Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Maha Kali Stotram – श्री महाकाली स्तोत्रम्

Sri Maha Kali Stotram – श्री महाकाली स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री महाकाली स्तोत्रम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदां हास्ययुक्तां त्रिणेत्राञ्च कपाल कर्त्रिका कराम् । मुक्तकेशीं ललज्जिह्वां पिबन्तीं रुधिरं मुहुः चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत् ॥ शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीं चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम् । मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बरां एवं सञ्चिन्तयेत्कालीं श्मशनालयवासिनीम् ॥ ॥ अथ स्तोत्रम् ॥ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् । निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभाम् ॥ १ ॥ त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका । सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥ २ ॥ अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः । त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवी जननी परा ॥ ३ ॥ त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतद्सृज्यते जगत् । त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ ४ ॥ विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने । तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥ ५ ॥ महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः । महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥ ६ ॥ प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी । कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥ ७ ॥ त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा । लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥ ८ ॥ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥ ९ ॥ सौम्या सौम्यतराशेषा सौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी । परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥ १० ॥ यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके । तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ ११ ॥ यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् । सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ १२ ॥ विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च । कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥ १३ ॥ सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता । मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥ १४ ॥ प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु । बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ १५ ॥ ॥ इति श्री महाकाली स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र परिचय

श्री महाकाली स्तोत्रम् दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के प्रथम अध्याय से है। यह स्तोत्र भगवान ब्रह्मा द्वारा रचित है।
कथा संदर्भ: जब सृष्टि के आदि में भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में थे, तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए। इन असुरों ने विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा को मारने का प्रयास किया।
ब्रह्मा जी ने विष्णु को जगाने के लिए उनकी योगनिद्रा (महाकाली) की स्तुति की। देवी ने विष्णु के शरीर से निकलकर उन्हें जगाया, और फिर विष्णु ने मधु-कैटभ का वध किया।

स्तोत्र विवरण

ग्रंथदुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्य - प्रथम अध्याय
रचयिताब्रह्मा
छंदअनुष्टुप्
देवतामहाकाली (योगनिद्रा)
श्लोक संख्या15 (+ 2 ध्यान श्लोक)
प्रयोजनविष्णु को योगनिद्रा से जगाने हेतु

ध्यान श्लोक का अर्थ

माँ काली का ध्यान इस प्रकार करें:
  • शवारूढा: शव (शिव) पर आरूढ़
  • महाभीमा: अत्यंत भयंकर स्वरूप
  • घोरदंष्ट्रा: भयावह दाँतों वाली
  • त्रिनेत्रा: तीन नेत्रों वाली
  • खड्ग-मुण्ड-वर-अभय: चार हाथों में खड्ग, मुण्ड, वर और अभय मुद्रा
  • मुण्डमालाधरा: मुण्डों की माला धारण करने वाली
  • ललज्जिह्वा: लटकती हुई जीभ वाली
  • दिगम्बरा: दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं
  • श्मशानालयवासिनी: श्मशान में निवास करने वाली

प्रमुख श्लोकों का भाव

श्लोक 2-3: "तुम स्वाहा हो, स्वधा हो, वषट्कार हो, ॐ की तीन मात्राएं (अ-उ-म) तुम्हीं हो, अर्धमात्रा (बिंदु) भी तुम्हीं हो। तुम संध्या हो, सावित्री हो, परम जननी हो।"
श्लोक 4-5: "तुम्हारे द्वारा यह विश्व धारण होता है, सृजित होता है, पालित होता है। सृष्टि में तुम सृष्टिरूपा हो, पालन में स्थितिरूपा और अंत में संहाररूपा हो।"
श्लोक 6: "तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा, महादेवी और महेश्वरी हो।" - यह श्लोक देवी के सात महा-स्वरूपों का वर्णन करता है।
श्लोक 12-13: "जिस तुम्हारी शक्ति से जगत का स्रष्टा, पालक और संहारक भी निद्रा में चले जाते हैं, उस तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? विष्णु, मैं (ब्रह्मा) और ईशान (शिव) - हम सब तुम्हारी शक्ति से ही शरीर धारण करते हैं।"

पाठ लाभ

  • आलस्य निवारण: योगनिद्रा देवी की स्तुति से तमोगुण और आलस्य दूर होता है
  • शत्रु नाश: मधु-कैटभ जैसे शत्रुओं का नाश
  • ज्ञान प्राप्ति: महाविद्या की कृपा से तात्विक ज्ञान
  • नवरात्रि पाठ: दुर्गा सप्तशती के अंग के रूप में पाठ करने पर विशेष फल

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. महाकाली और योगनिद्रा में क्या संबंध है?

योगनिद्रा महाकाली का ही एक स्वरूप है। जब विष्णु प्रलयकाल में शेषनाग पर विश्राम करते हैं, तब यही देवी उनको निद्रा में रखती हैं। इसीलिए इसे "विष्णोर्निद्रा" कहा गया है।

2. यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का भाग है?

हाँ, यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय (मधु-कैटभ वध) का अंश है। सप्तशती में तीन चरित्र हैं - प्रथम चरित्र में महाकाली की यही स्तुति है।

3. मधु और कैटभ कौन थे?

ये दो असुर विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न हुए थे। मधु = रजोगुण, कैटभ = तमोगुण का प्रतीक माने जाते हैं। इनका वध सात्विक शक्ति (विष्णु) द्वारा हुआ।

4. "त्रिधा मात्रात्मिका" का क्या अर्थ है?

ॐ की तीन मात्राएं - अ, उ, म - ये तीनों देवी के स्वरूप हैं। अ = ब्रह्मा/सृष्टि, उ = विष्णु/स्थिति, म = शिव/संहार। इस प्रकार देवी त्रिगुणात्मिका हैं।

5. "कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि" क्या हैं?

ये देवी के तीन रात्रि स्वरूप हैं। कालरात्रि = प्रलय की रात्रि, महारात्रि = महाप्रलय की रात्रि, मोहरात्रि = अज्ञान/माया की रात्रि। तीनों में देवी ही व्याप्त हैं।

6. इस स्तोत्र का पाठ कब करें?

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के साथ, अमावस्या/काली चतुर्दशी को, या प्रतिदिन प्रातःकाल। आलस्य दूर करने के लिए सुबह उठकर पढ़ना विशेष लाभकारी है।

7. ब्रह्मा ने यह स्तुति क्यों की?

मधु-कैटभ असुरों ने ब्रह्मा को मारने का प्रयास किया। ब्रह्मा विष्णु को जगाना चाहते थे, लेकिन योगनिद्रा के कारण विष्णु जाग नहीं रहे थे। तब ब्रह्मा ने योगनिद्रा देवी (महाकाली) की स्तुति की ताकि वे विष्णु के शरीर से निकलें।

8. "सा त्वं किं स्तूयसे तदा" का क्या भाव है?

ब्रह्मा कहते हैं - "जो शक्ति समस्त सत्-असत् वस्तुओं में व्याप्त है, वह तुम्हीं हो। तुम्हारी स्तुति कैसे की जाए?" - यह देवी की अवर्णनीय महिमा का वर्णन है।

9. "मोहयैतौ" का क्या अर्थ है?

ब्रह्मा देवी से प्रार्थना करते हैं - "इन दो असुरों (मधु-कैटभ) को मोहित कर दो" ताकि विष्णु इनका वध कर सकें। देवी की माया से ही ये असुर मोहित होकर वध को प्राप्त हुए।

10. इस स्तोत्र में कितने देवी-नाम हैं?

इस स्तोत्र में देवी के अनेक नाम हैं: स्वाहा, स्वधा, वषट्कार, सुधा, संध्या, सावित्री, महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा, महादेवी, महेश्वरी, प्रकृति, कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि, श्री, ईश्वरी, ह्री, बुद्धि, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति, क्षान्ति आदि।