Sri Kali Pratah Smarana Stotram – श्री काली प्रातः स्मरण स्तोत्रम्

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री काली प्रातः स्मरण स्तोत्रम् ॥
॥ प्रथम श्लोक - स्मरण ॥
प्रातः स्मरामि मदिरारुणपूर्णनेत्रां
कालीं करालवदनां कमनीयमात्राम् ।
उद्यन्नितानतगतां विगतां स्वसंस्थान्
धात्रीं समस्त जगतां करुणार्द्रचित्ताम् ॥ १ ॥
॥ द्वितीय श्लोक - भजन ॥
प्रातर्भजामि भुजगाभरणामपर्णां
श्रीदक्षिणां ललितवाललतां सपर्णाम् ।
कारुण्यपूर्णनयनां नगराजकन्यां
धन्यां वराऽभयकरां परमार्तिहन्त्रीम् ॥ २ ॥
॥ तृतीय श्लोक - नमन ॥
प्रातर्नमामि नगराजकुलोद्भवां तां
कान्तां शिवस्य करवालकपालहस्ताम् ।
त्रैलोक्यपालनपरां प्रणवादिमात्रां
नागेन्द्रहारकलितां ललितां त्रिनेत्राम् ॥ ३ ॥
॥ फलश्रुति ॥
श्लोकत्रयमिमं पुण्यं प्रातः प्रातः पठेन्नरः ।
तमोबुद्धिं समुत्तीर्य सपश्येत् कालिकापदम् ॥ ४ ॥
॥ इति श्री काली प्रातः स्मरण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
प्रातः स्मरण स्तोत्र - परिचय
श्री काली प्रातः स्मरण स्तोत्रम् केवल 4 श्लोकों का अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली स्तोत्र है। प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में पढ़ने हेतु विशेष।
संरचना:
• प्रथम श्लोक: "प्रातः स्मरामि" - स्मरण
• द्वितीय श्लोक: "प्रातर्भजामि" - भजन
• तृतीय श्लोक: "प्रातर्नमामि" - नमन
• चतुर्थ श्लोक: फलश्रुति
श्लोकवार विवेचना
श्लोक 1 - स्मरण (प्रातः स्मरामि)
मदिरारुणपूर्णनेत्रां: मदिरा (मद) के समान अरुण (लाल) पूर्ण नेत्र
करालवदनां: भयानक मुख वाली
कमनीयमात्राम्: कमनीय (सुंदर) स्वरूप
धात्रीं समस्त जगताम्: सम्पूर्ण जगत की धात्री (माता)
करुणार्द्रचित्ताम्: करुणा से आर्द्र (गीला) चित्त
श्लोक 2 - भजन (प्रातर्भजामि)
भुजगाभरणाम्: सर्पों के आभूषण वाली
अपर्णाम्: पार्वती (पत्ता भी न खाने वाली)
श्रीदक्षिणाम्: दक्षिणकाली
ललितवाललताम्: सुंदर केशों वाली
नगराजकन्याम्: पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री
वराऽभयकराम्: वर और अभय देने वाले हाथ
परमार्तिहन्त्रीम्: परम आर्ति (दुःख) का नाश करने वाली
श्लोक 3 - नमन (प्रातर्नमामि)
नगराजकुलोद्भवाम्: पर्वतराज कुल में उत्पन्न
कान्तां शिवस्य: शिव की प्रिया
करवालकपालहस्ताम्: खड्ग और कपाल हाथ में
त्रैलोक्यपालनपराम्: तीनों लोकों के पालन में रत
प्रणवादिमात्राम्: ॐकार की आदि मात्रा
नागेन्द्रहारकलिताम्: नागराज की माला धारण
त्रिनेत्राम्: तीन नेत्रों वाली
फलश्रुति
"श्लोकत्रयमिमं पुण्यं प्रातः प्रातः पठेन्नरः"
जो मनुष्य इन तीन पुण्य श्लोकों को प्रातः प्रातः (प्रतिदिन सुबह) पढ़े...
"तमोबुद्धिं समुत्तीर्य सपश्येत् कालिकापदम्"
वह तमोबुद्धि (अज्ञान) को पार करके कालिका पद (माँ काली के चरण) का दर्शन करता है।
माँ काली के दिव्य गुण
✓करुणार्द्रचित्ता: करुणा से भरा हृदय
✓समस्त जगत की धात्री: सम्पूर्ण विश्व की माता
✓भुजगाभरणा: सर्पों के आभूषण
✓वराभयकरा: वर और अभय मुद्रा
✓परमार्तिहन्त्री: परम दुःख की विनाशिनी
✓त्रैलोक्यपालनपरा: तीनों लोकों की रक्षक
✓प्रणवादिमात्रा: ॐकार स्वरूपा
✓त्रिनेत्रा: सूर्य, चंद्र, अग्नि नेत्र
पाठ विधि
समय: प्रातःकाल, ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 96 मिनट पूर्व)
विधि:
- स्नान या मुख-हाथ धोकर
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें
- माँ काली का चित्र या मूर्ति सामने रखें
- तीनों श्लोक भक्तिपूर्वक पढ़ें
- प्रतिदिन नियमित पाठ करें
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. "प्रातः स्मरण" स्तोत्र क्या है?
प्रातःकाल (सुबह) स्मरण करने योग्य स्तोत्र। सनातन परंपरा में कई देवी-देवताओं के प्रातः स्मरण स्तोत्र हैं।
2. "तमोबुद्धि" क्या है?
तमो = अंधकार, अज्ञान। तमोबुद्धि = अज्ञानपूर्ण बुद्धि। इस स्तोत्र से अज्ञान का नाश होता है।
3. "कालिकापद" का क्या अर्थ है?
कालिका = माँ काली, पद = चरण या परमपद। अर्थात माँ काली के दिव्य चरणों का दर्शन या उनके लोक की प्राप्ति।
4. क्या शाम को पढ़ सकते हैं?
"प्रातः प्रातः" स्पष्ट रूप से प्रातःकाल बताया है। लेकिन भक्तिपूर्वक किसी भी समय पढ़ना लाभकारी है।
5. "अपर्णा" का क्या अर्थ है?
अ = बिना, पर्ण = पत्ता। पार्वती ने तपस्या में पत्ते भी नहीं खाए, इसलिए "अपर्णा" नाम पड़ा।
6. यह स्तोत्र कितना प्राचीन है?
यह प्राचीन स्तोत्र साहित्य का भाग है। इसी शैली में शिव, विष्णु आदि के भी प्रातः स्मरण स्तोत्र हैं।