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Sri Krishna Jananam (Bhagavatam) – श्री कृष्ण जन्म श्लोकाः (श्रीमद्भागवते)

Sri Krishna Jananam (Bhagavatam) – श्री कृष्ण जन्म श्लोकाः (श्रीमद्भागवते)
॥ श्री कृष्ण जन्म श्लोकाः (श्रीमद्भागवते) ॥ श्रीशुक उवाच । अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः । यर्ह्येवाजनजन्मर्क्षं शान्तर्क्षग्रहतारकम् ॥ १ ॥ दिशः प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम् । मही मङ्गलभूयिष्ठपुरग्रामव्रजाकरा ॥ २ ॥ नद्यः प्रसन्नसलिला ह्रदा जलरुहश्रियः । द्विजालिकुलसन्नादस्तबका वनराजयः ॥ ३ ॥ ववौ वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः । अग्नयश्च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत ॥ ४ ॥ मनांस्यासन् प्रसन्नानि साधूनामसुरद्रुहाम् । जायमानेऽजने तस्मिन् नेदुर्दुन्दुभयो दिवि ॥ ५ ॥ जगुः किन्नरगन्धर्वास्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः । विद्याधर्यश्च ननृतुरप्सरोभिः समं तदा ॥ ६ ॥ मुमुचुर्मुनयो देवाः सुमनांसि मुदान्विताः । मन्दं मन्दं जलधरा जगर्जुरनुसागरम् ॥ ७ ॥ निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनर्दने । देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः । आविरासीद्यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः ॥ ८ ॥ तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदार्युदायुधम् । श्रीवत्सलक्षं गलशोभिकौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम् ॥ ९ ॥ महार्हवैदूर्यकिरीटकुण्डल- -त्विषा परिष्वक्तसहस्रकुन्तलम् । उद्दामकाञ्च्यङ्गदकङ्काणादिभि- -र्विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ॥ १० ॥ स विस्मयोत्फुल्लविलोचनो हरिं सुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा । कृष्णावतारोत्सवसम्भ्रमोऽस्पृशन् मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम् ॥ ११ ॥ अथैनमस्तौदवधार्य पूरुषं परं नताङ्गः कृतधीः कृताञ्जलिः । सर्वोचिषा भारत सूतिकागृहं विरोचयन्तं गतभीः प्रभाववित् ॥ १२ ॥ वसुदेव उवाच । विदितोऽसि भवान् साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः । केवलानुभवानन्दस्वरूपः सर्वबुद्धिदृक् ॥ १३ ॥ स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाग्रे त्रिगुणात्मकम् । तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्ट इव भाव्यसे ॥ १४ ॥ यथेमेऽविकृता भावास्तथा ते विकृतैः सह । नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं जनयन्ति हि ॥ १५ ॥ सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १६ ॥ एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणै- -र्ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः । अनावृतत्वाद्बहिरन्तरं न ते सर्वस्य सर्वात्मन आत्मवस्तुनः ॥ १७ ॥ य आत्मनो दृश्यगुणेषु सन्निति व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुधः । विनानुवादं न च तन्मनीषितं सम्यग्यतस्त्यक्तमुपाददत् पुमान् ॥ १८ ॥ त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसम्यमान् विभो वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् । त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः ॥ १९ ॥ स त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः । सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं कृष्णं च वर्णं तमसा जनात्यये ॥ २० ॥ त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु- -र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर । राजन्यसञज्ञासुरकोटियूथपै- -र्निर्व्यूह्यमाना निहनिष्यसे चमूः ॥ २१ ॥ अयं त्वसभ्यस्तव जन्म नौ गृहे श्रुत्वाग्रजांस्ते न्यवधीत् सुरेश्वर । स तेऽवतारं पुरुषैः समर्पितं श्रुत्वाधुनैवाभिसरत्युदायुधः ॥ २२ ॥ श्रीशुक उवाच । अथैनमात्मजं वीक्ष्य महापुरुषलक्षणम् । देवकी तमुपाधावत् कंसाद्भीता शुचिस्मिता ॥ २३ ॥ देवक्युवाच । रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीपः ॥ २४ ॥ नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेषसञज्ञः ॥ २५ ॥ योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां- -स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २६ ॥ मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः पलायन् लोकान् सर्वान्निर्भयं नाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्जं प्राप्य यदृच्छयाद्य स्वस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ॥ २७ ॥ स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्न- -स्त्राहि त्रस्तान् भृत्यवित्रासहासि । रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यं मा प्रत्यक्षं मांसदृशां कृषीष्ठाः ॥ २८ ॥ जन्म ते मय्यसौ पापो मा विद्यान्मधुसूदन । समुद्विजे भवद्धेतोः कंसादहमधीरधीः ॥ २९ ॥ उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् । शङ्खचक्रगदापद्मश्रिया जुष्टं चतुर्भुजम् ॥ ३० ॥ विश्वं यदेतत् स्वतनौ निशान्ते यथावकाशं पुरुषः परो भवान् । बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू- -दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत् ॥ ३१ ॥ श्रीभगवानुवाच । त्वमेव पूर्वसर्गेऽभूः पृश्निः स्वायम्भुवे सति । तदायं सुतपा नाम प्रजापतिरकल्मषः ॥ ३२ ॥ युवां वै ब्रह्मणाऽऽदिष्टौ प्रजासर्गे यदा ततः । सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तेपाथे परमं तपः ॥ ३३ ॥ वर्षवातातपहिमघर्मकालगुणाननु । सहमानौ श्वासरोधविनिर्धूतमनोमलौ ॥ ३४ ॥ शीर्णपर्णानिलाहारावुपशान्तेन चेतसा । मत्तः कामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतुः ॥ ३५ ॥ एवं वां तप्यतोस्तीव्रं तपः परमदुष्करम् । दिव्यवर्षसहस्राणि द्वादशेयुर्मदात्मनोः ॥ ३६ ॥ तदा वां परितुष्टोऽहममुना वपुषानघे । तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च हृदि भावितः ॥ ३७ ॥ प्रादुरासं वरदराड्युवयोः कामदित्सया । वरियतां वर इत्युक्ते मादृशो वां वृतः सुतः ॥ ३८ ॥ अजुष्टग्राम्यविषयावनपत्यौ च दम्पती । न वव्राथेऽपवर्गं मे मोहितौ मम मायया ॥ ३९ ॥ गते मयि युवां लब्ध्वा वरं मत्सदृशं सुतम् । ग्राम्यान् भोगानभुञजाथां युवां प्राप्तमनोरथौ ॥ ४० ॥ अदृष्ट्वान्यतमं लोके शीलौदार्यगुणैः समम् । अहं सुतो वामभवं पृश्निगर्भ इति श्रुतः ॥ ४१ ॥ तयोर्वां पुनरेवाहमदित्यामास कश्यपात् । उपेन्द्र इति विख्यातो वामनत्वाच्च वामनः ॥ ४२ ॥ तृतीयेऽस्मिन् भवेऽहं वै तेनैव वपुषाथ वाम् । जातो भूयस्तयोरेव सत्यं मे व्याहृतं सति ॥ ४३ ॥ एतद्वां दर्शितं रूपं प्राग्जन्मस्मरणाय मे । नान्यथा मद्भवं ज्ञानं मर्त्यलिङ्गेन जायते ॥ ४४ ॥ युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत् । चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम् ॥ ४५ ॥ श्रीशुक उवाच । इत्युक्त्वाऽऽसीद्धरिस्तूष्णीं भगवानात्ममायया । पित्रोः सम्पश्यतोः सद्यो बभूव प्राकृतः शिशुः ॥ ४६ ॥ ततश्च शौरिर्भगवत्प्रचोदितः सुतं समादाय स सूतिकागृहात् । यदा बहिर्गन्तुमियेष तर्ह्यजा या योगमायाजनि नन्दजायया ॥ ४७ ॥ तया हृतप्रत्ययसर्ववृत्तिषु द्वाःस्थेषु पौरेष्वपि शायितेष्वथ । द्वारस्तु सर्वाः पिहिता दुरत्यया बृहत्कपाटायसकीलशृङ्खलैः ॥ ४८ ॥ ताः कृष्णवाहे वसुदेव आगते स्वयं व्यवर्यन्त यथा तमो रवेः । ववर्ष पर्जन्य उपांशुगर्जितः शेषोऽन्वगाद्वारि निवारयन् फणैः ॥ ४९ ॥ मघोनि वर्षत्यसकृद्यमानुजा गम्भीरतोयौघजवोर्मिफेनिला । भयानकावर्तशताकुला नदी मार्गं ददौ सिन्धुरिव श्रियः पतेः ॥ ५० ॥ नन्दव्रजं शौरिरुपेत्य तत्र तान् गोपान् प्रसुप्तानुपलभ्य निद्रया । सुतं यशोदाशयने निधाय तत् सुतामुपादाय पुनर्गृहानगात् ॥ ५१ ॥ देवक्याः शयने न्यस्य वसुदेवोऽथ दारिकाम् । प्रतिमुच्य पदोर्लोहमास्ते पूर्ववदावृतः ॥ ५२ ॥ यशोदा नन्दपत्नी च जातं परमबुध्यत । न तल्लिङ्गं परिश्रान्ता निद्रयापगतस्मृतिः ॥ ५३ ॥ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे दशमस्कन्धे पूर्वार्धे तृतीयोऽध्याये श्री कृष्ण जन्म श्लोकाः ॥

परिचय: श्री कृष्ण जन्म और श्रीमद्भागवत (Introduction)

श्री कृष्ण जन्म श्लोकाः श्रीमद्भागवत महापुराण के १०वें स्कंध के तीसरे अध्याय से उद्धृत हैं। सनातन धर्म में "भागवत" को स्वयं भगवान का वाङ्मय विग्रह माना गया है, और इसका १०वां स्कंध भगवान की लीलाओं का हृदय है। इस अध्याय में शुकदेव जी महाराज राजा परीक्षित को उस अलौकिक समय का वर्णन सुनाते हैं जब मथुरा के कारागार में अंधकार के बीच साक्षात् 'सच्चिदानंद' का उदय हुआ। यह केवल एक बालक का जन्म नहीं था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश का शंखनाद था।

अध्याय की शुरुआत में शुकदेव जी प्रकृति के दिव्य परिवर्तनों का वर्णन करते हैं। श्लोक १-५ में वे बताते हैं कि जब भगवान प्रकट होने वाले थे, तब समस्त दिशाएं प्रसन्न हो गईं, नदियाँ निर्मल जल से भर गईं और आकाश में नक्षत्र अत्यंत शुभ स्थिति में आ गए। यहाँ तक कि असुरों के विरुद्ध रहने वाले साधुओं के मन में भी एक अपूर्व शांति और आनंद का संचार हुआ। यह वर्णन स्पष्ट करता है कि जब परमात्मा अवतरित होते हैं, तो पूरी प्रकृति उनके स्वागत में उत्सव मनाती है।

सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह है जब श्लोक ९-१० में भगवान अपने 'चतुर्भुज रूप' में वसुदेव जी के सम्मुख प्रकट होते हैं। वे कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, कौस्तुभ मणि से सुशोभित साक्षात् नारायण थे। वसुदेव और देवकी द्वारा की गई स्तुति (श्लोक १३-३१) वेदान्त के गहरे रहस्यों को उजागर करती है, जहाँ वे भगवान को 'प्रकृति से परे' और 'अध्यात्म दीप' कहकर संबोधित करते हैं।

अध्याय के अंत में, भगवान ने अपने माता-पिता को उनके पूर्व जन्मों (पृश्नि और सुतपा) के तप की याद दिलाई और फिर अपनी माया से एक साधारण शिशु का रूप ले लिया। वसुदेव जी का उन्हें गोकुल ले जाना और यमुना जी का मार्ग देना, ईश्वर की भक्त-वत्सलता और उनकी अचिंत्य शक्ति का प्रमाण है। इन श्लोकों का पाठ करने से व्यक्ति के हृदय में कृष्ण-भक्ति का बीजारोपण होता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Philosophical Significance)

अंधकार में प्रकाश का उदय: भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात के समय (निशीथे) और कारागार के भीतर हुआ। यह इस बात का प्रतीक है कि जब मनुष्य अज्ञान (अंधकार) और वासनाओं (कारागार) के बंधन में पूरी तरह जकड़ा होता है, तब यदि वह भगवान को पुकारता है, तो ज्ञान रूपी कृष्ण का अवतरण होता है। भगवान का जन्म 'अष्टम' संतान के रूप में होना यह दर्शाता है कि सात सोपानों (योग की सात भूमिकाओं) को पार करने के बाद ही ईश्वर का साक्षात्कार संभव है।

चतुर्भुज रूप का रहस्य: भगवान ने जन्म लेते ही अपना चतुर्भुज दिव्य रूप क्यों दिखाया? इसका उत्तर स्वयं भगवान ने श्लोक ४४ में दिया है—ताकि वसुदेव और देवकी को यह याद रहे कि यह कोई साधारण जन्म नहीं, बल्कि उनकी तपस्या का फल है। यह रूप 'ऐश्वर्य' का प्रतीक है, जो भक्त के भीतर श्रद्धा पैदा करता है, जबकि बाद में शिशु रूप धारण करना 'माधुर्य' का प्रतीक है, जो भक्त को प्रेम और वात्सल्य में डुबो देता है।

यमुना का मार्ग देना: जब वसुदेव जी बालक कृष्ण को लेकर यमुना पार कर रहे थे, तब उफनती हुई नदी ने मार्ग दे दिया। यह भक्ति मार्ग की सुगमता को दर्शाता है। यदि भगवान हमारे साथ हैं (हमारे सिर पर हैं), तो संसार रूपी भवसागर की लहरें स्वतः ही शांत होकर हमें मार्ग प्रदान कर देती हैं।

पाठ के आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति (Benefits)

श्रीमद्भागवत के इस तृतीय अध्याय के पाठ और श्रवण से मिलने वाले लाभों का शास्त्रों में विस्तार से वर्णन है:

  • पाप मुक्ति: इन श्लोकों का पाठ मनुष्य के करोड़ों जन्मों के संचित पापों का क्षय करने में सक्षम है, क्योंकि यह सीधे ब्रह्म-प्राकट्य की कथा है।
  • भय से छुटकारा: जिस प्रकार वसुदेव और देवकी कंस के भय से मुक्त हुए, वैसे ही इस पाठ से साधक को मृत्यु और अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।
  • संतान सुख और संरक्षण: 'पृश्निगर्भ' और 'वामन' के प्रसंग के कारण, संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए यह अध्याय अमोघ माना गया है।
  • मानसिक शांति: श्लोक १-५ का ध्यान करने से अशांत मन भी प्रकृति की तरह शांत और आनंदित हो जाता है।
  • भगवद-प्रेम की प्राप्ति: यह अध्याय साधक के मन में 'सख्य' और 'वात्सल्य' भाव जागृत करता है, जो कृष्ण-भक्ति के अनिवार्य अंग हैं।
  • अविद्या के बंधनों का कटना: कारागार के द्वार अपने आप खुलने का अर्थ है—साधक के अज्ञान के ताले खुल जाना। इस पाठ से विवेक जागृत होता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Recitation Method & Occasions)

कृष्ण जन्म के इन श्लोकों का पाठ करने के लिए कुछ शास्त्रीय विधियाँ अपनाई जाती हैं, जिससे इसका फल कई गुना बढ़ जाता है:

साधना के नियम

  • समय: जन्माष्टमी की रात्रि (निशीथ काल - १२ बजे) इन श्लोकों का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। सामान्य दिनों में प्रातः काल स्नान के बाद इनका पाठ करें।
  • शुद्धि: पीले वस्त्र धारण करें (क्योंकि पीताम्बर कृष्ण को प्रिय है) और उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: श्लोक ९ में वर्णित भगवान के 'चतुर्भुज' रूप का मन में ध्यान करते हुए उच्चारण करें।
  • अर्पण: पाठ के पश्चात माखन-मिश्री या केसर युक्त दूध का भोग लगाएं।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: मुख्य पूजा के समय अध्याय ३ का पूर्ण पाठ अनिवार्य माना गया है।
  • भागवत सप्ताह: भागवत कथा के दौरान कृष्ण जन्म का प्रसंग सबसे बड़ा उत्सव होता है।
  • पुत्रदा एकादशी: संतान प्राप्ति हेतु इस दिन विशेष रूप से पाठ किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवान कृष्ण ने जन्म के समय चतुर्भुज रूप क्यों दिखाया?

भगवान ने चतुर्भुज रूप इसलिए दिखाया ताकि वसुदेव और देवकी को विश्वास हो सके कि यह स्वयं साक्षात् विष्णु हैं और वे कंस से न डरें। साथ ही उन्हें उनके पूर्व जन्मों की तपस्या की याद दिलाने के लिए यह रूप आवश्यक था।

2. श्रीमद्भागवत के किस अध्याय में कृष्ण जन्म का वर्णन है?

भगवान श्री कृष्ण के जन्म का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के १०वें स्कंध (दशम स्कंध) के ३रे अध्याय में मिलता है।

3. वसुदेव जी ने भगवान की स्तुति में उन्हें क्या कहा?

वसुदेव जी ने भगवान को 'पुरुषः प्रकृतेः परः' (प्रकृति से परे परम पुरुष) और 'केवलानुभवानन्दस्वरूपः' (केवल अनुभवगम्य आनंद स्वरूप) कहा। उन्होंने भगवान की सर्वव्यापकता की प्रशंसा की।

4. कृष्ण जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र का क्या महत्व है?

श्लोक १ के अनुसार, कृष्ण का जन्म 'अजनजन्मर्क्षं' (रोहिणी नक्षत्र) में हुआ। ज्योतिष में रोहिणी को अत्यंत शुभ और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, जो भगवान के मनोहर स्वरूप के अनुकूल है।

5. देवकी माँ ने भगवान से अपना रूप छिपाने की प्रार्थना क्यों की?

देवकी माँ कंस के अत्याचारों से डरी हुई थीं (श्लोक २९)। उन्हें डर था कि यदि कंस ने भगवान का यह अलौकिक चतुर्भुज रूप देख लिया, तो वह उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयास करेगा, इसलिए उन्होंने एक साधारण शिशु बनने की विनती की।

6. भगवान कृष्ण के पूर्व जन्म के माता-पिता कौन थे?

श्लोक ३२-४३ के अनुसार, वसुदेव और देवकी अपने पूर्व जन्म में प्रजापति सुतपा और पृश्नि थे। उन्होंने १०,००० वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरुप भगवान उनके पुत्र बने।

7. 'निशीथे तम उद्भूते' पंक्ति का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "जब आधी रात का घना अंधकार छाया हुआ था।" यह अज्ञान के नाश और ज्ञान के प्रकाश के आगमन का संकेत देता है।

8. क्या यमुना नदी का जल बढ़ा हुआ था जब वसुदेव जी कृष्ण को ले जा रहे थे?

हाँ, श्लोक ५० के अनुसार यमुना जी अत्यंत वेगवती और फेनिल (झाग वाली) थीं, लेकिन जैसे ही उन्होंने भगवान के चरणों का स्पर्श करना चाहा, उन्होंने मार्ग दे दिया।

9. योगमाया का इस अध्याय में क्या कार्य था?

योगमाया ने पहरेदारों को सुला दिया और कारागार के द्वार खोल दिए। साथ ही उसने नंदा की पत्नी यशोदा के यहाँ जन्म लिया ताकि भगवान के साथ उसकी अदला-बदली की जा सके।

10. इस अध्याय का पाठ करने से क्या मानसिक शांति मिलती है?

जी हाँ। इस अध्याय के शुरूआती श्लोक प्रकृति की प्रसन्नता का वर्णन करते हैं, जो पाठक के अवचेतन मन में भी सकारात्मकता और शांति भर देते हैं।