Sri Kamakshi Stotram 4 (Paramacharya Krutam) – श्री कामाक्षी स्तोत्रम् – ४ (परमाचार्य कृतम्)

मङ्गलचरणे मङ्गलवदने मङ्गलदायिनि कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ १ ॥
हिमगिरितनये मम हृदिनिलये सज्जनसदये कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ २ ॥
ग्रहनुतचरणे गृहसुतदायिनि नव नव भवते कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ३ ॥
शिवमुखविनुते भवसुखदायिनि नव नव भवते कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ४ ॥
भक्त सुमानस तापविनाशिनि मङ्गलदायिनि कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ५ ॥
केनोपनिषद्वाक्यविनोदिनि देवि पराशक्ति कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ६ ॥
परशिवजाये वरमुनिभाव्ये अखिलाण्डेश्वरि कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ७ ॥
हरिद्रामण्डलवासिनि नित्यमङ्गलदायिनि कामाक्षि ।
गुरुगुहजननि कुरु कल्याणं कुञ्जरिजननि कामाक्षि ॥ ८ ॥
इति परमाचार्य कृत श्री कामाक्षी स्तोत्रम् ।
श्री कामाक्षी स्तोत्रम् - परिचय
श्री कामाक्षी स्तोत्रम् माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी को समर्पित है। माँ ललिता "श्रीविद्या" की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी उपासना से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
पाठ के लाभ (Benefits)
- ऐश्वर्य प्राप्ति: माँ ललिता की कृपा से सुख, समृद्धि और राजयोग मिलता है।
- सौंदर्य और आरोग्य: साधक को शारीरिक कांति और निरोगी काया प्राप्त होती है।
- शत्रु नाश: समस्त बाधाओं और शत्रुओं का शमन होता है।
- ब्रह्मज्ञान: अंततः साधक को आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
- समय: प्रातःकाल या रात्रि (विशेषकर शुक्रवार और पूर्णिमा) को पाठ करना श्रेयस्कर है।
- आसन: लाल आसन पर बैठकर, पूर्वाभिमुख होकर पाठ करें।
- शुद्धि: स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें और कुमकुम का तिलक लगाएं।
- नैवेद्य: देवी को खीर, मिश्री या फलों का भोग लगाएं।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री कामाक्षी स्तोत्रम् का पाठ किस तिथि को करना चाहिए?
शुक्रवार (Friday), पूर्णिमा और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
2. क्या बिना दीक्षा के श्रीविद्या उपासना की जा सकती है?
सामान्य स्तोत्र पाठ (जैसे ललिता सहस्रनाम) भक्ति भाव से कोई भी कर सकता है, परन्तु बीज मंत्रों का जप गुरु दीक्षा के बाद ही करना चाहिए।