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Sri Lambodara Stotram - The Prayer for Conquering Anger

Sri Lambodara Stotram (Krodhasura Krutam)

Sri Lambodara Stotram - The Prayer for Conquering Anger
॥ श्री लम्बोदर स्तोत्रम् (क्रोधासुर कृतम्) ॥ क्रोधासुर उवाच । लम्बोदर नमस्तुभ्यं शान्तियोगस्वरूपिणे । सर्वशान्तिप्रदात्रे ते विघ्नेशाय नमो नमः ॥ १ ॥ असम्प्रज्ञातरूपेयं शुण्डा ते नात्र संशयः । सम्प्रज्ञातमयो देहो देहधारिन्नमो नमः ॥ २ ॥ स्वानन्दे योगिभिर्नित्यं दृष्टस्त्वं ब्रह्मनायकः । तेन स्वानन्दवासी त्वं नमः सम्योगधारिणे ॥ ३ ॥ समुत्पन्नं त्वदुदराज्जगन्नानाविधं प्रभो । ब्रह्म तद्वन्न सन्देहो लम्बोदर नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ त्वदीय कृपया देव मया ज्ञातं महोदर । त्वत्तः परतरं नास्ति परेशाय नमो नमः ॥ ५ ॥ हेरम्बाय नमस्तुभ्यं विघ्नहर्त्रे कृपालवे । आदिमध्यान्तहीनाय तन्मयाय नमो नमः ॥ ६ ॥ सिद्धिबुद्धिविहारज्ञ सिद्धिबुद्धिपते नमः । सिद्धिबुद्धिप्रदात्रे ते वक्रतुण्डाय वै नमः ॥ ७ ॥ सर्वात्मकाय सर्वादिपूज्याय ते नमो नमः । सर्वपूज्याय वै तुभ्यं भक्तसंरक्षकाय च ॥ ८ ॥ अतः प्रसीद विघ्नेश दासोऽहं ते गजानन । लम्बोदराय नित्यं नमो नमस्ते महात्मने ॥ ९ ॥ स्वत उत्थानपरत उत्थाने ब्रह्म धारयन् । तवोदरात् समुत्पन्नं तं किं स्तौमि परात्परम् ॥ १० ॥ इति स्तुत्वा महादैत्यः प्रणनाम गजाननम् । तमुवाच गणाध्यक्षो भक्तं भक्तजनप्रियः ॥ ११ ॥ लम्बोदर उवाच । वरं वृणु महाभाग क्रोधासुर हृदीप्सितम् । दास्यामि भक्तिभावेन स्तोत्रेणाऽहं हि तोषितः ॥ १२ ॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदं भवेत् । यः पठिष्यति तस्यैव क्रोधजं न भयं भवेत् ॥ १३ ॥ शृणुयात्तस्य तद्वच्च भविष्यति न संशयः । यद्यदिच्छति तत्तद्वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्मुद्गले महापुराणे लम्बोदरचरिते अष्टमोऽध्याये क्रोधासुरकृत लम्बोदरस्तोत्रम् ।

लम्बोदर रहस्य (The Secret of Lambodara)

यह स्तोत्र एक अद्वितीय विरोधाभास प्रस्तुत करता है: क्रोधासुर (क्रोध का असुर) स्वयं शांति के सागर भगवान गणेश की स्तुति कर रहा है। मुद्गल पुराण के अनुसार, गणेश जी ने 'लम्बोदर' अवतार लेकर क्रोधासुर को अपनी शांति से परास्त किया।

"लम्बोदर नमस्तुभ्यं शान्तियोगस्वरूपिणे" (हे लम्बोदर! आप शांति योग के साक्षात स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है)।

यहाँ 'लम्बोदर' का अर्थ केवल 'बड़े पेट वाले' नहीं, बल्कि वह विराट स्वरूप है जिसने ब्रह्मांड के समस्त द्वंद्वों (क्रोध, मोह, लोभ) को अपने भीतर समाहित कर लिया है।

क्रोध प्रबंधन का महामंत्र (Mantra for Anger Management)

आज के तनावपूर्ण जीवन में यह स्तोत्र एक रामबाण औषधि है। श्लोक 13 में गणेश जी स्वयं वचन देते हैं:
  • क्रोधजं न भयं भवेत्: "जो इसे पढ़ेगा, उसे क्रोध से उत्पन्न होने वाला कोई भय नहीं सताएगा।"
जब भी मन में क्रोध या आवेश हावी हो, इस स्तोत्र का पाठ करने से मन तुरंत शांत हो जाता है और विवेक जागृत होता है।

लाभ और फलश्रुति (Benefits)

  • आत्म-नियंत्रण: यह साधक को अपनी इंद्रियों और भावनाओं पर स्वामीत्व प्रदान करता है।
  • सर्व सिद्धि: "त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदं भवेत्" - यह केवल शांति ही नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि देता है।
  • भय मुक्ति: यह आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध) के भय से मुक्त कर निर्भयता प्रदान करता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना स्वयं क्रोधासुर (क्रोध के असुर) ने की थी, जब वह भगवान लम्बोदर के शांत स्वरूप के समक्ष नतमस्तक हो गया।

इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य क्रोध शांति (Anger Management) है। यह पाठकों को आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।

गणेश जी को "शांति योग स्वरूप" क्यों कहा गया है?

श्लोक 1 में उन्हें यह उपाधि दी गई है क्योंकि वे परम शांति के सागर हैं। जिस प्रकार जल अग्नि को शांत करता है, वैसे ही गणित जी का स्मरण क्रोध को शांत करता है।

"असम्प्रज्ञात रूप" का क्या अर्थ है?

श्लोक 2 में कहा गया है कि उनकी सूंड "असम्प्रज्ञात समाधि" (मन और बुद्धि से परे की अवस्था) का प्रतीक है, जो योग की सर्वोच्च स्थिति है।

"लम्बोदर" नाम का यहाँ क्या विशेष अर्थ है?

यहाँ "लम्बोदर" का अर्थ है वह विशाल उदर (पेट) जिसमें समस्त ब्रह्मांड (जगत) समाया हुआ है। यह उनकी व्यापकता और धारण क्षमता को दर्शाता है।

क्या इससे तनाव कम होता है?

जी हाँ। "सर्व शांति प्रदात्रे" (सभी शांति देने वाले) का आश्रय लेने से मानसिक तनाव, चिंता और आवेग नष्ट हो जाते हैं।

क्रोधासुर ने समर्पण क्यों किया?

उसने अनुभव किया कि उसका क्रोध लम्बोदर की शांति के सामने तुच्छ है। श्लोक 5 में वह कहता है - "त्वत्तः परतरं नास्ति" (आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है)।

फलश्रुति में क्या विशिष्ट वरदान है?

श्लोक 13 में स्पष्ट वरदान है - "क्रोधजं न भयं भवेत्" - अर्थात इस स्तोत्र के पाठकों को कभी भी क्रोध के दुष्परिणामों का भय नहीं होगा।

क्या इसका पाठ दैनिक किया जा सकता है?

अवश्य। विशेषकर जिन लोगों को बहुत जल्दी गुस्सा आता है, उनके लिए यह नित्य पाठ एक औषधि के समान है।

इसका "ब्रह्म" से क्या संबंध है?

श्लोक 4 पुष्टि करता है कि जैसे ब्रह्म से सृष्टि उत्पन्न होती है, वैसे ही लम्बोदर के उदर से यह नाना प्रकार का जगत उत्पन्न हुआ है।