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Sri Kalabhairava Kakara Ashtottara Shatanama Stotram – श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Kalabhairava Kakara Ashtottara Shatanama Stotram – श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीशाक्तानन्दपीयूषस्य नाम श्रीकालभैरवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य श्री आनन्दभैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री कालभैरवो देवता ह्रीं बीजं ह्सौः शक्तिः क्ष्फ्रौं कीलकं श्रीकालभैरवप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासाः ॥ श्रीआनन्दभैरव ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमो मुखे । श्रीकालभैरव देवतायै नमो हृदये । ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये । ह्सौः शक्तये नमः पादयोः । क्ष्फ्रौं कीलकाय नमो नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ करन्यासाः ॥ क्ष्फ्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । क्ष्फ्रीं तर्जनीभ्यां नमः । क्ष्फ्रूं मध्यमाभ्यां नमः । क्ष्फ्रैं अनामिकाभ्यां नमः । क्ष्फ्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । क्ष्फ्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ हृदयादिन्यासाः ॥ क्ष्फ्रां हृदयाय नमः । क्ष्फ्रीं शिरसे स्वाहा । क्ष्फ्रूं शिखायै वषट् । क्ष्फ्रैं कवचाय हुम् । क्ष्फ्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । क्ष्फ्रः अस्त्राय फट् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ श्वस्थं त्रीक्षणशोभितं श्रितजनोद्धारं कृपासागरं आम्नायास्यकरोटिखर्पकरं दण्डं धरन्तं सदा । श्रीकाशीपुरनायकं सकलमन्त्रर्षीश्वरं मोक्षदं ध्यायेत्तं हृदि कालभैरवगुरुं कान्तासमेतं परम् ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ कालभैरवदेवः कालकालः कालदण्डधृक् । कालात्मा काममन्त्रात्मा काशिकापुरनायकः ॥ १ ॥ करुणावारिधिः कान्तामिलितः कालिकातनुः । कालजः कुक्कुरारूढः कपाली कालनेमिहा ॥ २ ॥ कालकण्ठः कटाक्षानुगृहीताखिलसेवकः । कपालखर्परोत्कृष्टभिक्षापात्रधरः कविः ॥ ३ ॥ कल्पान्तदहनाकारः कलानिधिकलाधरः । कपालमालिकाभूषः कालीकुलवरप्रदः ॥ ४ ॥ कालीकलावतीदीक्षासंस्कारोपासनप्रियः । कालिकादक्षपार्श्वस्थः कालीविद्यास्वरूपवान् ॥ ५ ॥ कालीकूर्चसमायुक्तभुवनाकूटभासुरः । कालीध्यानजपासक्तहृदगारनिवासकः ॥ ६ ॥ कालिकावरिवस्यादिप्रदानकल्पपादपः । काल्युग्रावासवब्राह्मीप्रमुखाचार्यनायकः ॥ ७ ॥ कङ्कालमालिकाधारी कमनीयजटाधरः । कोणरेखाष्टपत्रस्थप्रदेशबिन्दुपीठगः ॥ ८ ॥ कदलीकरवीरार्ककञ्जहोमार्चनप्रियः । कूर्मपीठादिशक्तीशः कलाकाष्ठादिपालकः ॥ ९ ॥ कटप्रूः कामसञ्चारी कामारिः कामरूपवान् । कण्ठादिसर्वचक्रस्थः क्रियादिकोटिदीपकः ॥ १० ॥ कर्णहीनोपवीताभः कनकाचलदेहवान् । कन्दराकारदहराकाशभासुरमूर्तिमान् ॥ ११ ॥ कपालमोचनानन्दः कालराजः क्रियाप्रदः । करणाधिपतिः कर्मकारकः कर्तृनायकः ॥ १२ ॥ कण्ठाद्यखिलदेशाहिभूषणाढ्यः कलात्मकः । कर्मकाण्डाधिपः किल्बिषमोची कामकोष्ठकः ॥ १३ ॥ कलकण्ठारवानन्दी कर्मश्रद्धवरप्रदः । कुणपाकीर्णकान्तारसञ्चारी कौमुदीस्मितः ॥ १४ ॥ किङ्किणीमञ्जुनिक्वाणकटीसूत्रविराजितः । कल्याणकृत्कलिध्वंसी कर्मसाक्षी कृतज्ञपः ॥ १५ ॥ करालदंष्ट्रः कन्दर्पदर्पघ्नः कामभेदनः । कालागुरुविलिप्ताङ्गः कातरार्ताभयप्रदः ॥ १६ ॥ कलन्दिकाप्रदः कालीभक्तलोकवरप्रदः । कामिनीकाञ्चनाबद्धमोचकः कमलेक्षणः ॥ १७ ॥ कादम्बरीरसास्वादलोलुपः काङ्क्षितार्थदः । कबन्धनावः कामाख्याकाञ्च्यादिक्षेत्रपालकः ॥ १८ ॥ कैवल्यप्रदमन्दारः कोटिसूर्यसमप्रभः । क्रियेच्छाज्ञानशक्तिप्रदीपकानललोचनः ॥ १९ ॥ काम्यादिकर्मसर्वस्वफलदः कर्मपोषकः । कार्यकारणनिर्माता कारागृहविमोचकः ॥ २० ॥ कालपर्यायमूलस्थः कार्यसिद्धिप्रदायकः । कालानुरूपकर्माङ्गमोषणभ्रान्तिनाशनः ॥ २१ ॥ कालचक्रप्रभेदी कालिम्मन्ययोगिनीप्रियः । काहलादिमहावाद्यतालतांडवलालसः ॥ २२ ॥ कुलकुण्डलिनीशाक्तयोगसिद्धिप्रदायकः । कालरात्रिमहारात्रिशिवारात्र्यादिकारकः ॥ २३ ॥ कोलाहलध्वनिः कोपी कौलमार्गप्रवर्तकः । कर्मकौशल्यसन्तोषी केलिभाषणलालसः ॥ २४ ॥ कृत्स्नप्रवृत्तिविश्वाण्डपञ्चकृत्यविधायकः । कालनाथपरः कारः कालधर्मप्रवर्तकः ॥ २५ ॥ कुलाचार्यः कुलाचाररतः कुह्वष्टमीप्रियः । कर्मबन्धाखिलच्छेदी कोष्ठस्थभैरवाग्रणीः ॥ २६ ॥ कठोरौजस्यभीष्माज्ञापालकिङ्करसेवितः । कालरुद्रः कालवेलाहोरांशमूर्तिमान् करः ॥ २७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्युक्तं गुरुनाथस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । श्रीकालभैरवस्येदं रहस्यमतिपावनम् ॥ २८ ॥ श्रीशाक्तानन्दपीयुषं मोक्षसाधनमुत्तमम् । विद्यासर्वस्वसाराढ्यं योगिनीहृदयङ्गमम् ॥ २९ ॥ पुण्यं सुदुर्लभं गोप्यं शमथप्रदमौषधम् । ककारमातृकाबृंहं गुर्वनुग्रहसिद्धिदम् ॥ ३० ॥ यो जपेत्परया भक्त्या प्रेमध्यानपरः सदा । गुरुप्रसादाल्लभते वरं सर्वमभीप्सितम् ॥ ३१ ॥ ॥ इति श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: परिचय एवं तांत्रिक रहस्य

श्री कालभैरव ककार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Kalabhairava Kakara Ashtottara Shatanama Stotram) तांत्रिक साहित्य के एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ 'शाक्तानन्द पीयूष' (Shaktananada Piyusha) से उद्धृत है। इस स्तोत्र की विशिष्टता यह है कि इसमें भगवान कालभैरव के सभी १०८ दिव्य नाम 'क' (ककार) अक्षर से प्रारंभ होते हैं। भारतीय तंत्र विज्ञान में 'क' वर्ण को सृजन, काल और क्रिया का अधिष्ठाता माना गया है, जो साक्षात् ब्रह्मास्त्र और काल की शक्ति को नियंत्रित करता है।

भगवान कालभैरव, महादेव शिव के प्रचंड अवतार हैं, जिन्हें 'काशी के कोतवाल' के रूप में पूजा जाता है। वे काल (समय) के अधिपति हैं और काल का ग्रास करने की शक्ति रखते हैं। इस स्तोत्र में उन्हें 'कालकालः' (काल के भी काल), 'काशिकापुरनायकः' (काशी के स्वामी), और 'कालीकुलवरप्रदः' (काली के कुल को वर देने वाले) के रूप में वर्णित किया गया है। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, ककार-आदि नामों का उच्चारण साधक के भीतर प्रसुप्त कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने और कर्मों के पाश को काटने में सहायक होता है।

यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली महामंत्र है। इसके विनियोग में श्री आनन्दभैरव को ऋषि और अनुष्टुप् को छंद बताया गया है। ह्रीं बीज और क्ष्फ्रौं कीलक इस स्तोत्र को एक अभेद्य सुरक्षा कवच के समान शक्ति प्रदान करते हैं। जो साधक अपनी रक्षा, शत्रुओं के स्तम्भन और अकाल मृत्यु के निवारण की इच्छा रखते हैं, उनके लिए यह 'ककार' स्तोत्र किसी संजीवनी से कम नहीं है।

विशिष्ट महत्व एवं ककार वर्ण का प्रभाव

तंत्र शास्त्र में अक्षरों का अपना एक विज्ञान है। 'क' वर्ण को कामरूप, क्रिया और ज्ञान की त्रिमूर्ति माना गया है। कालभैरव के ककार नामों का पाठ करने से साधक के पांच भौतिक तत्वों का शोधन होता है। स्तोत्र में उन्हें 'कालचक्रप्रभेदी' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह शक्ति जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र और समय के विनाशकारी प्रभाव से मुक्त कर सकती है।

इस स्तोत्र में भैरव के साथ उनकी शक्ति 'कान्ता' (भगवती भैरवी) का भी वर्णन है। 'ध्यायेत्तं हृदि कालभैरवगुरुं कान्तासमेतं परम्' — यह ध्यान श्लोक स्पष्ट करता है कि भैरव साक्षात् गुरु स्वरूप हैं जो अपनी शक्ति के साथ साधक के हृदय कमल में निवास करते हैं। यह स्तोत्र विशेष रूप से 'कौलमार्ग' के साधकों के लिए अत्यंत गोपनीय और फलदायी माना गया है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (२८-३१) में इसके गुप्त फलों का वर्णन स्वयं शिव ने किया है:

  • शत्रु और बाधा स्तम्भन: 'कल्याणकृत्कलिध्वंसी' — यह कलयुग के दोषों और गुप्त शत्रुओं की चालों को विफल कर देता है। शत्रुओं का भय पूर्णतः समाप्त हो जाता है।
  • अकाल मृत्यु निवारण: कालभैरव स्वयं काल के रक्षक हैं, अतः इस पाठ से दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु के योग टल जाते हैं।
  • कर्म बन्धन से मुक्ति: 'कर्मबन्धाखिलच्छेदी' — साधक के जन्म-जन्मांतर के पापों और कर्म के जटिल बंधनों को यह स्तोत्र काट देता है।
  • ग्रह शांति: शनि, राहु और केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दोषों को शांत करने के लिए कालभैरव की उपासना श्रेष्ठ मानी गई है। यह मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • मोक्ष और सिद्धि: 'मोक्षसाधनमुत्तमम्' — यह पाठ न केवल भौतिक सुख देता है, बल्कि साधक को आध्यात्मिक उन्नति और अंततः कैवल्य पद की प्राप्ति कराता है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना अनुष्ठान (Ritual Method)

भगवान कालभैरव की साधना में अनुशासन और श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है। इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:

१. श्रेष्ठ समय:

रविवार या मंगलवार की रात्रि (प्रदोष काल के बाद) इस पाठ के लिए सर्वोत्तम है। कालाष्टमी (प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी) को किया गया पाठ विशेष फलदायी होता है।

२. वस्त्र एवं आसन:

साधक को स्नान आदि से निवृत्त होकर काले या गहरे नीले वस्त्र धारण करने चाहिए। आसन कुशा या ऊनी होना चाहिए और मुख दक्षिण दिशा (यम और भैरव की दिशा) की ओर रखना चाहिए।

३. पूजन एवं नैवेद्य:

भगवान भैरव के सम्मुख सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं। उन्हें गुड़, उरद के वड़े, इमरती या मीठी रोटी का भोग लगाएं। यदि संभव हो, तो एक काले श्वान (कुत्ते) को मीठी रोटी खिलाएं, क्योंकि श्वान भैरव का वाहन है।

४. विनियोग और न्यास:

पाठ प्रारंभ करने से पूर्व विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ें। ऋष्यादि न्यास, कर न्यास और हृदय न्यास अवश्य करें। यह आपके शरीर को भैरवमयी बनाता है और सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'ककार' अष्टोत्तरशतनाम का क्या अर्थ है?

'ककार' का अर्थ है कि इस स्तोत्र के सभी १०८ नाम संस्कृत वर्णमाला के 'क' अक्षर से शुरू होते हैं। तंत्र शास्त्र में 'क' वर्ण को अत्यंत शक्तिशाली और ऊर्जावान माना गया है।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ घर पर किया जा सकता है?

हाँ, घर के पूजा स्थल पर बटुक भैरव या कालभैरव की तस्वीर के सामने इसका पाठ किया जा सकता है। बस ध्यान रखें कि स्थान एकांत और स्वच्छ हो।

3. क्या महिलाएं यह स्तोत्र पढ़ सकती हैं?

जी हाँ, भगवती भैरवी की पूजा स्त्रियाँ भी करती हैं। पूर्ण शुद्धि और भक्ति के साथ महिलाएं भी अपनी रक्षा के लिए यह पाठ कर सकती हैं।

4. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य भक्ति और सुरक्षा हेतु कोई भी इसका पाठ कर सकता है। किंतु यदि आप इसे किसी विशेष तांत्रिक सिद्धि के लिए पढ़ रहे हैं, तो 'शाक्तानन्द पीयूष' ग्रंथ के अनुसार गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।

5. कालभैरव को 'काशी का कोतवाल' क्यों कहा जाता है?

मान्यता है कि भगवान शिव ने कालभैरव को काशी की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा था। काशी विश्वनाथ के दर्शन से पूर्व कालभैरव के दर्शन और अनुमति अनिवार्य मानी जाती है।

6. शनि दोष निवारण में यह स्तोत्र कैसे सहायक है?

भगवान शिव के अंशावतार होने के कारण भैरव जी सभी क्रूर ग्रहों को नियंत्रित करते हैं। शनि की साढ़ेसाती या ढैया में इस स्तोत्र का पाठ करने से कष्टों में भारी कमी आती है।

7. क्या पाठ के दौरान सरसों का तेल चढ़ाना जरूरी है?

सरसों का तेल भैरव जी को अत्यंत प्रिय है। इसकी तीक्ष्ण गंध नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है, इसलिए तेल का दीपक जलाना या तेल अर्पण करना शुभ होता है।

8. 'कादम्बरीरसास्वादलोलुपः' नाम का क्या अर्थ है?

श्लोक १८ में आए इस नाम का आध्यात्मिक अर्थ है वह जो ब्रह्मांडीय आनन्द के रस का आस्वादन करने वाले योगियों के प्रिय हैं। तांत्रिक मार्ग में यह परमानन्द की अवस्था को दर्शाता है।

9. क्या यह पाठ मुकदमेबाजी (Legal Issues) में लाभ देता है?

हाँ, कालभैरव न्याय के रक्षक हैं। यदि आप सत्य की ओर हैं, तो इस स्तोत्र का पाठ आपको कानूनी विवादों और मिथ्या आरोपों से मुक्ति दिला सकता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

श्रद्धापूर्वक ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से साधक को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव और सुरक्षा का अनुभव होने लगता है।