श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Sri Ganesha Avatara Stotram)
Sri Ganesha Avatara Stotram

स्तोत्र का महत्व (Significance)
श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Sri Ganesha Avatara Stotram) मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) का सार है। यह पुराण भगवान गणेश के 8 प्रमुख अवतारों (अष्टविनायक) का वर्णन करता है।
मानव शरीर और मन में 8 प्रकार के मुख्य 'रोग' या 'असुर' (Inner Demons) होते हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, ममता और अभिमान। गणेश जी का प्रत्येक अवतार एक विशिष्ट असुर का नाश करने के लिए हुआ है:
- वक्रतुण्ड (Vakratunda): मात्सर्य (ईर्ष्या/Jealousy) का नाश करने वाले।
- एकदन्त (Ekadanta): मद (अहंकार/Arrogance) का नाश करने वाले।
- महोदर (Mahodara): मोह (Delusion) का नाश करने वाले।
- गजानन (Gajanana): लोभ (Greed) का नाश करने वाले।
- लम्बोदर (Lambodara): क्रोध (Anger) का नाश करने वाले।
- विकट (Vikata): काम (Lust/Desire) का नाश करने वाले।
- विघ्नराज (Vighnaraja): ममत्व (Attachment) का नाश करने वाले।
- धूम्रवर्ण (Dhumravarna): अभिमान (Pride) का नाश करने वाले।
लाभ (Benefits)
शोक विनाश: फलश्रुति कहती है "स्तोत्रमिदं शोकविनाशनम्" - यह स्तोत्र सभी प्रकार के दुखों और अवसादों (Depression) को नष्ट करता है।
मन की शुद्धि: जब आंतरिक विकार (असुर) नष्ट होते हैं, तो मन शुद्ध होकर "स्वानन्द" (आत्म-आनंद) में स्थित हो जाता है।
समृद्धि: यह पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की समृद्धि प्रदान करता है ("धनधान्यसमृद्ध्यादिप्रदं").
प्रश्नोत्तरी (FAQ)