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Sri Ranganatha Ashtottara Shatanama Stotram – श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Ranganatha Ashtottara Shatanama Stotram – श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीरङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य वेदव्यासो भगवानृषिः अनुष्टुप्छन्दः भगवान् श्रीमहाविष्णुर्देवता, श्रीरङ्गशायीति बीजं श्रीकान्त इति शक्तिः श्रीप्रद इति कीलकं मम समस्तपापनाशार्थे श्रीरङ्गराजप्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । धौम्य उवाच । श्रीरङ्गशायी श्रीकान्तः श्रीप्रदः श्रितवत्सलः । अनन्तो माधवो जेता जगन्नाथो जगद्गुरुः ॥ १ ॥ सुरवर्यः सुराराध्यः सुरराजानुजः प्रभुः । हरिर्हतारिर्विश्वेशः शाश्वतः शम्भुरव्ययः ॥ २ ॥ भक्तार्तिभञ्जनो वाग्मी वीरो विख्यातकीर्तिमान् । भास्करः शास्त्रतत्त्वज्ञो दैत्यशास्ताऽमरेश्वरः ॥ ३ ॥ नारायणो नरहरिर्नीरजाक्षो नरप्रियः । ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्माङ्गो ब्रह्मपूजितः ॥ ४ ॥ कृष्णः कृतज्ञो गोविन्दो हृषीकेशोऽघनाशनः । विष्णुर्जिष्णुर्जितारातिः सज्जनप्रिय ईश्वरः ॥ ५ ॥ त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशः त्रय्यर्थस्त्रिगुणात्मकः । काकुत्स्थः कमलाकान्तः कालीयोरगमर्दनः ॥ ६ ॥ कालाम्बुदश्यामलाङ्गः केशवः क्लेशनाशनः । केशिप्रभञ्जनः कान्तो नन्दसूनुररिन्दमः ॥ ७ ॥ रुक्मिण्यावल्लभः शौरिर्बलभद्रो बलानुजः । दामोदरो हृषीकेशो वामनो मधुसूदनः ॥ ८ ॥ पूतः पुण्यजनध्वंसी पुण्यश्लोकशिखामणिः । आदिमूर्तिर्दयामूर्तिः शान्तमूर्तिरमूर्तिमान् ॥ ९ ॥ परम्ब्रह्म परन्धाम पावनः पवनो विभुः । चन्द्रश्छन्दोमयो रामः संसाराम्बुधितारकः ॥ १० ॥ आदितेयोऽच्युतो भानुः शङ्करश्शिव ऊर्जितः । महेश्वरो महायोगी महाशक्तिर्महत्प्रियः ॥ ११ ॥ दुर्जनध्वंसकोऽशेषसज्जनोपास्तसत्फलम् । पक्षीन्द्रवाहनोऽक्षोभ्यः क्षीराब्धिशयनो विधुः ॥ १२ ॥ जनार्दनो जगद्धेतुर्जितमन्मथविग्रहः । चक्रपाणिः शङ्खधारी शार्ङ्गी खड्गी गदाधरः ॥ १३ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ एवं विष्णोश्शतं नाम्नामष्टोत्तरमिहेरितम् । स्तोत्राणामुत्तमं गुह्यं नामरत्नस्तवाभिधम् ॥ १४ ॥ सर्वदा सर्वरोगघ्नं चिन्तितार्थफलप्रदम् । त्वं तु शीघ्रं महाराज गच्छ रङ्गस्थलं शुभम् ॥ १५ ॥ स्नात्वा तुलार्के कावेर्यां माहात्म्य श्रवणं कुरु । गवाश्ववस्त्रधान्यान्नभूमिकन्याप्रदो भव ॥ १६ ॥ द्वादश्यां पायसान्नेन सहस्रं दश भोजय । नामरत्नस्तवाख्येन विष्णोरष्टशतेन च । स्तुत्वा श्रीरङ्गनाथं त्वमभीष्टफलमाप्नुहि ॥ १७ ॥ ॥ इति तुलाकावेरीमाहात्म्ये शन्तनुं प्रति धौम्योपदिष्ट श्रीरङ्गनाथाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: एक दिव्य परिचय (Introduction)

श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Ranganatha Ashtottara Shatanama Stotram) भगवान विष्णु के सर्वाधिक प्रिय और वैभवशाली स्वरूप, भगवान श्री रङ्गनाथ को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र प्राचीन ग्रंथ 'तुलाकावेरी माहात्म्य' (Tula Kaveri Mahatmya) से उद्धृत है। यह महर्षि धौम्य और राजा शान्तनु के बीच हुए पावन संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। श्रीरङ्गनाथ, जिन्हें 'रङ्गराज' भी कहा जाता है, दक्षिण भारत के विख्यात 'श्रीरङ्गम्' (Srirangam) क्षेत्र के अधिष्ठाता देव हैं, जिसे 'भूलोक वैकुण्ठ' (Earthly Vaikuntha) की संज्ञा दी गई है।

इस स्तोत्र की रचना का मुख्य उद्देश्य साधक के जीवन से 'अज्ञान' और 'पाप' के अंधकार को मिटाकर उसे 'ईश्वरीय कृपा' के प्रकाश में लाना है। रङ्गनाथ स्वामी का स्वरूप 'अनन्त शयन' (शेषनाग पर लेटे हुए) का है, जो ब्रह्मांड की स्थिरता और शांति का प्रतीक है। स्तोत्र के प्रथम श्लोक में उन्हें "श्रीरङ्गशायी श्रीकान्तः" कहकर संबोधित किया गया है, जो उनकी लक्ष्मीपति और रङ्ग-भूमि (संसार) के स्वामी होने की पुष्टि करता है। यह पाठ न केवल भगवान विष्णु के १०८ नामों का संग्रह है, बल्कि यह श्रीरङ्गराज की अनन्य शरणागति (Prapatti) का महामंत्र है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्तोत्र का उद्भव तुला मास (अक्टूबर-नवंबर) के दौरान कावेरी नदी के माहात्म्य के संदर्भ में हुआ था। ऋषि धौम्य ने राजा शान्तनु को उपदेश दिया था कि जो मनुष्य कावेरी स्नान के उपरांत इन १०८ नामों का पाठ करता है, वह संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है जैसे कावेरी का जल सागर में मिलकर एकाकार हो जाता है। यह स्तोत्र भक्ति मार्ग के पथिकों के लिए एक 'नाम-रत्न' के समान है, जो हृदय को शुद्ध कर प्रभु के चरणों में प्रीति बढ़ाता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं तुलाकावेरी प्रसंग (Significance)

रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनाम का आध्यात्मिक महत्व इसके 'नाम-रत्न' स्वरूप में निहित है। श्लोक १४ में इसे "नामरत्नस्तवाभिधम्" कहा गया है, अर्थात् नामों का रत्न-मय स्तवन। श्री वैष्णव संप्रदाय (विशिष्टाद्वैत) में इस स्तोत्र का पाठ 'नित्य-कर्म' के समान माना गया है।

  • विश्वरूप एवं अभेद दर्शन: स्तोत्र में भगवान को 'शङ्कर' और 'शम्भु' (श्लोक २ और ११) भी कहा गया है, जो हरि और हर (विष्णु और शिव) की एकता का प्रतीक है। यह साधक के भीतर से संप्रदायवाद के भेदभाव को मिटाकर परम सत्य का बोध कराता है।
  • तुलाकावेरी माहात्म्य: तुला मास में कावेरी नदी का जल 'गंगा' के समान पवित्र माना जाता है। श्लोक १६ के अनुसार, इस पवित्र समय में स्तोत्र का श्रवण और दान (गौ, अश्व, अन्न) करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • क्लेश नाशन: भगवान रङ्गनाथ को 'क्लेशनाशन' और 'भक्तार्तिभञ्जन' (भक्तों के दुखों को तोड़ने वाला) कहा गया है। यह स्तोत्र मानसिक अवसाद और जीवन की जटिलताओं को सुलझाने में तांत्रिक शक्ति रखता है।

इस स्तोत्र का दार्शनिक आधार यह है कि भगवान रङ्गनाथ ही 'जगद्गुरु' और 'जगत-हेतु' (संसार का कारण) हैं। उनके नामों का संकीर्तन चित्त की उन परतों को खोलता है जो माया के कारण ढकी हुई हैं। 'पक्षीन्द्रवाहन' (गरुड़ वाहन) प्रभु का स्मरण साधक को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाता है।

फलश्रुति: रङ्गनाथ १०८ नाम पाठ के अमोघ लाभ (Benefits)

तुलाकावेरी माहात्म्य के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित दिव्य फल प्राप्त होते हैं:

  • समस्त रोगों का नाश: "सर्वदा सर्वरोगघ्नं" — यह स्तोत्र शारीरिक व्याधियों और असाध्य रोगों में मानसिक बल और आरोग्य प्रदान करता है।
  • मनोकामना पूर्ति: 'चिन्तितार्थफलप्रदम्' — साधक जिस भी श्रेष्ठ लक्ष्य या फल का चिंतन कर पाठ करता है, श्रीरङ्गराज उसे तत्काल सिद्ध करते हैं।
  • पाप मुक्ति और शुद्धि: 'समस्तपापनाशार्थे' — जानकर या अनजाने में किए गए जघन्य पापों का इस नाम-रत्न स्तवन से क्षय हो जाता है।
  • विजय और सौभाग्य: जो व्यक्ति नित्य प्रातः उठकर इसका पाठ करता है, वह समाज और कर्मक्षेत्र में 'सर्वदा विजयी' होता है (श्लोक १४-१७)।
  • मोक्ष की प्राप्ति: रङ्गनाथ स्वामी 'संसाराम्बुधितारक' (संसार सागर से तारने वाले) हैं। अंततः साधक को प्रभु के परम पद की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना अनुष्ठान (Ritual Method)

भगवान श्रीरङ्गनाथ की साधना सात्विकता और अटूट विश्वास की मांग करती है। पूर्ण लाभ हेतु निम्नलिखित विधि का पालन करें:

१. श्रेष्ठ समय और स्थान:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त सर्वोत्तम है। यदि संभव हो, तो तुला मास (अश्विन-कार्तिक) में कावेरी या किसी पवित्र नदी के तट पर बैठकर पाठ करना अनंत फलदायी है। श्रीरङ्गम् क्षेत्र में इसका पाठ साक्षात् दर्शन के तुल्य है।

२. शुद्धि एवं वस्त्र:

स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। कुशा के आसन या ऊनी आसन का प्रयोग करें।

३. पूजन एवं अर्पण:

सामने भगवान रङ्गनाथ की शेषशायी प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं। प्रभु को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) और सुगंधित पुष्प अर्पित करें।

४. विशेष द्वादशी विधान:

श्लोक १७ के अनुसार, शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखकर द्वादशी के दिन 'पायसान्न' (खीर) का भोग लगाएं और संभव हो तो ब्राह्मणों/भक्तों को भोजन कराएं। यह विधि 'नामरत्न' को सिद्ध करने वाली मानी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री रङ्गनाथ अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'तुलाकावेरी माहात्म्य' के अन्तर्गत आता है, जहाँ महर्षि धौम्य ने राजा शान्तनु को भगवान रङ्गनाथ के प्रभाव के बारे में बताया था।

2. 'रङ्गनाथ' का अर्थ क्या है?

'रङ्ग' का अर्थ है वह रंग-मंच जहाँ जीवन की लीला होती है (संसार), और 'नाथ' का अर्थ है स्वामी। अर्थात् वह परमात्मा जो इस संपूर्ण विश्व-रूपी लीला का सूत्रधार है।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ घर पर किया जा सकता है?

हाँ, घर के पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने इसका पाठ करना पूर्णतः फलदायी है। इससे घर की नकारात्मकता दूर होती है।

4. क्या महिलाएं रङ्गनाथ स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। महिलाएं पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने परिवार के कल्याण के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।

5. 'तुला मास' में इस पाठ का क्या विशेष महत्व है?

तुला मास में कावेरी नदी में स्नान करने के बाद इस स्तोत्र का पाठ करने से 'अश्वमेध यज्ञ' के समान फल प्राप्त होता है और दरिद्रता का नाश होता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान विष्णु की साधना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। स्तोत्र पाठ मात्र के लिए माला की आवश्यकता नहीं है, परंतु एकाग्रता हेतु इसका प्रयोग करें।

7. क्या बिना संस्कृत जाने लाभ मिल सकता है?

हाँ, भगवान भाव के भूखे हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक सुनने से भी पूर्ण फल प्राप्त होता है।

8. 'पक्षीन्द्रवाहन' शब्द का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "पक्षियों के राजा (गरुड़) जिनका वाहन है"। गरुड़ वेदों के प्रतीक हैं, अतः यह नाम भगवान की वेदमयी शक्ति को दर्शाता है।

9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है?

जी हाँ, भगवान रङ्गनाथ 'अच्युत' और 'मृत्युंजय' के समान रक्षक हैं। उनके नामों का स्मरण जीव को काल के भय से मुक्त कर अभय प्रदान करता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की निष्ठा और निरंतरता पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक नित्य पाठ करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और मानसिक शांति का अनुभव होने लगता है।