Sri Krishna Stotram (Viprapatni Krutam) – श्री कृष्ण स्तोत्रम् (विप्रपत्नी कृतम्)

परिचय: विप्रपत्नी कृत श्री कृष्ण स्तोत्र और यज्ञ-पत्नियों की अनन्य भक्ति (Detailed Introduction)
श्री कृष्ण स्तोत्रम् (विप्रपत्नी कृतम्) सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में से एक, 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के श्रीकृष्ण जन्म खंड से लिया गया है। यह स्तोत्र केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह उस महान क्षण की गवाही देता है जब ज्ञान और कर्मकांड का अहंकार, शुद्ध भक्ति के चरणों में नतमस्तक हो गया था। कथा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण और बलराम जब वृन्दावन के वनों में गौ-चारण कर रहे थे, तब उन्हें और उनके सखाओं को तीव्र भूख लगी। निकट ही कुछ विद्वान ब्राह्मण एक महान 'अङ्गिरस' यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण ने अपने सखाओं को उन ब्राह्मणों के पास भोजन मांगने भेजा।
विद्वान ब्राह्मण, जो वेदों के ज्ञाता थे, अपने अनुष्ठानों और नियमों में इतने लीन थे कि उन्होंने साक्षात् परब्रह्म के सखाओं की उपेक्षा कर दी। उनके लिए विधि-विधान ईश्वर से बड़े हो गए थे। जब सखा खाली हाथ लौटे, तो कृष्ण ने उन्हें उन ब्राह्मणों की पत्नियों (विप्रपत्नियों) के पास भेजा। वे पत्नियाँ, जो वेदों की ज्ञाता नहीं थीं, लेकिन जिनका हृदय कृष्ण-प्रेम से लबालब भरा था, जैसे ही उन्होंने सुना कि उनके प्राणप्रिय कृष्ण भूखे हैं, वे लोक-लाज, कुल की मर्यादा और पतियों के निषेध को त्यागकर तुरंत भोजन के थाल सजाकर वन की ओर दौड़ पड़ीं।
भगवान श्री कृष्ण ने उन सरल हृदय वाली महिलाओं की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपने चतुर्भुज दिव्य स्वरूप के दर्शन कराए। उस अलौकिक तेज को देखकर विप्रपत्नियों की चेतना जागृत हो उठी और उनके मुख से जो स्तुति प्रवाहित हुई, वही यह "विप्रपत्नी कृत स्तोत्र" है। स्तोत्र के प्रथम श्लोक में वे भगवान को 'निरीह' और 'निरहङ्कृति' कहती हैं, जो यह दर्शाता है कि भगवान को केवल वे ही देख सकते हैं जिनके भीतर अहंकार का लेश भी शेष न हो।
इस स्तोत्र की महत्ता इस बात में है कि इसमें ब्रह्म के निर्गुण और सगुण—दोनों स्वरूपों का अद्भुत सामंजस्य है। विप्रपत्नियों ने स्वीकार किया कि जो भगवान उनके सामने बालक रूप में भोजन कर रहे हैं, उन्हीं के रोम-रोम में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है। यह पाठ हमें यह मूल्यवान शिक्षा देता है कि ईश्वर को पाने के लिए पांडित्य की नहीं, बल्कि पात्रता और प्रेम की आवश्यकता होती है। आज भी वैष्णव संप्रदायों में इस स्तोत्र को 'अन्तर्मुखी भक्ति' का सर्वश्रेष्ठ साधन माना जाता है।
विशिष्ट महत्व: कर्मकांड पर भक्ति की विजय (Significance)
१. सर्वबीज और कारण (श्लोक ३-४): इस स्तोत्र में विप्रपत्नियों ने भगवान को 'सर्वबीज' कहा है। वे स्पष्ट करती हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उन्हीं के अंश हैं। यहाँ तक कि जिस महाविष्णु से सृष्टि उत्पन्न होती है, श्री कृष्ण उनके भी जनक (पिता) हैं। यह वैष्णव दर्शन की सर्वोच्च स्थिति 'कृष्णस्तु भगवान स्वयं' की पुष्टि करता है।
२. वेदों की जड़ता (श्लोक ९-१०): स्तोत्र का यह भाग अत्यंत क्रांतिकारी है। विप्रपत्नियां कहती हैं कि माँ सरस्वती, महादेव, ब्रह्मा, यहाँ तक कि स्वयं राधा और सावित्री भी भगवान के स्वरूप का वर्णन करने में स्वयं को 'जड़' (अक्षम) महसूस करते हैं। जब वेद भी मौन हो जाते हैं, तब केवल 'भाव' ही शेष बचता है। यह शुष्क पांडित्य को त्यागकर समर्पण की ओर बढ़ने का संकेत है।
३. साक्षिरूप और निर्लिप्त: भगवान को 'साक्षिरूप' और 'निर्लिप्त' कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे संसार की हर क्रिया को देख रहे हैं लेकिन उसमें लिप्त नहीं हैं। विप्रपत्नियों ने भगवान के इस तटस्थ स्वरूप को पहचाना, जो केवल प्रेम की डोर से ही 'साकार' होने को विवश होता है।
विप्रपत्नी कृत स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)
स्तोत्र के अंतिम श्लोक (१३) में इसकी महिमा का वर्णन किया गया है। यदि कोई भक्त श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, तो उसे निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- विप्रपत्नियों जैसी गति: "स गतिं विप्रपत्नीनां लभते" — जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे वही परम गति (मोक्ष) प्राप्त होती है जो उन भाग्यशाली यज्ञ-पत्नियों को मिली थी।
- अहंकार का नाश: भगवान को "निरहङ्कृति" मानने से साधक के भीतर का धार्मिक और बौद्धिक अहंकार समाप्त हो जाता है।
- शुद्ध भक्ति की प्राप्ति: यह स्तोत्र हृदय के कठोर भाव को पिघलाकर ईश्वर के प्रति सहज अनुराग उत्पन्न करता है।
- मानसिक शांति और अभय: श्लोक १२ के अनुसार, भगवान पाठ करने वाले को 'अभय' (निडरता) प्रदान करते हैं, जिससे जीवन की अनिश्चितताओं का डर मिट जाता है।
- पाप और संताप का शमन: भगवान को "स्वयञ्ज्योति" और "सर्वानन्द" मानकर जपने से अंतःकरण के समस्त विकार दूर होते हैं।
- साधना में सफलता: यदि पूजा के समय इसका पाठ किया जाए (पूजाकाले च यः पठेत्), तो उपासना में आने वाली बाधाएं स्वतः ही शांत हो जाती हैं।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)
यद्यपि विप्रपत्नियों ने यह स्तुति किसी विधि-विधान के बिना, केवल प्रेम के वश की थी, किन्तु साधक के लिए शास्त्रोक्त नियमों का पालन ऊर्जा को एकीकृत करने में सहायक होता है:
साधना के नियम
- समय (Optimal Time): फलश्रुति के अनुसार 'पूजा काल' में पाठ करना अनिवार्य है। प्रातः काल की आरती या भोग अर्पण के समय इसका पाठ सर्वोत्तम है।
- नैवेद्य (Bhog): चूंकि यह स्तोत्र भोजन अर्पण से जुड़ा है, अतः भगवान को माखन-मिश्री या सात्विक भोजन का भोग लगाते समय इसका पाठ करना साक्षात् कृपा दिलाता है।
- शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान कृष्ण को विशेष प्रिय है।
- आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ध्यान: उस बाल-कृष्ण का ध्यान करें जो अपने सखाओं के साथ वन में बैठे हैं और भक्तों द्वारा प्रेम से लाए गए भोजन का आस्वादन कर रहे हैं।
विशेष अवसर
- जन्माष्टमी: भगवान के जन्मोत्सव पर उनकी बाल-लीलाओं के स्मरण हेतु यह पाठ अत्यंत सुखद परिणाम देता है।
- एकादशी: प्रत्येक एकादशी को सात्विक आहार के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से चित्त की शुद्धि होती है।
- अन्नकूट उत्सव: छप्पन भोग या अन्नकूट के समय यह स्तोत्र विशेष रूप से पढ़ा जाना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)