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Sri Krishna Stavaraja 1 (Narada Krutam) – श्री कृष्ण स्तवराजः (नारद कृतम्)

Sri Krishna Stavaraja 1 (Narada Krutam) – श्री कृष्ण स्तवराजः (नारद कृतम्)
॥ श्री कृष्ण स्तवराजः ॥ (श्रीनारदपाञ्चरात्रे नारद कृतम्) प्रसीद भगवन् मह्यमज्ञानात्कुण्ठितात्मने । तवाङ्घ्रिपङ्कजरजोरागिणीं भक्तिमुत्तमाम् ॥ १ ॥ अज प्रसीद भगवन्नमितद्युतिपञ्जर । अप्रमेय प्रसीदास्मद्दुःखहन् पुरुषोत्तम ॥ २ ॥ स्वसंवेद्य प्रसीदास्मदानन्दात्मन्ननामय । अचिन्त्यसार विश्वात्मन् प्रसीद परमेश्वर ॥ ३ ॥ प्रसीद तुङ्ग तुङ्गानां प्रसीद शिव शोभन । प्रसीद गुणगम्भीर गम्भीराणां महाद्युते ॥ ४ ॥ प्रसीद व्यक्त विस्तीर्ण विस्तीर्णानामगोचर । प्रसीदार्द्रार्द्रजातीनां प्रसीदान्तान्तदायिनाम् ॥ ५ ॥ गुरोर्गरीयः सर्वेश प्रसीदानन्त देहिनाम् । जय माधव मायात्मन् जय शाश्वत शङ्खभृत् ॥ ६ ॥ जय शङ्खधर श्रीमन् जय नन्दकनन्दन । जय चक्रगदापाणे जय देव जनार्दन ॥ ७ ॥ जय रत्नवराबद्धकिरीटाक्रान्तमस्तक । जय पक्षिपतिच्छायानिरुद्धार्ककरारुण ॥ ८ ॥ नमस्ते नरकाराते नमस्ते मधुसूदन । नमस्ते ललितापाङ्ग नमस्ते नरकान्तक ॥ ९ ॥ नमः पापहरेशान नमः सर्वभयापह । नमः सम्भूतसर्वात्मन् नमः सम्भृतकौस्तुभ ॥ १० ॥ नमस्ते नयनातीत नमस्ते भयहारक । नमो विभिन्नवेषाय नमः श्रुतिपथातिग ॥ ११ ॥ नमस्त्रिमूर्तिभेदेन सर्गस्थित्यन्तहेतवे । विष्णवे त्रिदशारातिजिष्णवे परमात्मने ॥ १२ ॥ चक्रभिन्नारिचक्राय चक्रिणे चक्रवल्लभ । विश्वाय विश्ववन्द्याय विश्वभूतानुवर्तिने ॥ १३ ॥ नमोऽस्तु योगिध्येयात्मन् नमोऽस्त्वध्यात्मरूपिणे । भक्तिप्रदाय भक्तानां नमस्ते भक्तिदायिने ॥ १४ ॥ पूजनं हवनं चेज्या ध्यानम् पश्चान्नमस्क्रिया । देवेश कर्म सर्वं मे भवेदाराधनं तव ॥ १५ ॥ इति हवनजपार्चाभेदतो विष्णुपूजा- -नियतहृदयकर्मा यस्तु मन्त्री चिराय । स खलु सकलकामान् प्राप्य कृष्णान्तरात्मा जननमृतिविमुक्तोऽप्युत्तमां भक्तिमेति ॥ १६ ॥ गोगोपगोपिकावीतं गोपालं गोषु गोप्रदम् । गोपैरीड्यं गोसहस्रैर्नौमि गोकुलनायकम् ॥ १७ ॥ प्रीणयेदनया स्तुत्या जगन्नाथं जगन्मयम् । धर्मार्थकाममोक्षाणामाप्तये पुरुषोत्तमम् ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीनारदपाञ्चरात्रे ज्ञानामृतसारे नारद कृत श्री कृष्ण स्तवराजः ॥

परिचय: श्री कृष्ण स्तवराजः और नारद पाञ्चरात्र (Introduction)

श्री कृष्ण स्तवराजः देवर्षि नारद द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जो वैष्णव धर्म के आधारभूत ग्रंथ 'नारद पाञ्चरात्र' (Narada Pancharatra) के 'ज्ञानामृत सार' से उद्धृत है। "स्तवराज" का शाब्दिक अर्थ होता है—स्त्वनों (स्तुतियों) का राजा। यह स्तोत्र भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति और उनकी महिमा का एक व्यवस्थित दर्शन है। नारद पाञ्चरात्र आगम साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो तंत्र और भक्ति के अद्भुत संगम को प्रस्तुत करता है।

देवर्षि नारद, जिन्हें भक्ति सूत्रों का रचयिता और भगवान का मनस-पुत्र माना जाता है, इस स्तोत्र में "अज्ञानात्कुण्ठितात्मने" (अज्ञान से कुण्ठित आत्मा वाले) के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए परमात्मा से 'उत्तम भक्ति' की याचना करते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए पहली सीढ़ी 'दैन्य' और 'प्रसन्नता' की प्रार्थना है। श्लोक १ में नारद जी भगवान के चरणों की धूल के प्रति प्रेममयी भक्ति (तवाङ्घ्रिपङ्कजरजोरागिणीं भक्तिम्) की मांग करते हैं, जो वैष्णव दर्शन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

इस स्तोत्र की संरचना दार्शनिक और विवरणात्मक दोनों है। जहाँ एक ओर भगवान को 'अचिन्त्यसार' और 'अनामय' कहकर उनके निराकार पक्ष की वंदना की गई है, वहीं दूसरी ओर 'शङ्खधर', 'नन्दकनन्दन' और 'गोकुलनायक' कहकर उनके रसमय सगुण रूप का भी वर्णन किया गया है। यह द्वैत और अद्वैत का वह समन्वय है, जो केवल एक सिद्ध भक्त ही अनुभव कर सकता है। नारद जी का यह स्तवराज साधक के भीतर सोई हुई भगवद-चेतना को जगाने का सामर्थ्य रखता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance of Narada's Stavaraja)

शरणागति का विज्ञान: श्री कृष्ण स्तवराजः के प्रारंभिक ५ श्लोक 'प्रसीद' (प्रसन्न होइये) शब्द पर केंद्रित हैं। यह भक्ति योग का वह चरण है जहाँ साधक अपने अहंकार का पूर्ण त्याग कर ईश्वर की दया (Grace) पर आश्रित होता है। नारद जी के अनुसार, भगवान कृष्ण ही 'दुःखहन्' (दुखों का नाश करने वाले) और 'नयनातीत' (नेत्रों की सीमा से परे) हैं।

सकल कर्मों का अर्पण: श्लोक १५ में एक महान आध्यात्मिक सूत्र दिया गया है—"पूजनं हवनं चेज्या ध्यानम्... कर्म सर्वं मे भवेदाराधनं तव"। इसका अर्थ है कि साधक का प्रत्येक कर्म, चाहे वह पूजन हो, हवन हो या सामान्य कार्य, वह भगवान की आराधना बन जाए। यह श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मयोग' का स्तोत्रात्मक रूप है। जब कर्म आराधना बन जाता है, तो वह बंधन नहीं बल्कि मुक्ति का कारण बनता है।

त्रिमूर्ति और विश्व स्वरूप: श्लोक १२ में भगवान को 'त्रिमूर्तिभेदेन' कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाले मूल तत्व श्री कृष्ण ही हैं। वे 'विश्ववन्द्याय' हैं, अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड उनके चरणों में नतमस्तक है।

फलश्रुति: पाठ के लाभ (Phala Shruti & Benefits)

इस स्तवराज की फलश्रुति (श्लोक १६ और १८) में भगवान कृष्ण की भक्ति और चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति का वर्णन है:

  • सकल कामनाओं की पूर्ति: जो साधक विष्णुपूजा में मन लगाकर इस स्तवराज का पाठ करता है, वह अपनी समस्त सात्विक कामनाओं (सकलकामान्) को प्राप्त करता है।
  • जन्म-मृत्यु से मुक्ति: "जननमृतिविमुक्तोऽपि" — निरंतर पाठ करने वाला साधक पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।
  • उत्तम भक्ति की प्राप्ति: इस स्तोत्र का सबसे बड़ा फल 'भक्ति' है। यह साधक के हृदय में श्री कृष्ण के प्रति स्थायी अनुराग उत्पन्न करता है।
  • पाप और भय का नाश: भगवान को 'पापहर' और 'सर्वभयापह' कहा गया है। यह पाठ मानसिक अशांति, पाप बोध और अज्ञात भयों को जड़ से समाप्त कर देता है।
  • चतुर्विध पुरुषार्थ: श्लोक १८ के अनुसार, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए यह स्तोत्र अमोघ है।
  • आध्यात्मिक शांति: 'नारायण' और 'कृष्ण' की ध्वनियों का उच्चारण मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Occasions)

नारद पाञ्चरात्र के सिद्धांतों के अनुसार, इस स्तवराज का पाठ करते समय शुद्धता और भाव का विशेष महत्व है:

साधना के चरण

  • समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' में पाठ करना सर्वोत्तम है। संध्या वंदन के समय भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र पहनें। पीले वस्त्र पहनना भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने वाला माना गया है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: श्लोक १७ में वर्णित 'गोपाल' रूप का ध्यान करें—जो गोपियों और गौओं से घिरे हुए गोकुल के नायक हैं।
  • अर्पण: पाठ के पश्चात तुलसी दल युक्त जल या माखन-मिश्री का भोग लगाएँ।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: भगवान के जन्मदिवस पर इस स्तवराज का १०८ बार पाठ करना महान सिद्धि दायक है।
  • एकादशी: विष्णु पूजन के साथ इस स्तोत्र का पाठ व्रत के पुण्य को कई गुना बढ़ा देता है।
  • संकट काल: जब मानसिक अशांति या कार्यों में बाधा हो, तब पूर्ण श्रद्धा से इस शरणागति स्तोत्र का आश्रय लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण स्तवराजः किस मुख्य ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'नारद पाञ्चरात्र' (ज्ञानामृत सार) से लिया गया है। यह वैष्णव आगम साहित्य का एक प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ है।

2. 'स्तवराज' शब्द का अर्थ क्या है?

'स्तव' का अर्थ है स्तुति और 'राज' का अर्थ है राजा। अर्थात यह स्तुतियों में सर्वश्रेष्ठ और राजा के समान गौरवशाली स्तोत्र है।

3. क्या इस पाठ को करने के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

यद्यपि पाञ्चरात्रिक मंत्रों के लिए दीक्षा आवश्यक होती है, लेकिन स्तोत्र पाठ के लिए श्रद्धा और पवित्रता ही मुख्य योग्यता है। कोई भी वैष्णव या श्री कृष्ण का भक्त इसका पाठ कर सकता है।

4. इस स्तोत्र में 'नारद' की क्या भूमिका है?

नारद जी इस स्तोत्र के ऋषि और रचयिता हैं। उन्होंने भगवान कृष्ण के प्रति अपनी सर्वोच्च शरणागति और दार्शनिक ज्ञान को इन श्लोकों में पिरोया है।

5. 'प्रसीद' शब्द का बार-बार प्रयोग क्यों किया गया है?

'प्रसीद' का अर्थ है 'प्रसन्न होइये'। यह भक्त की वह पुकार है जो भगवान की करुणा (Grace) को आकर्षित करती है। नारद जी इसके माध्यम से जीव के कष्टों के निवारण की विनती करते हैं।

6. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष या पितृ दोष शांत होते हैं?

भगवान कृष्ण को 'विश्वाधार' और 'पापहर' कहा गया है। उनकी शरण में जाने से समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों (जिनमें ग्रह दोष भी शामिल हैं) का प्रभाव कम होने लगता है।

7. 'नारद पाञ्चरात्र' का क्या अर्थ है?

'पाञ्चरात्र' वह विद्या है जो पांच रात्रियों में ब्रह्मा जी द्वारा भगवान से प्राप्त की गई मानी जाती है। यह वैष्णव भक्ति और कर्मकांड की एक प्राचीन पद्धति है।

8. इस स्तोत्र में भगवान के किन-किन अस्त्रों का वर्णन है?

इसमें शङ्ख, चक्र, गदा और नन्दक (तलवार) का वर्णन है (श्लोक ६-७)। ये अस्त्र भक्तों की रक्षा और अधर्म के नाश के प्रतीक हैं।

9. क्या इस पाठ से मोक्ष प्राप्त हो सकता है?

जी हाँ, श्लोक १६ में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'जननमृतिविमुक्त' करने वाला है, अर्थात जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला है।

10. 'गोकुलनायक' नाम का क्या महत्व है?

यह नाम भगवान के माधुर्य रूप को दर्शाता है। यह भक्त के मन में वृंदावन की रसमय स्मृतियाँ और वात्सल्य भाव जागृत करता है।