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Sri Krishna Stavaraja 2 (Krishnadasa Krutam) – श्री कृष्ण स्तवराजः (कृष्णदास कृतम्)

Sri Krishna Stavaraja 2 (Krishnadasa Krutam) – श्री कृष्ण स्तवराजः (कृष्णदास कृतम्)
॥ श्री कृष्ण स्तवराजः ॥ (कृष्णदास कृतम्) अनन्तकन्दर्पकलाविलासं किशोरचन्द्रं रसिकेन्द्रशेखरम् । श्यामं महासुन्दरतानिधानं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ १ ॥ अनन्तविद्युद्द्युतिचारुपीतं कौशेयसंवीतनितम्बबिम्बम् । अनन्तमेघच्छविदिव्यमूर्तिं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ २ ॥ महेन्द्रचापच्छविपिच्छचूढं कस्तूरिकाचित्रकशोभिमालम् । मन्दादरोद्घूर्णविशालनेत्रं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ३ ॥ भ्राजिष्णुगल्लं मकराङ्कितेन विचित्ररत्नोज्ज्वलकुण्डलेन । कोटीन्दुलावण्यमुखारविन्दं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ४ ॥ वृन्दाटवीमञ्जुलकुञ्जवाद्यं श्रीराधया सार्थमुदारकेलिम् । आनन्दपुञ्जं ललितादिदृश्यं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ५ ॥ महार्हकेयूरककङ्कणश्री- -ग्रैवेयहारावलिमुद्रिकाभिः । विभूषितं किङ्किणिनूपुराभ्यां श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ६ ॥ विचित्ररत्नोज्ज्वलदिव्यवासा- -प्रगीतरामागुणरूपलीलम् । मुहुर्मुहुः प्रोदितरोमहर्षं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ७ ॥ श्रीराधिकेयाधरसेवनेन माद्यन्तमुच्चै रतिकेलिलोलम् । स्मरोन्मदान्धं रसिकेन्द्रमौलिं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ८ ॥ अङ्के निधाय प्रणयेन राधां मुहुर्मुहुश्चुम्बिततन्मुखेन्दुम् । विचित्रवेषैः कृततद्विभूषणं श्रीकृष्णचन्द्रं शरणं गतोऽस्मि ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीकृष्णदास कृत श्री कृष्ण स्तवराजः ॥

परिचय: श्री कृष्ण स्तवराजः और कृष्णदास की रसिक भक्ति (Introduction)

श्री कृष्ण स्तवराजः (कृष्णदास कृतम्) भक्ति साहित्य की एक अनुपम निधि है, जो भगवान श्री कृष्ण के "रसिक" स्वरूप को केंद्र में रखकर रची गई है। "स्तवराज" शब्द का अर्थ होता है—"स्तुतियों का राजा"। यह पाठ साक्षात् परब्रह्म के उस माधुर्य पक्ष को प्रकट करता है जो वेदों के लिए भी अगम्य है, किन्तु प्रेमियों के लिए अत्यंत सुलभ। इस स्तवराज के रचयिता श्री कृष्णदास जी (संभवतः गौड़ीय या निम्बार्क परंपरा के रसिक संत) ने कृष्ण को 'रसिकेन्द्रशेखर'—अर्थात् रसिकों के मुकुटमणि—के रूप में चित्रित किया है।

इस स्तवराज की अद्वितीयता इसके "शरणं गतोऽस्मि" (मैं आपकी शरण में हूँ) के भाव में निहित है। भक्ति मार्ग में शरणागति (Self-Surrender) को ही सर्वोच्च सिद्धि माना गया है। साधक जब भगवान के अनंत सौंदर्य, उनके पीताम्बर की आभा और उनकी दिव्य मुद्राओं का ध्यान करता है, तो उसका अहंकार स्वतः ही विगलित हो जाता है। श्लोक १ में भगवान को 'अनन्तकन्दर्पकलाविलासं' कहा गया है, जो यह स्पष्ट करता है कि कृष्ण का सौंदर्य भौतिक कामदेवों से करोड़ों गुना अधिक दिव्य और आध्यात्मिक है।

लीला और स्वरूप: इस स्तोत्र में वृन्दावन की "निकुंज लीलाओं" का बहुत ही सूक्ष्म और मधुर वर्णन है। श्लोक ५ में भगवान को 'वृन्दाटवीमञ्जुलकुञ्जवाद्यं' कहा गया है, जहाँ वे श्री राधा और ललितादि सखियों के साथ विहार कर रहे हैं। यह केवल एक धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि एक रसिक साधक की अंतर्यात्रा है, जहाँ वह अपने इष्ट के नख-शिख सौंदर्य का वर्णन करते हुए स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर देता है।

आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्री कृष्ण के दो स्वरूप हैं—एक ऐश्वर्य प्रधान (मथुरा-द्वारका के राजा) और दूसरा माधुर्य प्रधान (वृन्दावन के किशोर)। यह स्तवराज माधुर्य भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसमें भगवान को 'श्याम' (सांवले) और 'महासुन्दरतानिधानं' (सुंदरता का कोष) कहा गया है, जो साधक के मन को संसार से खींचकर अलौकिक आनंद की ओर ले जाता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance of Krishna Stavaraja)

अनन्य शरणागति का मार्ग: श्री कृष्ण स्तवराजः की प्रत्येक पंक्ति भक्त को यह बोध कराती है कि इस संसार में श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई भी स्थाई आश्रय नहीं है। 'शरणं गतोऽस्मि' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक संकल्प है। जब साधक कहता है कि वह 'अनन्तविद्युद्द्युतिचारुपीतं' (हजारों बिजलियों के समान चमकते पीताम्बर वाले) कृष्ण की शरण में है, तो वह माया के अंधकार से मुक्त होने की प्रार्थना कर रहा होता है।

युगल सरकार की प्रधानता: इस स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (८ और ९) में श्री राधा और कृष्ण के युगल स्वरूप की वंदना की गई है। रसिक संप्रदायों का मत है कि कृष्ण की भक्ति तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राधा रानी की कृपा प्राप्त न हो। 'अङ्के निधाय प्रणयेन राधां' (प्रेमपूर्वक राधा को गोद में बैठाए हुए) का वर्णन रसिक साधना की पराकाष्ठा है। यह दर्शाता है कि कृष्ण प्रेम के अधीन हैं और जो राधा रानी का आश्रय लेता है, उसे कृष्ण सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

सौंदर्य और शांति: आज के तनावपूर्ण जीवन में, जहाँ मन अशांत रहता है, भगवान के 'कोटीन्दुलावण्यमुखारविन्दं' (करोड़ों चंद्रमाओं के समान शीतल मुख) का ध्यान असीम शांति प्रदान करता है। यह स्तवराज साधक के अवचेतन मन (Subconscious mind) को शुद्ध कर उसे सात्विक आनंद से भर देता है।

स्तवराज पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits)

इस दिव्य स्तवराज का श्रद्धापूर्वक पठन और मनन करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक विकारों का नाश: भगवान को 'अनन्तकन्दर्प' के समान सुंदर मानने से साधक के भीतर के काम, क्रोध और लोभ जैसे विकार शांत होने लगते हैं।
  • प्रेमा-भक्ति की प्राप्ति: रसिकेन्द्र मौलि की स्तुति से हृदय में ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम जागृत होता है, जो मोक्ष से भी ऊपर माना गया है।
  • सुरक्षा और आश्रय: "शरणं गतोऽस्मि" के भाव से निरंतर पाठ करने वाले साधक की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं और उसे अज्ञात भयों से मुक्ति मिलती है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: भगवान के नख-शिख सौंदर्य (जैसे मकर कुंडल, पीताम्बर, मयूर पंख) का चिंतन करने से मन की चंचलता समाप्त होती है।
  • आध्यात्मिक प्रसन्नता: यह स्तवराज 'आनन्दपुञ्जं' (आनंद के समूह) श्री कृष्ण से जोड़ता है, जिससे जीवन में उत्साह और सकारात्मकता बनी रहती है।
  • राधा-कृपा: युगल स्वरूप की स्तुति होने के कारण, साधक को श्री राधा रानी की ममता और कृपा का अनुभव होता है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना (Ritual Method)

यद्यपि भक्ति भाव की भूखी है, किन्तु एक व्यवस्थित विधि साधक के अनुशासन और एकाग्रता को बढ़ाती है:

साधना के नियम

  • समय (Optimal Time): प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' में पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। संध्या के समय दीप-दर्शन के साथ भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले (पीताम्बर के प्रतीक) या श्वेत वस्त्र धारण करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  • नैवेद्य: भगवान को माखन-मिश्री या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएँ।
  • माला: यदि इस स्तोत्र के साथ जप करना हो, तो तुलसी की माला का प्रयोग करें।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: भगवान के जन्म उत्सव पर इस स्तवराज का १०८ बार पाठ करना विशेष सिद्धि प्रदान करता है।
  • एकादशी: प्रत्येक एकादशी को युगल सरकार के सम्मुख इसका पाठ करने से भक्ति मार्ग की बाधाएँ दूर होती हैं।
  • शरद पूर्णिमा: भगवान के 'कोटीन्दुलावण्य' मुख का ध्यान करते हुए इस दिन पाठ करना विशेष फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'श्री कृष्ण स्तवराजः' के रचयिता कृष्णदास कौन थे?

श्री कृष्णदास जी रसिक परंपरा के एक महान संत और कवि थे, जो भगवान की निकुंज लीलाओं और उनके माधुर्य स्वरूप के उपासक थे। उनके पदों में शरणागति और रस की प्रधानता मिलती है।

2. 'रसिकेन्द्रशेखर' नाम का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "रसिकों में श्रेष्ठ" या "रसिकों के मुकुटमणि"। भगवान कृष्ण रसों के अधिपति हैं और भक्तों के साथ विभिन्न रसों (प्रेम, वात्सल्य, सख्य) में लीला करते हैं।

3. क्या इस स्तवराज का पाठ घर पर किया जा सकता है?

जी हाँ, घर के मंदिर में युगल सरकार (राधा-कृष्ण) के चित्र के सम्मुख इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है। यह घर के वातावरण को दिव्य बनाता है।

4. 'शरणं गतोऽस्मि' का जप करने से क्या लाभ मिलता है?

यह महामंत्र के समान है। इसे बार-बार दोहराने से साधक का अहंकार मिटता है और उसे यह विश्वास होता है कि उसकी सुरक्षा का भार अब स्वयं ईश्वर पर है।

5. क्या इस पाठ को करने के लिए संस्कृत जानना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं है। आप इसका हिंदी अर्थ समझकर भी पाठ कर सकते हैं। भगवान भाव देखते हैं, किन्तु शुद्ध संस्कृत उच्चारण से ध्वन्यात्मक (vibrational) लाभ भी प्राप्त होते हैं।

6. स्तवराज में 'अनन्तकन्दर्प' का क्या रहस्य है?

कन्दर्प कामदेव को कहते हैं। भगवान को 'अनन्तकन्दर्प' कहना यह दर्शाता है कि वे भौतिक काम (lust) से परे, आध्यात्मिक प्रेम और सौंदर्य के स्रोत हैं।

7. क्या यह पाठ मुकदमों या शत्रुओं से रक्षा करता है?

यद्यपि यह एक रसिक स्तोत्र है, किन्तु भगवान की 'शरण' में जाने से व्यक्ति की हर प्रकार के संकट से रक्षा होती है। यह मानसिक बल प्रदान करता है।

8. 'निकुञ्ज लीला' का यहाँ क्या वर्णन है?

श्लोक ५ और ९ में भगवान को सखियों और श्री राधा के साथ निकुंज (वृंदावन की लताओं) में खेलते और विहार करते दिखाया गया है, जो रसिक भक्ति का प्राण है।

9. क्या इस पाठ को बच्चे भी कर सकते हैं?

जी हाँ, इससे बच्चों में सात्विक संस्कारों का विकास होता है और वे भारतीय संस्कृति और भक्ति मार्ग से परिचित होते हैं।

10. पाठ की पूर्णता के बाद क्या करना चाहिए?

पाठ के अंत में भगवान की आरती करें, क्षमा प्रार्थना करें और 'राधे-राधे' का कीर्तन करते हुए प्रसाद ग्रहण करें।