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Sri Rama Krishna Ashtottara Shatanama Stotram – श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Rama Krishna Ashtottara Shatanama Stotram – श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ श्रीरामचन्द्रश्रीकृष्ण सूर्यचन्द्रकुलोद्भवौ । कौसल्यादेवकीपुत्रौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १ ॥ दिव्यरूपौ दशरथवसुदेवात्मसम्भवौ । जानकीरुक्मिणीकान्तौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २ ॥ आयोध्याद्वारकाधीशौ श्रीमद्राघवयादवौ । श्रीकाकुत्स्थेन्द्रराजेन्द्रौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३ ॥ शान्तासुभद्रासोदर्यौ सौमित्रीगदपूर्वजौ । त्रेताद्वापरसम्भूतौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ४ ॥ विलम्बिविश्वावसुजौ सौम्यदक्षायणोद्भवौ । वसन्तवर्षऋतुजौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ५ ॥ चैत्रश्रावणसम्भूतौ मेषसिंहाख्यमासजौ । सितासितदलोद्भूतौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ६ ॥ नवमीस्वष्टमीजातौ सौम्यवासरसम्भवौ । अदितिब्रह्मताराजौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ७ ॥ मध्याह्नार्धनिशोत्पन्नौ कुलीरवृषलग्नजौ । द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ८ ॥ दूर्वादलघनश्यामौ द्विचतुर्बाहुसम्भवौ । कोदण्डचक्रहस्ताब्जौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ९ ॥ वशिष्ठगार्ग्यसचिवौ सिद्धार्थोद्धवमन्त्रिणौ । गाधेयसान्दीपिशिष्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १० ॥ लवप्रद्युम्नजनकौ कुशसाम्बसितान्वितौ । हनुमद्गरुडारूढौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ११ ॥ ताटकापूतनाराति खरकंसशिरोहरौ । काककालीयदर्पघ्नौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १२ ॥ कबन्धनरकाराती विराधमुरमर्दनौ । दशास्यशिशुपालघ्नौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १३ ॥ अहल्यानृपशापघ्नौ शिवकंसधनुर्भिदौ । लीलामानुषरूपाढ्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १४ ॥ दण्डकारण्यसञ्चारी बृन्दावनविहारिणौ । एकाऽनेककलत्राढ्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १५ ॥ शबरी द्रौपदीपूज्यौ जटायुर्भीष्ममुक्तिदौ । मुनिपाण्डवसंरक्षौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १६ ॥ जामदग्न्याहङ्कृतिघ्न बाणासुरमदापहौ । जयान्वितौ जगत्पूज्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १७ ॥ पितृवाक्यैकनिरतौ पितृबन्धविमोचकौ । चीरपीताम्बरधरौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १८ ॥ सुमन्त्रदारुकाभिख्यौ सारथीजगदीश्वरौ । गुहपार्थप्रियसखौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ १९ ॥ परन्तपौ शूर्पणखारुक्मिवैरूप्यकारिणौ । जम्बूकशङ्खचूडघ्नौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २० ॥ समुद्रसेतुनिर्मातृ समुद्रकृतपत्तनौ । महासत्वमहामायौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २१ ॥ वीरौ विश्वामित्रधर्मयज्ञरक्षणतत्परौ । दृढव्रतौ सुचरितौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २२ ॥ त्रिजटाख्य कुचेलाख्य द्विजदारिद्र्यहारिणौ । योगिध्येयपदाम्भोजौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २३ ॥ महात्मानौ सप्ततालयमलार्जुनभञ्जनौ । मारुताक्रूरवरदौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २४ ॥ शिवोपदिष्टगीतार्थ पार्थगीतोपदेशकौ । वार्धीश शक्रमानघ्नौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २५ ॥ देवदेवौ कुम्भकर्ण दन्तवक्त्रनिषूदनौ । वालिपौण्ड्रकहन्तारौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २६ ॥ दूषणत्रिशिरोहन्तृ साल्वाघासुरसूदनौ । मारीच शकटध्वंसौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २७ ॥ सुग्रीवेष्ट जरासन्ध तनयेप्सितराज्यदौ । सत्यवाक् सत्यसङ्कल्पौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २८ ॥ विभीषणाभयश्रीद भगदत्ताऽभयप्रदौ । जटाजूटकिरीटाद्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ २९ ॥ चित्रकूटाचलावासि रैवताचललोलुपौ । सर्वभूतहृदावासौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३० ॥ शरभङ्गोत्तमपद मुचुकुन्दवरप्रदौ । सच्चिदानन्दरूपाढ्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३१ ॥ ऋक्षवानरसेनाढ्य वृष्टियादवसैनिकौ । परात्परौ जितामित्रौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३२ ॥ ऋषिसङ्घकृतातिथ्य मुनिपत्न्यर्पितोदनौ । निरमयौ निरातङ्कौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३३ ॥ धराधरविनिर्भेत्तृ गोवर्धनधरोद्धरौ । सुबाहु शतधन्वघ्नौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३४ ॥ दशास्यान्वयसंहर्तृ दुर्योधनकुलान्तकौ । सर्वभूतहितोद्युक्तौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३५ ॥ मृतशाखामृगोज्जीवि मृतगोगोपजीवकौ । ब्रह्मेन्द्रादिस्तुतिप्रीतौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३६ ॥ शिवलिङ्गप्रतिष्ठातृ कृतकैलासयात्रकौ । निरञ्जनौ निष्कलङ्कौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३७ ॥ मृतद्विजसुतोज्जीवि विनष्ट गुरुपुत्रदौ । निर्ममौ निरहङ्कारौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३८ ॥ सरयू यमुनातीर विहारासक्तमानसौ । वाल्मीकिव्याससंस्तुत्यौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ३९ ॥ भूमीशार्चितपादाब्ज भूभारपरिहारकौ । धर्मसंस्थापनोद्युक्तौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ४० ॥ राजराजप्रीतिकर राजेन्द्रान्वयपालकौ । सर्वाभीष्टप्रदातारौ रामकृष्णौ गतिर्मम ॥ ४१ ॥ ॥ इति श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: एक अनूठी आध्यात्मिक यात्रा

श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Rama Krishna Ashtottara Shatanama Stotram) सनातन धर्म का एक अत्यंत दुर्लभ और विलक्षण पाठ है। जहाँ सामान्यतः अष्टोत्तरशतनाम (१०८ नाम) किसी एक देवता को समर्पित होते हैं, वहीं यह स्तोत्र भगवान विष्णु के दो महानतम अवतारों — मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और लीला पुरुषोत्तम श्री कृष्ण की दिव्य एकता का गान करता है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति त्रेता युग के नायक राम और द्वापर युग के नायक कृष्ण के बीच अद्भुत समांतरता (Parallelism) स्थापित करती है। यह पाठ हमें यह बोध कराता है कि भले ही युग, परिस्थितियाँ और लीलाएँ अलग हों, लेकिन तत्व रूप में दोनों एक ही 'विष्णु' हैं।

इस स्तोत्र की रचना शैली अत्यंत प्रभावशाली है। प्रत्येक श्लोक का अंत 'रामकृष्णौ गतिर्मम' (राम और कृष्ण ही मेरी गति/आश्रय हैं) के साथ होता है। यह साधक के मन में अद्वैत भाव जाग्रत करता है। उदाहरण के लिए, प्रथम श्लोक में ही उन्हें सूर्यवंश (राम) और चंद्रवंश (कृष्ण) का भूषण बताया गया है। श्लोक ९ में उनके शस्त्रों की तुलना है — जहाँ राम के हाथ में कोदण्ड धनुष है, वहीं कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र है। यह स्तोत्र केवल नामोच्चारण नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण रामायण और महाभारत का काव्यात्मक सार है।

आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, राम और कृष्ण के नामों का संयुक्त जप 'परम शांति' प्रदायक माना जाता है। श्री रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों ने भी ईश्वर के इन विभिन्न रूपों की एकता पर बल दिया है। इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को न केवल मानसिक बल मिलता है, बल्कि उसके जीवन के सभी द्वंद्व (Dualities) समाप्त हो जाते हैं। यह उन भक्तों के लिए एक वरदान है जो राम और कृष्ण दोनों के प्रति समान श्रद्धा रखते हैं और उनके बीच के तात्विक संबंध को समझना चाहते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व (Significance)

श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम का महत्व इसके दार्शनिक विश्लेषण में छिपा है। यह स्तोत्र 'अवतारवाद' के विज्ञान को स्पष्ट करता है। इसके प्रमुख अंगों को समझना आवश्यक है:

  • ऐतिहासिक सामंजस्य: श्लोक १० में उनके गुरुओं (वशिष्ठ और सांदीपनि) और श्लोक १४ में उनके द्वारा तोड़े गए धनुषों (शिव धनुष और कंस का धनुष) की तुलना की गई है। यह दर्शाता है कि अवतार चाहे किसी भी रूप में हो, उनके जीवन का उद्देश्य धर्म की स्थापना ही होता है।
  • विश्वरूप और शरणागति: श्लोक १६ में शबरी और द्रौपदी, जटायु और भीष्म का उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि प्रभु अपने भक्तों के उद्धार के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, चाहे वह त्रेता हो या द्वापर।
  • बीज मन्त्रों का प्रभाव: यद्यपि यह एक स्तोत्र है, लेकिन इसके नामों का निरंतर जप मन्त्र के समान ऊर्जा उत्पन्न करता है। 'रामकृष्ण' का संयुक्त उच्चारण हृदय चक्र को सक्रिय करता है और प्रेम व वीरता का संतुलन बनाता है।
  • द्वंद्व मुक्ति: राम अनुशासन और मर्यादा के प्रतीक हैं, जबकि कृष्ण आनंद और स्वतंत्रता के। इन दोनों का साथ में स्मरण करने से साधक के व्यक्तित्व में अनुशासन और प्रसन्नता का सही संतुलन विकसित होता है।

फलश्रुति: श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम के लाभ (Benefits)

इस दिव्य स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं:

  • मानसिक शांति और आनंद: 'राम' नाम शांति देता है और 'कृष्ण' नाम आनंद। इस संयुक्त पाठ से अवसाद (Depression) और मानसिक तनाव जड़ से समाप्त हो जाता है।
  • पाप मुक्ति: 'रामकृष्णौ गतिर्मम' के घोष से संचित पापों का क्षय होता है और अंतःकरण शुद्ध होता है।
  • शत्रु और बाधा विजय: श्लोक १२ और १३ में वर्णित असुरों के वध का स्मरण करने से जीवन की सभी बाधाएं और गुप्त शत्रु परास्त होते हैं।
  • वंश और समृद्धि: 'राजराजप्रीतिकर' होने के नाते यह पाठ परिवार में सुख, समृद्धि और संतान सुख प्रदान करता है।
  • सर्व-सिद्धि: ४१ श्लोकों का यह पाठ 'सर्वाभीष्टप्रदातारौ' है, अर्थात यह सभी सात्विक मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम है।
  • मोक्ष का द्वार: भीष्म और जटायु की भांति साधक को जीवन के अंत में प्रभु के परम पद की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करने के लिए कुछ शास्त्रीय नियमों का पालन करना लाभकारी होता है:

  • सर्वोत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) या संध्या काल सूर्यास्त के समय पाठ करना सबसे अधिक ऊर्जावान होता है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान विष्णु और उनके दोनों अवतारों को अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • तुलसी का महत्व: पाठ के दौरान प्रभु के सामने तुलसी दल अवश्य रखें। बिना तुलसी के विष्णु अवतारों की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती।
  • दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं।
  • माला: यदि जप करना हो, तो तुलसी की माला का प्रयोग करें।

विशेष प्रयोग: जन्माष्टमी, राम नवमी या किसी भी एकादशी पर इस स्तोत्र का ११ या २१ बार पाठ करना विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए सिद्ध माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री रामकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य भगवान राम और कृष्ण के बीच की तात्विक एकता को समझना और उनके संयुक्त आशीर्वाद से जीवन में सुख, शांति और मोक्ष प्राप्त करना है।

2. 'रामकृष्णौ गतिर्मम' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है — "भगवान राम और भगवान कृष्ण ही मेरा एकमात्र आश्रय और लक्ष्य हैं।"

3. क्या इस स्तोत्र में रामायण और महाभारत दोनों के संदर्भ हैं?

हाँ, इसमें राम के वनवास, अहल्या उद्धार से लेकर कृष्ण के गोवर्धन धारण और गीता उपदेश तक के ऐतिहासिक संदर्भ दिए गए हैं।

4. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भक्ति मार्ग पर सबका समान अधिकार है। स्त्रियाँ अपने परिवार के कल्याण और सुख-शांति के लिए इसका पाठ अवश्य कर सकती हैं।

5. पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन कौन सा है?

प्रतिदिन पाठ करना उत्तम है, लेकिन जन्माष्टमी, राम नवमी और एकादशी के दिन इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

6. क्या इस स्तोत्र से शत्रुओं पर विजय मिलती है?

हाँ, स्तोत्र में असुरों (जैसे रावण, कंस, शिशुपाल) के संहार का वर्णन है। इनका स्मरण करने से साधक के जीवन की बाधाएं और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।

7. 'द्विचतुर्बाहुसम्भवौ' का क्या अर्थ है (श्लोक ९)?

इसका अर्थ है कि प्रभु राम द्विबाहु (दो भुजाओं वाले मनुष्य रूप) में और कृष्ण चतुर्बाहु (विष्णु के दिव्य रूप) में प्रकट हुए।

8. क्या यह स्तोत्र बच्चों की शिक्षा में मदद करता है?

हाँ, इसमें प्रभु के 'गुरुपुत्र' और 'मन्त्रिणौ' रूपों का वर्णन है। इसके पाठ से एकाग्रता बढ़ती है और सात्विक बुद्धि का विकास होता है।

9. क्या तुलसी की माला से इसका जप कर सकते हैं?

हाँ, भगवान विष्णु के दोनों अवतारों की उपासना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

10. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ा जा सकता है?

हाँ, आप हिंदी अर्थ का चिंतन करते हुए इसे पढ़ सकते हैं। प्रभु भाव देखते हैं, शब्द नहीं।