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श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Sri Ganesha Avatara Stotram)

Sri Ganesha Avatara Stotram

श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Sri Ganesha Avatara Stotram)
॥ श्री गणेशावतार स्तोत्रम् ॥ अङ्गिरस उवाच । अनन्ता अवताराश्च गणेशस्य महात्मनः । न शक्यते कथां वक्तुं मया वर्षशतैरपि ॥ १ ॥ सङ्क्षेपेण प्रवक्ष्यामि मुख्यानां मुख्यतां गतान् । अवतारांश्च तस्याष्टौ विख्यातान् ब्रह्मधारकान् ॥ २ ॥ वक्रतुण्डावतारश्च देहिनां ब्रह्मधारकः । मत्सुरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः ॥ ३ ॥ एकदन्तावतारो वै देहिनां ब्रह्मधारकः । मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः ॥ ४ ॥ महोदर इति ख्यातो ज्ञानब्रह्मप्रकाशकः । मोहासुरस्य शत्रुर्वै आखुवाहनगः स्मृतः ॥ ५ ॥ गजाननः स विज्ञेयः साङ्ख्येभ्यः सिद्धिदायकः । लोभासुरप्रहर्ता च मूषकगः प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥ लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुरनिबर्हणः । आखुगः शक्तिब्रह्मा सन् तस्य धारक उच्यते ॥ ७ ॥ विकटो नाम विख्यातः कामासुरप्रदाहकः । मयूरवाहनश्चायं सौरमात्मधरः स्मृतः ॥ ८ ॥ विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्यते । ममासुरप्रहन्ता स विष्णुब्रह्मेति वाचकः ॥ ९ ॥ धूम्रवर्णावतारश्चाभिमानासुरनाशकः । आखुवाहनतां प्राप्तः शिवात्मकः स उच्यते ॥ १० ॥ एतेऽष्टौ ते मया प्रोक्ता गणेशांशा विनायकाः । एषां भजनमात्रेण स्वस्वब्रह्मप्रधारकाः ॥ ११ ॥ स्वानन्दवासकारी स गणेशानः प्रकथ्यते । स्वानन्दे योगिभिर्दृष्टो ब्रह्मणि नात्र संशयः ॥ १२ ॥ तस्यावताररूपाश्चाष्टौ विघ्नहरणाः स्मृताः । स्वानन्दभजनेनैव लीलास्तत्र भवन्ति हि ॥ १३ ॥ माया तत्र स्वयं लीना भविष्यति सुपुत्रक । सम्योगे मौनभावश्च समाधिः प्राप्यते जनैः ॥ १४ ॥ अयोगे गणराजस्य भजने नैव सिद्ध्यति । मायाभेदमयं ब्रह्म निर्वृत्तिः प्राप्यते परा ॥ १५ ॥ योगात्मकगणेशानो ब्रह्मणस्पतिवाचकः । तत्र शान्तिः समाख्याता योगरूपा जनैः कृता ॥ १६ ॥ नानाशान्तिप्रमोदश्च स्थाने स्थाने प्रकथ्यते । शान्तीनां शान्तिरूपा सा योगशान्तिः प्रकीर्तिता ॥ १७ ॥ योगस्य योगतादृष्टा सर्वब्रह्म सुपुत्रक । न योगात्परमं ब्रह्म ब्रह्मभूतेन लभ्यते ॥ १८ ॥ एतदेव परं गुह्यं कथितं वत्स तेऽलिखम् । भज त्वं सर्वभावेन गणेशं ब्रह्मनायकम् ॥ १९ ॥ फलश्रुति पुत्रपौत्रादिप्रदं स्तोत्रमिदं शोकविनाशनम् । धनधान्यसमृद्ध्यादिप्रदं भावि न संशयः ॥ २० ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं ब्रह्मदायकम् । भक्तिदृढकरं चैव भविष्यति न संशयः ॥ २१ ॥ इति श्रीमुद्गलपुराणे गणेशावतारस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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स्तोत्र का महत्व (Significance)

श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Sri Ganesha Avatara Stotram) मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) का सार है। यह पुराण भगवान गणेश के 8 प्रमुख अवतारों (अष्टविनायक) का वर्णन करता है।

मानव शरीर और मन में 8 प्रकार के मुख्य 'रोग' या 'असुर' (Inner Demons) होते हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, ममता और अभिमान। गणेश जी का प्रत्येक अवतार एक विशिष्ट असुर का नाश करने के लिए हुआ है:

  • वक्रतुण्ड (Vakratunda): मात्सर्य (ईर्ष्या/Jealousy) का नाश करने वाले।
  • एकदन्त (Ekadanta): मद (अहंकार/Arrogance) का नाश करने वाले।
  • महोदर (Mahodara): मोह (Delusion) का नाश करने वाले।
  • गजानन (Gajanana): लोभ (Greed) का नाश करने वाले।
  • लम्बोदर (Lambodara): क्रोध (Anger) का नाश करने वाले।
  • विकट (Vikata): काम (Lust/Desire) का नाश करने वाले।
  • विघ्नराज (Vighnaraja): ममत्व (Attachment) का नाश करने वाले।
  • धूम्रवर्ण (Dhumravarna): अभिमान (Pride) का नाश करने वाले।

लाभ (Benefits)

  • शोक विनाश: फलश्रुति कहती है "स्तोत्रमिदं शोकविनाशनम्" - यह स्तोत्र सभी प्रकार के दुखों और अवसादों (Depression) को नष्ट करता है।

  • मन की शुद्धि: जब आंतरिक विकार (असुर) नष्ट होते हैं, तो मन शुद्ध होकर "स्वानन्द" (आत्म-आनंद) में स्थित हो जाता है।

  • समृद्धि: यह पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की समृद्धि प्रदान करता है ("धनधान्यसमृद्ध्यादिप्रदं").

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणेशावतार स्तोत्रम् (Ganesha Avatara Stotram) क्या है?

यह 'मुद्गल पुराण' (Mudgala Purana) से लिया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसमें ऋषि अंगिरस ने भगवान गणेश के 8 प्रमुख अवतारों (Vakratunda से Dhumravarna तक) का वर्णन किया है, जो मनुष्य के 8 आंतरिक शत्रुओं (दोषों) का नाश करते हैं।

वक्रतुण्ड (Vakratunda) अवतार किस असुर का नाश करते हैं?

श्लोक 3 के अनुसार, भगवान 'वक्रतुण्ड' सिंह पर सवार (Simhavahana) होकर 'मात्सर्य' (Matsarya/Jealousy) सुर का नाश करते हैं। वे 'देहिनों' के 'ब्रह्मधारक' हैं।

एकदन्त (Ekadanta) अवतार का क्या महत्व है?

श्लोक 4 बताता है कि 'एकदन्त', जिनका वाहन मूषक (Mouse) है, 'मद' (Mada/Arrogance) सुर का नाश करते हैं। अहंकार को केवल एकदन्त ही अपने दंत से खंडित कर सकते हैं।

महोदर (Mahodara) किस दोष को दूर करते हैं?

श्लोक 5 के अनुसार, 'महोदर' अवतार 'मोह' (Moha/Delusion) सुर का नाश करते हैं। वे 'ज्ञानब्रह्मप्रकाशक' हैं, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

गजानन (Gajanana) अवतार किसका संहारक है?

श्लोक 6 में वर्णित है कि 'गजानन' (मूषक वाहन) 'लोभ' (Lobha/Greed) सुर का प्रहार करते हैं। वे सांख्यों को सिद्धि देने वाले (Sankhyebhyah Siddhidayah) हैं।

लम्बोदर (Lambodara) अवतार का उद्देश्य क्या है?

श्लोक 7 बताता है कि 'लम्बोदर' 'क्रोध' (Krodha/Anger) सुर का नाश (Nibharana) करते हैं। क्रोधासुर को शांत करने की शक्ति केवल विशाल उदर वाले लम्बोदर में है।

विकट (Vikata) अवतार का वाहन और कार्य क्या है?

श्लोक 8 के अनुसार, भगवान 'विकट' का वाहन 'मयूर' (Peacock) है। वे अत्यंत कठिन 'काम' (Kama/Lust) सुर का नाश करते हैं और 'सौर' (सूर्य) तत्व को धारण करते हैं।

विघ्नराज (Vighnaraja) किस असुर का अंत करते हैं?

श्लोक 9 में कहा गया है कि 'विघ्नराज', जिनका वाहन 'शेषनाग' (Shesha) है, 'ममत्व' (Mama/Attachment) सुर का नाश करते हैं। वे 'विष्णुब्रह्म' के वाचक हैं।

धूम्रवर्ण (Dhumravarna) का क्या महत्व है?

श्लोक 10 अंतिम अवतार 'धूम्रवर्ण' का वर्णन करता है, जो 'अभिमान' (Abhimana/Pride) सुर का नाश करते हैं। उनका वाहन मूषक है और वे 'शिवात्मक' (Essence of Shiva) हैं।

इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

फलश्रुति (श्लोक 20-21) के अनुसार, यह स्तोत्र 'शोकविनाशनम्' (दुखों का नाश करने वाला), धन-धान्य और पुत्र-पौत्र देने वाला है। अंततः यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करता है।

स्वानन्द (Svananda) लोक क्या है?

श्लोक 12-14 में 'स्वानन्द' का उल्लेख है, जो गणेश जी का परम धाम है। इन अवतारों के भजन से भक्त को स्वानन्द लोक में समाधि और 'ब्रह्मणि' स्थिति प्राप्त होती है।

इन 8 अवतारों को किस ग्रंथ में बताया गया है?

यह स्तोत्र 'मुद्गल पुराण' (Mudgala Purana) से है, जो भगवान गणेश का सबसे महत्वपूर्ण पौराणिक ग्रंथ है। इसमें गणेश जी के 8 अवतारों की विस्तृत कथाएं हैं।