Sri Shiva Stuti – श्री शिव स्तुतिः

स्फुटं स्फटिकसप्रभं स्फुटितहारकश्रीजटं
शशाङ्कदलशेखरं कपिलफुल्लनेत्रत्रयम् ।
तरक्षुवरकृत्तिमद्भुजगभूषणं भूतिम-
त्कदा नु शितिकण्ठ ते वपुरवेक्षते वीक्षणम् ॥ १ ॥
त्रिलोचन विलोचने लसति ते ललामायिते
स्मरो नियमघस्मरो नियमिनामभूद्भस्मसात् ।
स्वभक्तिलतया वशीकृतपती सतीयं सती
स्वभक्तवशतो भवानपि वशी प्रसीद प्रभो ॥ २ ॥
महेश महितोऽसि तत्पुरुष पूरुषाग्र्यो भवा-
नघोररिपुघोर तेऽनवम वामदेवाञ्जलिः ।
नमस्सपदि जात ते त्वमिति पञ्चरूपोचित-
प्रपञ्चचयपञ्चवृन्मम मनस्तमस्ताडय ॥ ३ ॥
रसाघनरसानलानिलवियद्विवस्वद्विधु-
प्रयष्टृषु निविष्टमित्यज भजामि मूर्त्यष्टकम् ।
प्रशान्तमुत भीषणं भुवनमोहनं चेत्यहो
वपूंषि गुणभूषितेहमहमात्मनोऽहं भिदे ॥ ४ ॥
विमुक्तिपरमाध्वनां तव षडध्वनामास्पदं
पदं निगमवेदिनो जगति वामदेवादयः ।
कथञ्चिदुपशिक्षिता भगवतैव संविद्रते
वयं तु विरलान्तराः कथमुमेश तन्मन्महे ॥ ५ ॥
कठोरितकुठारया ललितशूलया वाहया
रणड्डमरुणा स्फुरद्धरिणया सखट्वाङ्गया ।
चलाभिरचलाभिरप्यगणिताभिरुन्मृत्यत-
श्चतुर्दश जगन्ति ते जयजयेत्ययुर्विस्मयम् ॥ ६ ॥
पुरा त्रिपुररन्धनं विविधदैत्यविध्वंसनं
पराक्रमपरम्परा अपि परा न ते विस्मयः ।
अमर्षिबलहर्षितक्षुभितवृत्तनेत्रोज्ज्वल-
ज्ज्वलज्ज्वलनहेलया शलभितं हि लोकत्रयम् ॥ ७ ॥
सहस्रनयनो गुहस्सहसहस्ररश्मिर्विधुः
बृहस्पतिरुताप्पतिस्ससुरसिद्धविद्याधराः ।
भवत्पदपरायणाश्श्रियमिमां ययुः प्रार्थितां
भवान् सुरतरुर्भृशं शिव शिवां शिवावल्लभाम् ॥ ८ ॥
तव प्रियतमादतिप्रियतमं सदैवान्तरं
पयस्युपहितं घृतं स्वयमिव श्रियो वल्लभम् ।
विबुद्ध्य लघुबुद्धयस्स्वपरपक्षलक्ष्यायितं
पठन्ति हि लुठन्ति ते शठहृदश्शुचा शुण्ठिताः ॥ ९ ॥
निवासनिलयाचिता तव शिरस्ततिर्मालिका
कपालमपि ते करे त्वमशिवोऽस्यनन्तर्धियाम् ।
तथापि भवतः पदं शिवशिवेत्यदो जल्पता-
मकिञ्चन न किञ्चन वृजिनमस्ति भस्मी भवेत् ॥ १० ॥
त्वमेव किल कामधुक्सकलकाममापूरयन्
सदा त्रिनयनो भवान्वहसि चात्रिनेत्रोद्भवम् ।
विषं विषधरान्दधत्पिबसि तेन चानन्दवा-
न्निरुद्धचरितोचिता जगदधीश ते भिक्षुता ॥ ११ ॥
नमः शिवशिवा शिवाशिव शिवार्थ कृन्ताशिवं
नमो हरहरा हराहर हरान्तरीं मे दृशम् ।
नमो भवभवा भवप्रभवभूतये मे भवा-
न्नमो मृड नमो नमो नम उमेश तुभ्यं नमः ॥ १२ ॥
सतां श्रवणपद्धतिं सरतु सन्नतोक्तेत्यसौ
शिवस्य करुणाङ्कुरात्प्रतिकृतात्मदा सोचिता ।
इति प्रथितमानसो व्यथित नाम नारायणः
शिवस्तुतिमिमां शिवां लिकुचिसूरिसूनुस्सुधीः ॥ १३ ॥
इति श्रीलिकुचिसूरिसूनु नारायणाचार्यविरचिता श्री शिवस्तुतिः ।
इतर पश्यतु ।
श्री शिव स्तुतिः - परिचय
श्री शिव स्तुतिः भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। भक्तजन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं।
पाठ के लाभ (Benefits)
- मानसिक शांति: तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है और मन स्थिर होता है।
- विघ्न नाश: जीवन आने वाली बाधाएं भगवान शिव की कृपा से दूर होती हैं।
- समृद्धि: घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
- भक्ति: भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा दृढ़ होती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्या समय (प्रदोष काल) सर्वोत्तम है।
- शुद्धि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- आसन: पूजा कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ध्यान: भगवान शिव के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री शिव स्तुतिः का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, विशेषकर सोमवार और मासिक शिवरात्रि के दिन इसका महत्व अधिक है।
2. क्या संस्कृत न जानने वाले भी पाठ कर सकते हैं?
हाँ, आप हिंदी अर्थ समझकर या श्रवण (सुनकर) भी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। भाव मुख्य है।
3. श्री शिव स्तुतिः के पाठ से क्या फल मिलता है?
इसके नियमित पाठ से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, भय का नाश होता है और जीवन में शांति आती है।