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Sri Krishna Stotram (Danava Krutam) – श्री कृष्ण स्तोत्रम् (दानव कृतम्)

Sri Krishna Stotram (Danava Krutam) – श्री कृष्ण स्तोत्रम् (दानव कृतम्)
॥ श्री कृष्ण स्तोत्रम् (दानव कृतम्) ॥ वामनोऽसि त्वमंशेन मत्पितुर्यज्ञभिक्षुकः । राज्यहर्ता च श्रीहर्ता सुतलस्थलदायकः ॥ १ ॥ बलिभक्तिवशो वीरः सर्वेशो भक्तवत्सलः । शीघ्रं त्वं हिन्धि मां पापं शापाद्गर्दभरूपिणम् ॥ २ ॥ मुनेर्दुर्वाससः शापादीदृशं जन्म कुत्सितम् । मृत्युरुक्तश्च मुनिना त्वत्तो मम जगत्पते ॥ ३ ॥ षोडशारेण चक्रेण सुतीक्ष्णेनातितेजसा । जहि मां जगतां नाथ सद्भक्तिं कुरु मोक्षद ॥ ४ ॥ त्वमंशेन वराहश्च समुद्धर्तुं वसुन्धराम् । वेदानां रक्षिता नाथ हिरण्याक्षनिषूदनः ॥ ५ ॥ त्वं नृसिंहः स्वयं पूर्णो हिरण्यकशिपोर्वधे । प्रह्लादानुग्रहार्थाय देवानां रक्षणाय च ॥ ६ ॥ त्वं च वेदोद्धारकर्ता मीनांशेन दयानिधे । नृपस्य ज्ञानदानाय रक्षायै सुरविप्रयोः ॥ ७ ॥ शेषाधारश्च कूर्मस्त्वमंशेन सृष्टिहेतवे । विश्वाधारश्च विश्वस्त्वमंशेनापि सहस्रधृत् ॥ ८ ॥ रामो दाशरथिस्त्वं च जानक्युद्धारहेतवे । दशकन्धरहन्ता च सिन्धौ सेतुविधायकः ॥ ९ ॥ कलया परशुरामश्च जमदग्निसुतो महान् । त्रिःसप्तकृत्वो भूपानां निहन्ता जगतीपते ॥ १० ॥ अंशेन कपिलस्त्वं च सिद्धानां च गुरोर्गुरुः । मातृज्ञानप्रदाता च योगशास्त्रविधायकः ॥ ११ ॥ अंशेन ज्ञानिनां श्रेष्ठौ नरनारायणावृषी । त्वं च धर्मसुतो भूत्वा लोकविस्तारकारकः ॥ १२ ॥ अधुना कृष्णरूपस्त्वं परिपूर्णतमः स्वयम् । सर्वेषामवताराणां बीजरूपः सनातनः ॥ १३ ॥ यशोदाजीवनो नित्यो नन्दैकानन्दवर्धनः । प्राणाधिदेवो गोपीनां राधाप्राणाधिकप्रियः ॥ १४ ॥ वसुदेवसुतः शान्तो देवकीदुःखभञ्जनः । अयोनिसम्भवः श्रीमान् पृथिवीभारहारकः ॥ १५ ॥ पूतनायै मातृगतिं प्रदाता च कृपानिधिः । बककेशिप्रलम्बानां ममापि मोक्षकारकः ॥ १६ ॥ स्वेच्छामय गुणातीत भक्तानां भयभञजन । प्रसीद राधिकानाथ प्रसीद कुरु मोक्षणम् ॥ १७ ॥ हे नाथ गार्दभीयोनेः समुद्धर भवार्णवात् । मूर्खस्त्वद्भक्तपुत्रोऽहं मामुद्धर्तुं त्वमर्हसि ॥ १८ ॥ वेदा ब्रह्मादयो यं च मुनीन्द्राः स्तोतुमक्षमाः । किं स्तौमि तं गुणातीतं पुरा दैत्योऽधुना खरः ॥ १९ ॥ एवं कुरु कृपासिन्धो येन मे न भवेज्जनुः । दृष्ट्वा पादारविन्दं ते कः पुनर्भवनं व्रजेत् ॥ २० ॥ ब्रह्मा स्तोता खरः स्तोता नोपहासितुमर्हसि । सदीश्वरस्य विज्ञस्य योग्यायोग्ये समा कृपा ॥ २१ ॥ इत्येवमुक्त्वा दैत्येन्द्रस्तस्थौ च पुरतो हरेः । प्रसन्नवदनः श्रीमानतितुष्टो बभूव ह ॥ २२ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इदं दैत्यकृतं स्तोत्रं नित्यं भक्त्या च यः पठेत् । सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यं लीलया लभते हरेः ॥ २३ ॥ इह लोके हरेर्भक्तिमन्ते दास्यं सुदुर्लभम् । विद्यां श्रियं सुकवितां पुत्रपौत्रान् यशो लभेत् ॥ २४ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे द्वाविंशोऽध्याये दानवकृत श्री कृष्ण स्तोत्रम् ॥

परिचय: दानव कृत श्री कृष्ण स्तोत्र (Introduction & Context)

श्री कृष्ण स्तोत्रम् (दानव कृतम्) ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत वर्णित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और ज्ञानवर्धक स्तुति है। यह स्तोत्र उस समय प्रकट होता है जब भगवान श्री कृष्ण और बलराम वृन्दावन के तालवन में धेनुकासुर नामक दैत्य का वध करते हैं। धेनुकासुर, जो महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण गधे (गर्दभ) के रूप में था, वास्तव में एक महान असुर राज बलि का वंशज था। मृत्यु के सन्निकट, जब उसकी चेतना जाग्रत हुई, तब उसने भगवान श्री कृष्ण की यह अद्भुत स्तुति की।

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह एक "दानव" के मुख से निकली हुई वाणी है, जो ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनके विभिन्न अवतारों की महिमा को स्वीकार करती है। श्लोक २ और ३ में धेनुकासुर स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि महर्षि दुर्वासा ने उसे शाप दिया था और कहा था कि स्वयं जगत्पति कृष्ण के हाथों उसकी मृत्यु ही उसे इस कुत्सित (नीच) योनि से मुक्ति दिलाएगी। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि भगवान की दृष्टि में कोई भी जीव छोटा या बड़ा नहीं है; वे अपने भक्तों के साथ-साथ अपने शत्रुओं का भी कल्याण करते हैं (शत्रु-सायुज्य मुक्ति)।

इस पाठ में भगवान को 'राधिकानाथ' और 'यशोदाजीवन' कहकर पुकारा गया है, जो उनके ब्रज-लीला के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है। यह स्तोत्र हमें यह बोध कराता है कि भक्ति योनि या कुल पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हृदय की व्याकुलता और सत्य की स्वीकारोक्ति पर निर्भर करती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण का यह खंड हमें साक्षात् पुरुषोत्तम के अवतार के पीछे छिपे रहस्यों से परिचित कराता है।

विशिष्ट महत्व: अवतारवाद और तत्व ज्ञान (Significance)

अवतारों का संक्षिप्त दर्शन: इस स्तोत्र की सबसे बड़ी आध्यात्मिक विशेषता यह है कि इसमें भगवान के लगभग सभी प्रमुख अवतारों का क्रमबद्ध वर्णन है। श्लोक ५ से १२ तक में वराह, नृसिंह, मत्स्य, कूर्म, राम, परशुराम, कपिल और नर-नारायण अवतारों की महिमा गाई गई है। यह पाठ हमें यह समझने में सहायता करता है कि कृष्ण ही 'बीजरूप' और 'सनातन' (श्लोक १३) हैं, जिनसे अन्य सभी अवतार उत्पन्न होते हैं।

अद्वैत और शरणागति: श्लोक २१ में दानव कहता है—"सदीश्वरस्य विज्ञस्य योग्यायोग्ये समा कृपा"—अर्थात् ईश्वर के लिए योग्य और अयोग्य दोनों पर समान कृपा होती है। यह उस परम तत्व की ओर संकेत है जहाँ पापी और पुण्यात्मा दोनों ही प्रभु की शरण में जाकर समान गति प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र अज्ञान के अंधकार को मिटाकर जीव को 'भवार्णव' (संसार के समुद्र) से पार लगाने का सामर्थ्य रखता है।

शाप मुक्ति का रहस्य: धेनुकासुर का प्रसंग यह सिद्ध करता है कि संतों का शाप भी अंततः कल्याणकारी सिद्ध होता है यदि वह जीव को भगवान के सम्मुख ले आए। यह स्तोत्र उन जातकों के लिए विशेष रूप से फलदायी है जो पितृ दोष या किसी अदृश्य शाप के कारण जीवन में अवरोध महसूस करते हैं।

फलश्रुति लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक २३-२४) में स्वयं ब्रह्मवैवर्त पुराण के ऋषि इसके अद्भुत फलों का वर्णन करते हैं:

  • सालोक्य-सामीप्य मुक्ति: जो नित्य भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसे भगवान के दिव्य लोक (सालोक्य) और उनके समीप रहने (सामीप्य) का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है।
  • दुर्लभ हरि-भक्ति: इस लोक में रहते हुए साधक को भगवान की वह अनन्य भक्ति और दास्य प्राप्त होता है जो बड़े-बड़े योगियों के लिए भी दुर्लभ है।
  • विद्या और यश: स्तोत्र का पाठ करने वाला व्यक्ति उत्तम विद्या, धन-संपदा, श्रेष्ठ कवित्व शक्ति और समाज में अक्षय यश प्राप्त करता है।
  • वंश वृद्धि: इसके प्रभाव से साधक को उत्तम पुत्र और पौत्रों की प्राप्ति होती है, जिससे उसका कुल धन्य होता है।
  • शाप और पाप से मुक्ति: धेनुकासुर की भाँति ही, साधक के समस्त संचित पाप और पूर्व जन्मों के शाप भगवान की कृपा से भस्म हो जाते हैं।
  • जीवन के अंत में सद्गति: अंत समय में जीव को भगवान के पादारविन्दों का दर्शन होता है और वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में रचित इस स्तोत्र का पाठ करने की शास्त्रोक्त विधि निम्नवत है:

साधना के नियम

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या सायं काल में गोधूलि बेला के समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: भगवान कृष्ण के उस रूप का ध्यान करें जिसमें वे कालिया दमन या असुरों का उद्धार कर रहे हों, और मन में 'शरणागति' का भाव रखें।
  • अर्पण: पाठ के पश्चात तुलसी दल युक्त जल या माखन-मिश्री का भोग अवश्य लगाएं।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: भगवान के प्राकट्य दिवस पर इस स्तोत्र का ११ बार पाठ करने से विशेष कामनाओं की पूर्ति होती है।
  • एकादशी: प्रत्येक एकादशी को इस स्तोत्र का पठन करने से समस्त पापों का क्षय होता है।
  • पितृ पक्ष: पितरों की शांति और उनके मोक्ष हेतु इस स्तोत्र का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस दानव ने किया था और क्यों?

यह स्तोत्र धेनुकासुर (गर्दभरूप दानव) ने किया था। वह महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण नीच योनि में था और भगवान कृष्ण के हाथों मृत्यु प्राप्त कर मोक्ष चाहता था।

2. 'दानव कृत' स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

इसके पाठ से समस्त पूर्व जन्मों के पाप, शाप और संकट दूर होते हैं। यह विशेष रूप से मोक्ष और भगवान की अनन्य भक्ति प्राप्त करने के लिए फलदायी है।

3. क्या इसमें भगवान के १० अवतारों का वर्णन है?

हाँ, इसमें मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, राम, परशुराम, कपिल आदि कई प्रमुख अवतारों का उनकी महिमा के साथ वर्णन किया गया है।

4. क्या स्त्रियाँ और बच्चे भी यह पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। सात्विक भाव से कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है। बच्चों के लिए यह विद्या और बुद्धि बढ़ाने वाला है।

5. 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में इस स्तोत्र का क्या महत्व है?

ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्री कृष्ण को 'परब्रह्म' माना गया है। यह स्तोत्र उस दर्शन को पुष्ट करता है कि समस्त सृष्टि और अवतार कृष्ण के ही अंश हैं।

6. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष दूर होते हैं?

भगवान को 'पापहर' और 'भयभञजन' कहा गया है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से ग्रहों की प्रतिकूलता और पितृ दोषों का प्रभाव कम होने लगता है।

7. पाठ के लिए तुलसी की माला का उपयोग क्यों किया जाता है?

तुलसी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय है। उनके स्तोत्रों का जप या पाठ तुलसी के समीप करने से भगवान की कृपा अति शीघ्र प्राप्त होती है।

8. 'सालोक्य' और 'सामीप्य' मुक्ति क्या है?

'सालोक्य' का अर्थ है भगवान के ही लोक (वैकुंठ या गोलोक) में रहना और 'सामीप्य' का अर्थ है उनके निकट पार्षद के रूप में निवास करना।

9. क्या बिना अर्थ समझे पाठ करने से लाभ मिलता है?

भगवान के नामों और श्लोकों की अपनी एक दिव्य ध्वनि तरंग होती है। यद्यपि अर्थ समझकर पाठ करना श्रेष्ठ है, किन्तु केवल श्रद्धापूर्वक उच्चारण भी पूर्ण लाभ प्रदान करता है।

10. पाठ पूरा होने के बाद क्या करना चाहिए?

पाठ के अंत में भगवान की आरती करें, अपनी त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें और शांत चित्त से ५ मिनट तक श्री कृष्ण का ध्यान करें।