूप में की गई है। तंत्र शास्त्र में संस्कृत वर्णमाला के 'अ' से लेकर 'क्ष' तक के ५० अक्षरों को 'मातृका' कहा जाता है। यही अक्षर संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कारण और सभी मंत्रों के आधार हैं।
स्तोत्र का प्रथम श्लोक ही इसके ब्रह्मांडीय विस्तार को स्पष्ट कर देता है— "गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशिरूपिणीम्"। इसका अर्थ है कि देवी त्रिपुरसुन्दरी ही साक्षात भगवान गणेश (विघ्नहर्ता), ९ ग्रह (सूर्य, चंद्र आदि), २७ नक्षत्र, ६४ योगिनियां और १२ राशियां (मेष, वृषभ आदि) हैं। वे 'मन्त्रमयी' हैं और 'मातृका-पीठ-रूपिणी' (अक्षरों के शक्तिपीठ का स्वरूप) हैं। ज्योतिष शास्त्र और तंत्र शास्त्र का यह अद्भुत समन्वय इस स्तोत्र को अद्वितीय बनाता है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि हमारा समय (काल) और अंतरिक्ष (ग्रह-नक्षत्र) सब देवी के अक्षरों से ही बंधे हुए हैं।
श्लोक ३ में इन मातृका अक्षरों की प्रचंड शक्ति का वर्णन किया गया है। साधक कहता है कि— "यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पर्द्धते नरः" अर्थात् हे देवी! आपकी वर्णमाला (मंत्र) का यदि केवल एक अक्षर (Single Syllable) भी सिद्ध हो जाए, तो वह साधारण मनुष्य भी सूर्य, गरुड़ (ताक्ष्य), चंद्रमा, कामदेव (कन्दर्प), भगवान शिव (शंकर), अग्नि (अनल) और भगवान विष्णु के साथ स्पर्धा करने लगता है, अर्थात् उनके समान तेजस्वी और शक्तिशाली हो जाता है। यह पंक्ति मंत्र-दीक्षा और जप की अपार महिमा को प्रमाणित करती है।
श्लोक ९ देवी की अज्ञेयता (Incomprehensibility) को दर्शाता है— "केयं कस्मात्क्व केनेति" (यह देवी कौन हैं? कहाँ से आई हैं? कैसी हैं?)। साधक कहता है कि देवी के वास्तविक सगुण और निर्गुण (सरूपारूप) स्वरूप को बड़े-बड़े देवता भी लेशमात्र (मनागपि) नहीं जान पाते। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत और श्री विद्या तंत्र का एक ऐसा संगम है जो साधक को अक्षरों के नाद से होते हुए सीधे परम शून्य (ब्रह्म) तक ले जाता है।
स्तोत्र का तांत्रिक महत्व और न्यास (Significance & Nyasa)
यह स्तोत्र 'मातृका न्यास' (Matrika Nyasa) के रहस्य को उजागर करता है। न्यास तंत्र साधना की वह प्रक्रिया है जिसमें साधक मंत्र के अक्षरों को अपने शरीर के विभिन्न अंगों में स्थापित करता है, जिससे उसका भौतिक शरीर एक 'देव-शरीर' में परिवर्तित हो जाता है।
श्लोक ७ में संस्कृत वर्णमाला के आठ वर्गों का उल्लेख है— "अ-क-च-ट-त-प-य-श अक्षर वर्गिणीम्" (स्वर वर्ग, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग, और शवर्ग)। अगली ही पंक्ति में बताया गया है कि ये ८ वर्ग देवी (और साधक) के शरीर में कहाँ निवास करते हैं— "ज्येष्ठाङ्ग-बाहु-हृत्-कण्ठ-कटि-पाद निवासिनीम्" (मस्तक/ज्येष्ठांग, दोनों भुजाएं, हृदय, कंठ, कमर और पैरों में)। इस रहस्य को जानकर जब साधक ध्यान करता है, तो उसका पूरा शरीर श्रीचक्र बन जाता है।
श्लोक १० में 'क्ष' (Ksha) अक्षर की महिमा है— "वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम्"। 'क्ष' वर्णमाला का अंतिम अक्षर है, जो प्रलय और विलय का प्रतीक है। जो कभी क्षय (नष्ट) नहीं होता, वही 'अक्षय्य' है। देवी 'क्ष' कार के रूप में उस परम अवस्था को दर्शाती हैं जहाँ पूरी सृष्टि और सारे अक्षर विलीन हो जाते हैं। श्लोक १२ में "चतुराज्ञाकोशभूतां" (चार आज्ञा कोशों वाली) कहकर देवी को ४ वाक् अवस्थाओं—परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी—का उद्गम माना गया है।
फलश्रुति और स्तोत्र के लाभ (Benefits from Phalasruti)
इस स्तोत्र का अंतिम (१३वां) श्लोक इसकी फलश्रुति है। जो साधक इस 'द्वादशश्लोकी' का भक्ति और ज्ञानपूर्वक पाठ करता है, उसे निम्नलिखित सिद्धियां प्राप्त होती हैं:
- सर्वसिद्धि की प्राप्ति: श्लोक १३ स्पष्ट रूप से घोषणा करता है— "स्तवनं सर्वसिद्धिकृत्" (यह १२ श्लोकों का स्तवन सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है)। अष्ट-सिद्धियां (अणिमा, गरिमा आदि) और लौकिक सफलताएं इसके पाठ से स्वतः प्राप्त होती हैं।
- काल और मृत्यु के भय का नाश: श्लोक २ के अनुसार, यह स्तोत्र 'काल' (मृत्यु और समय) के विनाशकारी प्रभावों को नष्ट करता है और साधक को अकाल मृत्यु व रोगों से बचाता है।
- नवग्रह और वास्तु दोष शांति: प्रथम श्लोक में देवी को ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों का स्वरूप बताया गया है। अतः इसका पाठ करने से कुंडली के सभी ग्रह दोष (Graha Dosha) शांत हो जाते हैं और ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती है।
- तेज और ओज में वृद्धि: श्लोक ३ के अनुसार, साधक के भीतर सूर्य, अग्नि और शंकर के समान दिव्य तेज उत्पन्न हो जाता है। समाज में उसका मान-सम्मान और आकर्षण (कामदेव के समान) बढ़ता है।
- वाक्-सिद्धि: चूँकि यह स्तोत्र मातृकाओं (अक्षरों) को समर्पित है, इसलिए इसके पाठ से साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है (जो वह कहता है, वह सत्य होने लगता है) और उसमें अद्भुत कवित्व शक्ति आती है।
पाठ विधि और नियम (Ritual Method for Chanting)
यह 'द्वादशश्लोकी स्तुति' अत्यंत तीव्र और ऊर्जावान है। इसका पाठ करते समय अक्षरों (नाद) की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
- पाठ का समय: ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकाल (गोधूलि वेला) इसके पाठ के लिए सर्वोत्तम हैं। विशेष रूप से शुक्रवार, अष्टमी या नवमी तिथि को इसका पाठ अत्यधिक फलदायी होता है।
- आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन या ऊनी आसन पर बैठें।
- ध्यान और संकल्प: पाठ आरंभ करने से पहले भगवान गणेश (जैसा कि श्लोक १ में उल्लेख है) और अपने गुरु का स्मरण करें। देवी को ५० अक्षरों की माला (अक्षमाला) धारण किए हुए प्रकाश-स्वरूप में अपने हृदय में ध्यान करें।
- ध्वनि और नाद: इस स्तोत्र का पाठ मानसिक (चुपचाप) करने के बजाय हल्के स्वर (उपांशु) या सस्वर करना चाहिए, ताकि मातृकाओं की ध्वनि-तरंगें आपके शरीर और वातावरण को शुद्ध कर सकें।
- समर्पण: १२ श्लोकों का पाठ पूरा होने पर (१३वें फलश्रुति श्लोक के बाद), माता को प्रणाम करते हुए अपनी संपूर्ण वाणी और कर्मों को उनके श्रीचरणों में समर्पित कर दें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)