Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गणेश मन्त्रप्रभाव स्तुतिः (Sri Ganesha Mantra Prabhava Stuti)

Sri Ganesha Mantra Prabhava Stuti

श्री गणेश मन्त्रप्रभाव स्तुतिः (Sri Ganesha Mantra Prabhava Stuti)
॥ श्री गणेश मन्त्रप्रभाव स्तुतिः ॥ ओमित्यादौ वेदविदो यं प्रवदन्ति ब्रह्माद्या यं लोकविधाने प्रणमन्ति । योऽन्तर्यामी प्राणिगणानां हृदयस्थः तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ १ ॥ गङ्गागौरीशङ्करसन्तोषकवृत्तं गन्धर्वालीगीतचरित्रं सुपवित्रम् । यो देवानामादिरनादिर्जगदीशः तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ २ ॥ गच्छेत्सिद्धिं यन्मनुजापी कार्याणां गन्ता पारं संसृतिसिन्धोर्यद्वेत्ता । गर्वग्रन्थेर्यः किल भेत्ता गणराजः तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ३ ॥ तण्येत्युच्चैर्वर्णजमादौ पूजार्थं यद्यन्त्रान्तः पश्चिमकोणे निर्दिष्टम् । बीजं ध्यातुः पुष्टिदमाथ्वरणवाक्यैः तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ४ ॥ पद्भ्यां पद्मश्रीमदहृद्भ्यां प्रत्यूषे मूलाधाराम्भोरुह भास्वद्भानुभ्याम् । योगी यस्य प्रत्यहमजपार्पणदक्षः तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ५ ॥ तत्त्वं यस्य श्रुतिगुरुवाक्यैरधिगत्य ज्ञानी प्रारब्धानुभवान्ते निजधाम । शान्ताविद्यस्तत्कृतबोधः स्वयमीयात् तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ६ ॥ ये ये भोगा लोकहितार्थाः सपुमार्थाः ये ये योगाः साध्यसुलोकाः सुकृतार्थाः । ते सर्वे स्युर्यन्मनुजपतः पुरुषाणां तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ७ ॥ नत्वा नित्यं यस्य पदाब्जं मुहुरर्थी निर्द्वैतात्माखण्डसुखः स्याद्धतमोहः । कामान्प्राप्नोतीति किमाश्चर्यमिदानीं तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ८ ॥ मस्तप्रोद्यच्चन्द्रकिशोरं करिवक्त्रं पुस्ताक्षस्रक्पाश सृणीस्फीतकराब्जम् । शूर्पश्रोत्रं सुन्दरगात्रं शिवपुत्रं तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि ॥ ९ ॥ सिद्धान्तार्थां सिद्धिगणेशस्तुतिमेनां सुब्रह्मण्याह्वयसूर्युक्तामनुयुक्ताम् । उक्त्वा श्रुत्वापेक्षितकार्यं निर्विघ्नं मुक्त्वा मोहं बोधमुपेयात्तद्भक्तः ॥ १० ॥ इति श्रीसुब्रह्मण्ययोगि कृत श्रीगणेशमन्त्रप्रभाव स्तुतिः ।
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

प्रस्तावना (Introduction)

श्री गणेश मन्त्रप्रभाव स्तुतिः (Sri Ganesha Mantra Prabhava Stuti) की रचना महान सिद्ध संत श्री सुब्रह्मण्य योगी (Sri Subramanya Yogi) ने की है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि गणेश मंत्र के "प्रभाव" (Impact) का गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण है।

इसमें 10 श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक का अंत "तं विघ्नेशं दुःखविनाशं कलयामि" (मैं उन दुःखों का नाश करने वाले विध्नराज का ध्यान करता हूँ) पंक्ति से होता है। यह स्तोत्र साधक को बाहरी पूजा से हटाकर "अंतर्यामी" (Inner Self) की उपासना की ओर ले जाता है।

मन्त्र का प्रभाव (Power of the Mantra)

कवि ने गणेश उपासना के तीन स्तरों का वर्णन किया है:

  • 1. बाह्य पूजा:वेदों और ब्रह्मादि देवताओं द्वारा वंदित रूप (श्लोक 1)।
  • 2. आंतरिक योग:मूलाधार चक्र में सूर्य के समान तेजस्वी रूप का ध्यान (श्लोक 5)।
  • 3. परब्रह्म रूप:"निर्द्वैत आत्मा" और "अखंड सुख" के रूप में अनुभव (श्लोक 8)।

विशेष: श्लोक 5 में "अजपा अर्पण" (Ajapa Arpana) की बात की गई है, जो निरंतर श्वास-प्रश्वास के साथ चलने वाला "सो-हं" जप है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • दुःख विनाश (Destruction of Sorrow): इसका सबसे मुख्य फल "दुःखविनाश" है। चाहे वह शारीरिक कष्ट हो या मानसिक संताप, इस स्तोत्र के पाठ से सभी मिट जाते हैं।

  • मोह मुक्ति (Freedom from Delusion): यह साधक को अज्ञान (Moham) से मुक्त कर "बोध" (True Knowledge) प्रदान करता है (श्लोक 10)।

  • कार्य सिद्धि (Success in Tasks): इसके प्रभाव से अपेक्षित कार्य (Desired tasks) बिना किसी विघ्न के संपन्न होते हैं (श्लोक 10)।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणेश मंत्र प्रभाव स्तुति (Ganesha Mantra Prabhava Stuti) क्या है?

यह श्री सुब्रह्मण्य योगी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह भगवान गणेश के 'मंत्र' के 'प्रभाव' (Power/Influence) का वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि गणेश मंत्र का जप साधक के जीवन में क्या चमत्कारिक बदलाव ला सकता है।

इस स्तोत्र का मुख्य विषय (Theme) क्या है?

इसका मुख्य विषय 'अंतर्यामी उपासना' है। इसमें गणेश जी को केवल बाहरी देवता नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के हृदय में स्थित 'अंतरात्मा' (Inner Self) और 'दुःख विनाशक' (Destroyer of Sorrows) के रूप में पूजा गया है।

'दुःखविनाशं कलयामि' का क्या अर्थ है?

यह स्तोत्र की टेक (Refrain) है जो हर श्लोक के अंत में आती है। इसका अर्थ है - 'मैं उन विघ्नेश्वर का ध्यान करता हूँ (कलयामि), जो समस्त दुःखों का नाश करने वाले (दुःखविनाशं) हैं।'

इस स्तोत्र में 'मूलाधार' (Muladhara) के बारे में क्या कहा गया है?

श्लोक 5 में उल्लेख है कि योगी जन अपने 'मूलाधार चक्र' (Muladhara Chakra) में स्थित कमल में गणेश जी के तेज का ध्यान करते हैं। यह कुंडलिनी जागरण और आत्म-साक्षात्कार का संकेत है।

इसमें किस बीज मंत्र का संकेत है?

श्लोक 4 में 'तण्येत्युच्चैर्वर्णजमादौ' पद आया है, जो गणेश जी के बीज मंत्र 'गं' (Gam) की ओर रहस्यमय संकेत करता है। इसे पुष्टि (Strength) देने वाला बताया गया है।

इस स्तोत्र के रचयिता श्री सुब्रह्मण्य योगी कौन थे?

श्री सुब्रह्मण्य योगी एक महान सिद्ध संत और गणेश भक्त थे। उनकी रचनाओं में वेदांत और भक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है। उन्होंने गणेश जी को परब्रह्म मानकर उनकी स्तुति की है।

श्लोक 6 में 'प्रारब्ध' के बारे में क्या कहा गया है?

श्लोक 6 बताता है कि ज्ञानी पुरुष इस स्तोत्र के प्रभाव से अपने 'प्रारब्ध कर्मों' (Prarabdha Karma) को भोगकर अंत में शांत और मुक्त हो जाता है। यह मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

क्या यह स्तोत्र केवल आध्यात्मिक लाभ देता है?

नहीं, श्लोक 7 के अनुसार, यह लोक और परलोक दोनों के भोग प्रदान करता है। जो भी 'लोकहित' (Public welfare) और 'पुरुषार्थ' (Dharma, Artha, Kama, Moksha) की कामना करता है, उसे इस मंत्र जप से सब कुछ प्राप्त होता है।

इसका पाठ करने की विधि क्या है?

इसे प्रातःकाल (Pratyusha - श्लोक 5) शुद्ध होकर पढ़ना चाहिए। विशेष रूप से ध्यान (Meditation) या 'अजपा जप' (निरंतर श्वास-प्रश्वास में जप) के साथ इसका पाठ अत्यंत फलदायी होता है।

'अजपा समर्पण' (Ajapa Arpana) क्या है?

श्लोक 5 में 'अजपा' का उल्लेख है। इसका अर्थ है बिना प्रयास के, श्वास के 'हंस' (So-ham) मंत्र के साथ गणेश जी का स्मरण करना। यह योग की उच्च अवस्था है।

फलश्रुति (Benefits) में क्या बताया गया है?

अंतिम श्लोक (10) के अनुसार, इसका पाठ करने से कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं (Nirvighnam), मोह का नाश होता है (Muktva Moham), और अंत में 'बोध' (Supreme Knowledge) की प्राप्ति होती है।

क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, चूँकि यह 'बोध' (बुद्धि/ज्ञान) प्रदाता है और 'मोह' (Confusion) का नाशक है, यह विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और सफलता पाने हेतु उत्तम है।