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Sri Nateshwara Bhujanga Stuti – श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः

Sri Nateshwara Bhujanga Stuti – श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः
॥ श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः ॥ लोकानाहूय सर्वान् डमरुकनिनदैर्घोरसंसारमग्नान् दत्वाभीतिं दयालुः प्रणतभयहरं कुञ्चितं वामपादम् । उद्धृत्येदं विमुक्तेरयनमिति कराद्दर्शयन् प्रत्ययार्थं बिभ्रद्वह्निं सभायां कलयति नटनं यः स पायान्नटेशः ॥ १ ॥ दिगीशादि वन्द्यं गिरीशानचापं मुराराति बाणं पुरत्रासहासम् । करीन्द्रादि चर्माम्बरं वेदवेद्यं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ २ ॥ समस्तैश्च भूतैः सदा नम्यमाद्यं समस्तैकबन्धुं मनोदूरमेकम् । अपस्मारनिघ्नं परं निर्विकारं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ३ ॥ दयालुं वरेण्यं रमानाथवन्द्यं महानन्दभूतं सदानन्दनृत्तम् । सभामध्यवासं चिदाकाशरूपं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ४ ॥ सभानाथमाद्यं निशानाथभूषं शिवावामभागं पदाम्भोज लास्यम् । कृपापाङ्गवीक्षं ह्युमापाङ्गदृश्यं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ५ ॥ दिवानाथरात्रीशवैश्वानराक्षं प्रजानाथपूज्यं सदानन्दनृत्तम् । चिदानन्दगात्रं परानन्दसौधं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ६ ॥ करेकाहलीकं पदेमौक्तिकालिं गलेकालकूटं तलेसर्वमन्त्रम् । मुखे मन्दहासं भुजे नागराजं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ७ ॥ त्वदन्यं शरण्यं न पश्यामि शम्भो मदन्यः प्रपन्नोस्ति किन्तेतिदीनः । मदर्थेह्युपेक्षा तवासीत्किमर्थं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ८ ॥ भवत्पादयुग्मं करेणावलम्बे सदा नृत्तकारिन् सभामध्यदेशे । सदा भावये त्वां तदा दास्यसीष्टं महेशं सभेशं भजेऽहं नटेशम् ॥ ९ ॥ भूयः स्वामिन् जनिर्मे मरणमपि तथा मास्तु भूयः सुराणां साम्राज्यं तच्छ तावत्सुखलवरहितं दुःखदं नार्थये त्वाम् । सन्तापघ्नं पुरारे धुरि च तवसभा मन्दिरे सर्वदा त्व- -न्नृत्तं पश्यन्वसेयं प्रमथगणवरैः साकमेतद्विधेहि ॥ १० ॥ ॥ इति श्री ज्ञानसम्बन्ध कृत श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक आधार (Introduction)

श्री नटेश्वर भुजङ्ग स्तुतिः (Sri Nateshwara Bhujanga Stuti) सनातन आध्यात्मिक परंपरा में भगवान शिव के 'नटराज' स्वरूप की सबसे लयात्मक और ओजस्वी वन्दनाओं में से एक है। इस स्तोत्र की रचना महान शैव संत श्री ज्ञानसम्बन्ध (Jnanasambandhar) द्वारा की गई है। ज्ञानसम्बन्ध मुनि दक्षिण भारत के ६३ नायनमार संतों में से एक थे, जिन्होंने मात्र ३ वर्ष की अल्पायु में ही माँ पार्वती से ज्ञान का दुग्ध प्राप्त किया था। उनकी रचनाओं में अद्वैत बोध और अनन्य भक्ति का ऐसा अद्भुत मिश्रण मिलता है जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।

भुजङ्गप्रयात छन्द का वैशिष्ट्य: 'भुजङ्ग' का अर्थ है सर्प और 'प्रयात' का अर्थ है गति। इस स्तोत्र की रचना 'भुजङ्गप्रयात' छन्द में हुई है, जिसकी लय एक लहराते हुए सर्प की गति के समान अबाध और कर्णप्रिय होती है। यह छन्द विशेष रूप से भगवान शिव के स्तोत्रों (जैसे 'शिव भुजङ्ग स्तोत्र') के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि यह डमरू की ध्वनियों और ताण्डव की गतिशीलता को प्रतिध्वनित करता है। पाठ करते समय यह छन्द साधक के भीतर एक विशेष प्रकार की ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है।

नटराज और चिदम्बरम् का रहस्य: यह स्तुति मुख्य रूप से तमिलनाडु के पावन चिदम्बरम् (Chidambaram) मन्दिर में विराजमान भगवान नटराज को समर्पित है। 'चिदम्बर' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है—'चित्' (चेतना) और 'अम्बर' (आकाश)। इसका आध्यात्मिक संदेश यह है कि भगवान शिव केवल हिमालय पर ही नहीं, बल्कि हमारे हृदय के भीतर शुद्ध चेतना के अनंत आकाश में अपना 'आनंद ताण्डव' नृत्य कर रहे हैं। प्रथम श्लोक में ही भगवान के नृत्य का दिव्य चित्रण है—वे अपने डमरू की गूंज (डमरुकनिनदैः) से संसार के दुखों में डूबे हुए प्राणियों को अज्ञान की निद्रा से जगाते हैं।

प्रतीकात्मकता और मुद्रा: स्तोत्र में नटराज की मुद्राओं का अत्यंत गहरा वर्णन है। श्लोक १ में उनके "कुञ्चित वामपादम्" (मुड़े हुए बाएं पैर) का उल्लेख है। भगवान अपना बायाँ पैर उठाकर उसे मोक्ष के मार्ग के रूप में प्रदर्शित करते हैं। उनका उठा हुआ पैर संकेत देता है कि जो भक्त माया के बंधनों से ऊपर उठना चाहते हैं, वे शिव के चरणों की शरण लें। उनके हाथों में स्थित अग्नि (वह्नि) शुद्धि और संहार का प्रतीक है, जो साधक के भीतर के अज्ञान और विकारों को भस्म कर देती है।

अपस्मार और अज्ञान का दमन: श्लोक ३ में उन्हें "अपस्मारनिघ्नं" कहा गया है। अपस्मार उस असुर का नाम है जिस पर भगवान नटराज नृत्य कर रहे हैं। तांत्रिक और दार्शनिक रूप से, अपस्मार 'अज्ञान', 'प्रमाद' (laziness) और 'विस्मृति' (भूल जाना कि हम वास्तव में कौन हैं) का प्रतीक है। शिव का उस पर नृत्य करना यह दर्शाता है कि ज्ञान (नटराज) द्वारा ही अज्ञान का दमन संभव है। यह स्तुति हमें बोध कराती है कि ईश्वर हमारी बुद्धि के जड़ता को समाप्त कर उसे प्रज्ञा (Wisdom) में बदल देते हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ मानसिक अस्थिरता और तनाव एक बड़ी चुनौती है, वहाँ नटेश्वर भुजङ्ग स्तुति का लयात्मक पाठ चित्त को असीम शांति प्रदान करता है। ज्ञानसम्बन्ध मुनि ने इस स्तोत्र के अंत में (श्लोक १०) अपनी परम इच्छा व्यक्त की है—वे न तो देवों का साम्राज्य चाहते हैं और न ही स्वर्ग के सुख, वे केवल शिव के गणों (प्रमथगणवरैः) के साथ सदैव शिव के नृत्य का दर्शन करते रहना चाहते हैं। यह 'सालोक्य' और 'सामीप्य' मुक्ति का सर्वोच्च स्तर है। १० श्लोकों की यह 'भुजङ्ग माला' वास्तव में आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक संगीतमय सेतु है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

भगवान नटेश्वर की उपासना में भुजङ्गप्रयात स्तुति का महत्व इसकी 'नाद शक्ति' में निहित है। माना जाता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति ध्वनि से हुई है और नटराज का नृत्य उसी आदि-ध्वनि (ओंकार) का प्रकटीकरण है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक के वातावरण में शिव-तत्व की ऊर्जा सघन हो जाती है।

श्लोक ७ में भगवान के स्वरूप का अद्भुत वर्णन है—वे गले में कालकूट विष, भुजाओं में नागराज और मुख पर मन्द हास धारण किए हुए हैं। यह 'विपरीत' तत्वों के सामंजस्य को दर्शाता है, जो साधक को जीवन के सुख-दुख में समभाव (Equanimity) में रहने की प्रेरणा देता है। "चिदाकाशरूपं" होने के कारण, शिव यहाँ साधक को अपनी सूक्ष्म देह को अनुभव करने की शक्ति प्रदान करते हैं।

नटेश्वर भुजङ्ग स्तुति के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

शैव आगमों और ज्ञानसम्बन्ध मुनि की परंपरा के अनुसार, इस स्तुति के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • पुनर्जन्म से मुक्ति: श्लोक १० के अनुसार—"मास्तु भूयः"—साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर शिव के सायुज्य को प्राप्त करता है।
  • भय और अज्ञान का नाश: शिव का 'कुञ्चित पाद' अज्ञान को दबाने और साधक को समस्त भयों से मुक्त करने का प्रतीक है (श्लोक १)।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: भुजङ्गप्रयात छन्द की लयात्मकता मन की चंचलता को समाप्त कर उसे शिव के ध्यान में स्थिर करती है।
  • आरोग्य एवं विशुद्धि: "भवरोगिणाम् भिषजे" (श्लोक २) के रूप में शिव संसार रूपी रोगों के महान वैद्य हैं, जो साधक को मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।
  • कलात्मक एवं बौद्धिक विकास: नटराज कला, संगीत और विद्या के अधिष्ठाता हैं। इस स्तोत्र के पाठ से रचनात्मक ऊर्जा और प्रज्ञा (Wisdom) का विकास होता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान नटराज की कृपा प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ शुद्ध अन्तःकरण और श्रद्धा के साथ करना चाहिए।

साधना के नियम

  • समय: सर्वोत्तम फल के लिए प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) या ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करें। प्रदोष के समय शिव आनंद ताण्डव करते हैं।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें। मस्तक पर भस्म (Vibhuti) का त्रिपुण्ड धारण करना शिव साधना में विशेष महत्व रखता है।
  • दिशा: उत्तर (शिव की दिशा) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: पाठ से पूर्व शिवलिंग या नटराज की मूर्ति पर जल, दूध और बिल्वपत्र अर्पित करें। घी का दीपक प्रज्वलित रखें।
  • लय: चूंकि यह स्तोत्र भुजङ्गप्रयात छन्द में है, इसे गाकर या एक निश्चित लय (Rhythm) में पढ़ना अत्यंत प्रभावशाली होता है।

विशेष अवसर

  • महाशिवरात्रि: इस महानिशा में नटेश्वर भुजङ्ग स्तुति का १०८ बार पाठ या श्रवण विशेष सिद्धियाँ प्रदान करता है।
  • सोमवार और प्रदोष व्रत: प्रत्येक सोमवार या प्रदोष तिथि को पाठ करने से आर्थिक और मानसिक बाधाएं दूर होती हैं।
  • आर्द्रा नक्षत्र: यह भगवान नटराज का जन्म नक्षत्र माना जाता है, इस दिन पाठ करना अनंत गुना फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'नटेश्वर भुजङ्ग स्तुति' के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना महान शैव संत श्री ज्ञानसम्बन्ध मुनि द्वारा की गई है, जो दक्षिण भारत के नायनमारों में प्रमुख हैं।

2. 'भुजङ्गप्रयात' छन्द का क्या महत्व है?

'भुजङ्ग' का अर्थ है सर्प। इस छन्द की गति लहराते हुए सर्प के समान होती है, जो शिव भक्ति के प्रवाह को अत्यंत मधुर और निरंतर बनाए रखती है।

3. 'चित्सभेश' का क्या अर्थ है?

'चित्' का अर्थ है चेतना और 'सभा' का अर्थ है मण्डप। चित्सभेश वह ईश्वर है जो चेतना के मण्डप (चिदम्बरम् का गर्भगृह) का स्वामी है।

4. क्या इस स्तोत्र से मोक्ष प्राप्त होता है?

हाँ, स्तोत्र के १०वें श्लोक में साधक स्पष्ट रूप से दोबारा जन्म न लेने और शिव के गणों के साथ सान्निध्य में रहने की प्रार्थना करता है।

5. अपस्मार असुर किसका प्रतीक है?

अपस्मार अज्ञान, प्रमाद और विस्मृति का प्रतीक है। भगवान नटराज इसे अपने चरणों से दबाते हैं, जिसका अर्थ है ज्ञान द्वारा अज्ञान का दमन।

6. 'प्रदोष काल' में पाठ करने का क्या महत्व है?

मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर ताण्डव नृत्य करते हैं। इस समय किया गया पाठ कोटि गुना फल प्रदान करता है।

7. क्या विद्यार्थी इस पाठ को कर सकते हैं?

जी हाँ। नटराज ज्ञान और विद्या के भी अधिपति हैं। इसके पाठ से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान शिव की किसी भी स्तुति के लिए रुद्राक्ष की माला (Rudraksha Mala) ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत मानी गई है।

9. 'कुञ्चित वामपादम्' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

यह भगवान शिव के उठे हुए बाएं पैर को दर्शाता है, जो मोक्ष और माया से ऊपर उठने का मार्ग प्रदर्शित करता है।

10. 'सभामध्यवासं' शब्द का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है—सभा के मध्य में निवास करने वाले। यहाँ सभा का तात्पर्य चिदम्बरम् के मन्दिर और साधक के हृदय दोनों से है।